Bcom Business Management Development of Management Thought Notes

Bcom Business Management Development of Management Thought Notes

 

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Bcom 2nd Year Business Management Development of Management Thought Notes
Bcom 2nd Year Business Management Development of Management Thought Notes

प्रबन्ध विचारधारा का विकास [Development of Management Thought]

प्रश्न 5, “वैज्ञानिक प्रबन्ध” क्या है? प्रबन्ध के क्षेत्र में एफ० डब्ल्यू० टेलर की भूमिका एवं योगदान की विवेचना कीजिये।

(Garhwal, 2011)

अथवा

वैज्ञानिक प्रबन्ध से आप क्या समझते हैं? इसके सिद्धान्तों को संक्षेप में समझाइए।

(Kanpur, 2009)

उत्तर- फ्रेडरिक डब्ल्यू टेलर (1856-1915) वैज्ञानिक प्रबन्ध के जन्मदाता माने जाते हैं। उन्होंने फिलाडेलफिया की एक कम्पनी में मशीन प्रशिक्षार्थी के रूप में कार्य आरम्भ किया और अपनी प्रतिभा तथा परिश्रम के बल पर कुछ वर्षों में ही बैथलहेम स्टील कम्पनी के मुख्य प्रबन्धक बन गये। वे जीवन भर अनुसंधान करