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Bcom 2nd Year Public Finance Federal Finance in India

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Bcom 2nd Year Public Finance Federal Finance in India
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भारत में संघीय वित्त व्यवस्था (Federal Finance in India)

प्रश्न 27, संघीय वित्त व्यवस्था से क्या आशय है ? संघीय वित्त व्यवस्था के प्रमुख सिद्धान्त एवं समस्याएँ बताइये।

उत्तर– संघीय वित्त-व्यवस्था से आशय उस व्यवस्था से है जिसके अन्तर्गत आय तथा व्यय की सम्पूर्ण मदों को केन्द्रीय या संघ सरकार, राज्य सरकारों तथा स्थानीय निकायों (Local bodies) के बीच बाँट दिया जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत तीनों इकाइयों को अपने-अपने क्षेत्र में आय प्राप्त करने और व्यय करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होती है। डॉ० आर० एम० भार्गव के अनुसार, “संघीय वित्त से आशय केन्द्र तथा राज्य सरकारों के वित्तीय सम्बन्धों तथा उन दोनों के बीच समन्वय से लगाया जाता है।”

संघीय वित्त की समस्याएँ (Problems of Federal Finance)

1, कार्यों के अनुरूप वित्तीय साधनों का होना- केन्द्र और राज्य सरकारों के कार्य अलग-अलग होते हैं। अत: संघीय वित्त की पहली समस्या यह है कि दोनों प्रकार की सरकारों के बीच आय के साधनों का वितरण किस आधार पर किया जाये जिससे कि वे अपने कार्यों को भली प्रकार सम्पन्न कर सकें।

2, बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार साधनों का समायोजन- संघीय वित्त की दूसरी समस्या यह है कि बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार केन्द्र व राज्य के बीच साधनों का पुनर्वितरण तथा समायोजन किस प्रकार किया जाये।

3, सापेक्षिक साधन की आवश्यकता की समस्या- कुछ राज्य, दूसरे राज्यों की तुलना में निर्धन, कम विकसित अथवा पिछड़े हुए होते हैं। अत: संघीय वित्त की तीसरी समस्या यह है कि किस आधार पर पिछड़े व अविकसित राज्यों को अधिक वित्तीय स्रोत अथवा अनुदान उपलब्ध कराये जाएँ।

संघीय वित्त के सिद्धान्त (Principles of Federal Finance)

केन्द्रीय सरकार, राज्य व स्थानीय सरकारों के बीच वित्तीय स्रोतों के बँटवारे के सम्बन्ध में कुछ सिद्धान्त प्रतिपादित किये गए हैं, जो निम्नलिखित हैं-

1, स्वतन्त्रता का सिद्धान्त (Principle of Independence)- संघीय शासन-प्रणाली में प्रत्येक इकाई को आन्तरिक वित्तीय मामलों में पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये। केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों तथा स्थानीय सरकारों के आय के स्रोत पृथक-पृथक होने चाहिएँ तथा उन्हें अपने-अपने क्षेत्र में कर लगाने तथा ऋण लेने की स्वतन्त्रता होनी चाहिये। स्वतन्त्रता से यह भी तात्पर्य है कि केन्द्र और राज्य अपने द्वारा एकत्र आय को अपनी सानसार व्यय करने में भी पूर्ण स्वतन्त्र होने चाहिएँ। अन्य शब्दों में राज्य अपने राज्य की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आत्म-निर्भर होना चाहिये।

2, एकरूपता का सिद्धान्त (Principle of Uniformity)- एकरूपता शब्द के दो अर्थ लगाये जाते हैं प्रथम, तो यह कि केन्द्र सरकार जब राज्य सरकारों को अनदान दे तो उस सम्बन्ध में एकरूपता की नीति का पालन करे। दूसरे, यह कि राज्य सरकारों को चाहिये कि वे संघ सरकार को समानता के आधार पर अपना-अपना अंशदान दें। अन्य शब्दों में, संघ सरकार को करों का भार सभी राज्यों पर समान रूप से डालना चाहिये अर्थात् उनको दी जाने वाली राहतों या कटौतियों में कोई भेदभाव नहीं करना चाहिये, ताकि सभी राज्य समान रूप से वित्तीय भार को वहन कर सकें।

3, पर्याप्तता एवं लोच का सिद्धान्त (Principle of Adequacy and Elasticity)- पर्याप्तता से आशय यह है कि प्रत्येक सरकार के अधिकार में इतने वित्तीय स्रोत हों कि वे न केवल अपनी वर्तमान की आवश्यकताओं, वरन् भविष्य में उत्पन्न होने वाली आवश्यकताओं को भी पूरी कर सकें। सरजॉन लाथम फोरमर के अनुसार, “यदि एक संघीय व्यवस्था पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ जीवित रहना चाहती है तो राज्यों के पास इतने साधन होने चाहिएँ जो उसके उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिये पर्याप्त हों।”

4, प्रशासन की कुशलता का सिद्धान्त (Principle of Administrative Efficiency)- प्रशासनिक कुशलता से आशय यह है कि वित्तीय प्रशासन ऐसा होना चाहिये जिसमें करदाताओं का हित सुरक्षित रहे, कर-वंचन की सम्भावना न हो, करों का दोहराव न हो, करारोपण का व्यापार तथा उद्योग पर बुरा प्रभाव न पड़े तथा करों को वसूल करने की व्यवस्था प्रभावशाली एवं मितव्ययी हो।

5, हस्तान्तरण का सिद्धान्त (Principle of Transference)- संघीय वित्त-व्यवस्था को सफल बनाने के लिये डॉ० बी० आर० मिश्रा इस सिद्धान्त के पालन करने पर बल देते हैं। उनके अनुसार, “संघ तथा राज्य सरकारों में साधनों का आदर्श विभाजन विभिन्न राज्यों में रह रहे व्यक्तियों के राष्ट्रीय न्यूनतम सिद्धान्त के अनुसार होना चाहिये। संघीय राज्य में यह कार्य धनी क्षेत्रों में निर्धन क्षेत्रों को वित्तीय साधनों के अन्तरण द्वारा किया जा सकता है।” संघ के विभिन्न राज्यों में अनेक असमानताएँ पाई जाती हैं; जैसे— भौगोलिक स्थिति की भिन्नता, आर्थिक स्थिति की भिन्नता आदि। अन्य शब्दों में कुछ राज्य धनी होते हैं, कुछ निर्धन होते हैं, कुछ राज्य विकसित होते हैं और कुछ अविकसित होते हैं। अत: केन्द्रीय सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह धनी राज्यों से अधिक कर लेकर वित्तीय साधनों का अन्तरण निर्धन राज्यों की ओर करे। दूसरे, निर्धन राज्यों को अपेक्षाकृत अधिक अनुदान दे। इससे प्रत्येक राज्य के व्यक्ति अपना जीवन एक न्यूनतम स्तर पर बिताने में समर्थ हो सकेंगे। हमारे देश में इसको करने के लिए वित्त आयोग नियुक्त करने की व्यवस्था है।

6, संघीय नियन्त्रण तथा निरीक्षण का सिद्धान्त (Principle of Federal Control and Supervision)- देश की एकता को बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें राजस्व के समान सिद्धान्तों का पालन करें तथा इसकी देखभाल एवं नियन्त्रण का कार्य केन्द्रीय सरकार को सौंपा जाये। केन्द्र एक ऐसी राजकोषीय नीति बनाये जिसका वह स्वयं भी तथा सभी राज्य पालन करें। इसके साथ यह भी व्यवस्था की जाये कि जो राज्य इस राजकोषीय नीति का उल्लंघन करें उनके विरूद्ध उचित कार्यवाही हो। केन्द्रीय सरकार को यह भी देखना चाहिये कि वह जो अनुदान या आर्थिक सहायता, जिस कार्य के लिए राज्यों को देती है, उनका प्रयोग उसी कार्य में किया जाये अन्यथा राज्य द्वारा इस अनुदान तथा सहायता का दुरुपयोग किया जा सकता है।

7, समन्वय का सिद्धान्त (Principle of Co-ordination)- पाल स्टुडैन्क के अनुसार, “संघ तथा राज्यों में समन्वय का सिद्धान्त केवल कर लगाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिये, वरन् संघ तथा राज्यों के बजट, पूँजीगत व्यय तथा साख सम्बन्धी क्रियाओं में भी समन्वय होना चाहिये तथा समन्वय प्रबन्ध क्रियाओं के साथ भी होना चाहिये।”

8, समानता का सिद्धान्त (Principle of Equity)- एडम स्मिथ (Adam Smith) द्वारा प्रतिपादित करारोपण में समानता के सिद्धान्त को संघीय वित्त-व्यवस्था में भी लाग करना चाहिये। केन्द्र व राज्यों के बीच करों का वितरण इस प्रकार किया जाये कि दोनों प्रकार के करों का भार प्रत्येक करदाता पर समान रूप से पड़े अर्थात् दोनों प्रकार के करों के कारण प्रत्येक करदाता का सीमान्त त्याग लगभग बराबर हो।

प्रश्न 28, भारत में संघीय वित्त व्यवस्था का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।

अथवा

भारतीय संविधान में किया गया केन्द्र तथा राज्यों के बीच साधनों का विभाजन कहाँ तक संघीय वित्त के सिद्धान्तों के अनुरूप है? पूर्णतः व्याख्या कीजिये।

उत्तर-

भारतीय संविधान के अन्तर्गत संघीय वित्त (Federal Finance under Indian Constitution)

स्वतन्त्र भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 से लागू हुआ। यह संविधान एक संघात्मक शासन विधान है और इसमें अनेक राज्य सम्मिलित हैं। शासन को ठीक प्रकार से चलाने के लिये संघ और राज्यों के अधिकारों का विभाजन तीन सूचियाँ बनाकर किया गया है, जो निम्नलिखित हैं-

1, संघीय सूची (Union List)- इस सूची में 97 विषय दिये गये हैं जिन पर केन्द्रीय सरकार को अधिनियम बनाने का अधिकार है। इस सूची में मुख्य विषय इस प्रकार हैं—सुरक्षा, अणु-शक्ति, विदेशी, मामले, रेल, जलयान व हवाई परिवहन, डाक-तार मुद्रण व सिक्का ढलाई, विदेशी व्यापार, रिजर्व बैंक, अन्य बैंक, बीमा कम्पनी, खनिज आदि।

2, राज्य सूची (State List)- इस सूची में 66 विषय दिये गये हैं जिस पर राज्यों को अधिनियम बनाने का अधिकार है। इस सूची के मुख्य विष। इस प्रकार हैं-पुलिस, जेल, न्याय प्रबन्ध, स्थानीय प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सड़क परिवहन, पुल निर्माण, कृषि व वन, राज्य के भीतर का व्यापार व उद्योग आदि।

3, समवर्ती सूची (Concurrent List)- इस सूची में 47 विषय हैं जिन पर केन्द्र और राज्यों की सरकार दोनों को अधिनियम बनाने का अधिकार है, परन्तु राज्यों की अपेक्षा केन्द्रीय अधिनियम को प्राथमिकता दी जाती है। इस सूची के मुख्य विषय हैं-विवाह और तलाक, खाद्य-सामग्री में मिलावट, आर्थिक और सामाजिक नियोजन, सामाजिक सुरक्षा, मुल्य-नियन्त्रण, बिजली, कारखाने, छापेखाने तथा अखबार आदि।

देश की वित्तीय-व्यवस्था को चलाने के लिये एक वित्तीय-विभाग है जिसका प्रमुख वित्त मन्त्री (Finance Minister) होता है। संविधान की धारा 280 के अनुसार राष्ट्रपति को वित्तीय आयोग (Financial Commission) नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है। वित्त आयोग का कार्य देश की वित्त-व्यवस्था में सुधार करने के लिये सुझाव देना है। इस समय तक राष्ट्रपति तेरह वित्त आयोगों की नियुक्ति कर चुके हैं।

संविधान के अन्तर्गत वित्तीय साधनों का वितरण (Distribution of Financial Resources under the Constitution)

संघीय शासन के अनुरूप भारत की वित्त-व्यवस्था संघीय है। वित्तीय साधनों को भी तीन श्रेणियों में बाँटा गया है। आय के कुछ स्रोत केन्द्र को तथा कुछ अन्य स्रोत राज्यों को दिये गये हैं। कुछ कर ऐसे भी होते हैं जिनको केन्द्र ही लगाता और केन्द्र ही वसूल करता है, परन्तु उनकी कुल आय अथवा उसके कुछ भाग का बँटवारा राज्यों में होता है। यह बँटवारा वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार होता है।

भारतीय संविधान द्वारा केन्द्र तथा राज्यों के बीच जो वित्तीय सम्बन्ध स्थापित किये गये हैं उनकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(अ) केन्द्रीय सरकार की आय के साधन (Union Sources of Revenue)- इस श्रेणी के अन्तर्गत आने वाली आय की प्रमुख मदें सातवीं अनुसूची (VII Schedule) के अनुसार हैं। पहली सूची में निम्नलिखित करों को शामिल किया गया है-

(i) आय-कर (कृषि-आय को छोड़कर)

(ii) आयात व निर्यात-कर (सीमा-कर)।

(iii) तम्बाकू तथा अन्य वस्तुओं पर उत्पादन-कर (शराब, अफीम तथा अन्य मादक औषधियों को छोड़कर)

(iv) प्रमण्डल-कर।

(v) कृषि भूमि को छोड़कर व्यक्तियों तथा कम्पनियों की पूँजी व सम्पत्ति कर।

(vi) कृषि भूमि को छोड़कर अन्य सम्पत्तियों पर सम्पदा और उत्तराधिकार कर।

(vii) रेल, समुद्र और वायुमार्गों द्वारा ढोये गये माल और यात्रियों पर चुंगी कर।

(viii) बेचान साध्य प्रलेखों, बीमा-पत्र, अंश हस्तान्तरण, ऋण-पत्र आदि पर मुद्रांक-कर।

(ix) समाचार पत्रों के क्रय-विक्रय तथा उनमें छपे विज्ञापनों पर कर।

(x) अंतर्राज्यीय क्रय-विक्रय पर कर।

(xi) अंश बाजार एवं वायदे के बाजार में किये गये सौदों पर मुद्रांक-कर को छोड़कर अन्य कर।

(ब) राज्य सरकारों की आय के साधन (State Sources of Revenue)- इस श्रेणी में आने वाली आय की प्रमुख मदें सातवीं अनूसूची (VII Schedule) की दूसरी सूची के अनुसार हैं। राज्य सरकारों की कर सूची इस प्रकार है-

(i) भूमि पर लगान।

(ii) कृषि पर आय-कर।

(iii) कृषि भूमि के उत्तराधिकार पर कर।

(vi) कृषि भूमि पर सम्पदा-कर।

(v) भूमि तथा मकानों पर कर।

(vi) खनिज के खनन पर कर।

(vii) राज्यों में निर्मित मादक पदार्थों पर कर।,

(viii) विद्युत उत्पाद तथा उपभोग पर कर।

(ix) समाचार-पत्रों को छोड़कर अन्य वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर कर।

(x) विज्ञापन पर कर (समाचार-पत्रों के अतिरिक्त)

(xi) अतिरिक्त जल तथा स्थल मार्गों के यात्रियों तथा माल पर कर।

(xii) विभिन्न प्रकार की गाड़ियों पर कर।

(xii) पशुओं तथा नावों पर कर।

(xiv) व्यवसाय पर कर।

(xv) मनोरंजन, शर्त एवं जुएँ पर कर।

(xvi) वित्तीय प्रलेखों को छोड़कर प्रलेखों पर मुद्रांक-कर।

करों को वसूल करने व वितरण करने वाले सम्बन्धी नियम

संविधान की धारा 268, 269,270 तथा 271 आदि में इन नियमों का उल्लेख किया है |

धारा 268- वे कर जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समस्त देश में एकरूपता लाने के लिये लगाये जाएँगे, परन्तु राज्यों द्वारा वसूल किये जाएंगे और उनकी पूरी आय भी राज्यों के पास रहेगी—विनिमय विपत्र, हुण्डी, बीमा पत्र, ऋण-पत्रों आदि पर लगाया गया स्टाम्प-कर तथा चिकित्सा व शृंगार सम्बन्धी वस्तुओं पर उत्पादन-कर आदि।

धारा 269- वे कर जो केन्द्रीय सरकार द्वारा लगाये व वसूल किये जाएँगे, परन्तु उनसे प्राप्त पूरी आय संसद द्वारा बनाये गये नियमों के अनुसार राज्यों में बाँट दी जायेगी; जैसे-(i) सम्पत्ति के उत्तराधिकारी पर लगाया जाने वाला कर (कृषि भूमि को) छोड़कर। ,

(ii) सम्पत्ति पर मृत्यु-कर (कृषि भूमि को छोड़कर)।

(iii) रेल के किराये व भाड़े पर कर।

(iv) समाचार-पत्रों के क्रय-विक्रय तथा उनमें प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों पर कर।

(v) शेयर बाजार के लेन-देन सौदों पर कर।

(vi) रेल, जल व वायु मार्ग द्वारा ले जाये गये माल व यात्रियों पर सीमा कर। ।

धारा 270- वे कर जो केन्द्र द्वारा लगाये व वसूल किये जाएँगे और जिनका वितरण राज्य और केन्द्र के बीच ऐसे सिद्धान्तों के अनुरूप होगा जो राष्ट्रीय वित्त आयोग की सिफारिश के आधार पर निर्धारित करेंगे; जैसे-आय-कर (प्रमण्डल कर को छोड़कर), संघीय उत्पादन शुल्क (चिकित्सा एवं शृंगार सम्बन्धी वस्तुओं को छोड़कर)।

(1) संतुलनकारी तत्त्व (Balancing Factors)

1, सहायता अनुदान (Grants-in-aid)- भारत में कुछ राज्य आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं और उनके विकास के लिये जितने धन की आवश्यकता होती है उतना करों के द्वारा वसूल नहीं हो पाता। अत: केन्द्रीय सरकार उन्हें प्रतिवर्ष कुछ राशि अनुदान (Grant) के रूप में देती है। ये राशियाँ (प्रतिशत) वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार निर्धारित की जाती हैं। संविधान की धारा 282 के अन्तर्गत भी केन्द्र अथवा राज्य सरकारें अनुदान दे सकती हैं। ये अनुदान उन विशेष कार्यों के लिये दिये जा सकते हैं जो केन्द्र अथवा राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं।

2, अधिभार (Surcharge)- केन्द्रीय सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी भी कर पर, जिसकी प्राप्ति राज्यों को होगी, अधिभार लगा सकती है। ऐसे अधिभारों से प्राप्त आय पर केन्द्रीय सरकार का अधिकार होगा।

3, आयकर एवं उत्पादन करों का विभाजन (Division of Income Tax and Excise Duties)- कृषि आयों को छोड़कर अन्य सभी आयों पर लगने वाले करों और संघीय उत्पादन करों से आय को केन्द्र और राज्यों के बीच बाँटने की व्यवस्था है।

4, जूट निर्यात कर के बदले में क्षतिपूर्ति (Grants in-aid in Lieu of Jute Export Duty)— पहले राज्य सरकार जूट और जूट सामग्री पर निर्यात कर लगाया करती थी। अब यह निर्यात कर केन्द्र द्वारा लगाया जाता है और केन्द्र राज्यों को इसके बदले में क्षतिपूर्ति अनुदान के रूप में देती है।

5, ऋण (Loan)- भारतीय संविधान की धारा 296 (2) के अनुसार भारत सरकार द्वारा किसी भी राज्य सरकार को ऋण की रकम संघनित निधि में से दी जाती है।

केन्द्र एवं राज्यों के वित्तीय सम्बन्धों का मूल्यांकन (Evaluation of the Financial Relations between Centre and States)

भारतीय संविधान में संघ तथा राज्य सरकारों के बीच वित्तीय सम्बन्धों की व्यवस्था व्यापक रूप से की गई है जिसके कारण बहुत से संघर्षों व मनमुटावों से मुक्ति मिल गयी है। दूसरे वित्त आयोग की नियुक्ति के कारण केन्द्र तथा राज्यों के वित्तीय सम्बन्धों में एक मौलिक लोच प्राप्त हुई है। तीसरे, सहायता अनुदान से क्षेत्रीय विषमताएँ कुछ कम हुई हैं, परन्तु फिर भी राज्य-संघ वित्तीय सम्बन्धों में केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति दिखाई देती है अर्थात् केन्द्र को वित्तीय मामलों में राज्यों से अधिक शक्तिशाली बनाया गया है, जैसा निम्न विवरण से स्पष्ट है-

1, केन्द्र पर निर्भरता (Dependence on Centre)- राज्यों के लिए निर्धारित कर कम लोचपूर्ण एवं कम उत्पादक हैं जिसके कारण अधिकांश राज्यों की केन्द्र पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। कभी-कभी यह केन्द्र एवं राज्यों के मध्य संघर्ष का कारण भी बन जाता

2, दायित्वों का अनुचित विभाजन (Improper Division of Responsibilities)केन्द्र एवं राज्यों के मध्य दायित्वों का बँटवारा किसी वैज्ञानिक विधि पर आधारित नहीं था। इसलिए अनेक राज्य अधिक केन्द्रीय सहायता प्राप्त करने में सफल रहे।

3, कार्यों का अधिव्यापन (Over Lapping of Functions)- केन्द्रीय सहायता के क्षेत्र में वित्त आयोग एवं योजना आयोग के कार्यों में कुछ अधिव्यापन आ गया है। राजस्वं अन्तराल के लिये अनुदान वित्त आयोग द्वारा दिया जाता है, योजना सहायता योजना आयोग द्वारा तथा राहत-सहायता केन्द्र सरकार द्वारा दी जाती है। कभी-कभी योजना आयोग अपने से बाहर के क्षेत्रों में भी हस्तक्षेप कर देता है।

4, केन्द्र द्वारा उपेक्षा (Neglect on the Part of Centre)- वित्त आयोग आय-कर से प्राप्त राजस्व को राज्यों में उसकी राजकोषीय आवश्यकताओं के अनुरूप बाँटता है जिसे मापने का कोई वैज्ञानिक पैमाना नहीं है। राज्य वितरण के इस आधार को तर्क संगत नहीं मानते।

5, केन्द्र द्वारा हस्तक्षेप (Intervention by the Centre)- केन्द्र सशक्त है, जबकि राज्य कमजोर। राज्यीय कार्यों में केन्द्र समय-समय पर हस्तक्षेप करता रहता है। विभिन्न प्रान्तीय विषयों में हस्तक्षेप करके केन्द्र ने प्रान्तीय स्वायत्तता का अपरदन किया है।

6, राज्यों पर अधिक ऋण बोझ (More Debt-burden on States)- राज्य वित्तीय सहायता के लिए प्राय: केन्द्र पर ही निर्भर रहते हैं। अधिकांश सहायता ऋणं के रूप में मिलती है न कि अनुदान के रूप में। कार्यों में निरन्तर वृद्धि और साधनों की सीमितता के चलते राज्य ऋण-बोझ से लदे पड़े हैं।

7, आर्थिक पिछड़ेपन को भार (Weight age to Economic backwardness)सर्वप्रथम छठे वित्त आयोग ने कर-आय हस्तान्तरण के मामले में आर्थिक पिछड़ेपन को महत्व दिया। इसके पूर्व साधन-वितरण में आर्थिक पिछड़ेपन की भागीदारी बिल्कुल नहीं थीं। अब भी इसका प्रतिशत कम है।

8, साधन-अन्तराल का अनुमान अवैज्ञानिक (Unscientific Estimation of Resource-gap)- आय और व्यय के अनुमानित अन्तर को साधन-अन्तराल कहते हैं। राज्य अधिकांशत: बड़े अनुदानों की प्राप्ति के लिए व्यय का अधिक और कर-आय का कम अनुमान लगाते हैं। इन्हीं आधारों पर वित्त आयोग सहायता अनुदान की सिफारिश करता है। इसे निर्धारित करना एक कठिन कार्य है।

9, स्वेच्छाचारी निर्णय (Arbitrary Decisions)- योजना आयोग द्वारा साधन-हस्तान्तरण की विधि वस्तुनिष्ठ विधि पर आधारित नहीं थी। सभी कुछ इस बात पर निर्भर करता था कि केन्द्र राज्यों के लिए क्या आवश्यक समझता है।

10, बढ़ते क्षेत्रीय असन्तुलन (Increasing Regional Imbalances)- केन्द्रीय साधनों के मनमाने स्थानान्तरण निर्णयों ने क्षेत्रीय असन्तुलनों को बढ़ाया है, प्रति व्यक्ति आय में असमानता बढ़ी है। व्यवहार, में धनी राज्यों ने प्रति व्यक्ति अनुदान की निर्धन राज्यों की तुलना में अधिक राशि प्राप्त की है।

11, निरन्तरता का अभाव (Lack of Consistency)- केन्द्र से राज्यों को साधन स्थानान्तरित करने की प्रक्रिया में निरन्तरता का अभाव रहा है, कर-आय वितरण के प्रतिशत में भिन्नता रही है और आर्थिक पिछड़ेपन के तत्त्व को भिन्न-भिन्न भारिता दी गई है।

डी०टी० लकड़वाला (D,T, Lakadwala) ने केन्द्र और राज्यों के मध्य वित्तीय सम्बन्धों के बारे में लिखा है कि “कठिनाई इसलिये उत्पन्न होती है कि राज्यों को जितने कार्य और उत्तरदायित्व सौंपे जाते हैं उनके अनुपात में उन्हें वित्तीय-साधन देने के सिद्धान्त का पालन नहीं किया जाता। परिणामतः राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ते जा रहे हैं। दूसरी ओर राष्ट्रीय समन्वय के सिद्धान्त के आधार पर आय के अधिकांश प्रगतिशील साधन केन्द्रीय सरकार के पास रह जाते हैं। इन्हीं कारणों से संघीय व्यवस्था में अतिरिक्त वित्तीय-समस्याएँ बढ़ती हैं।”


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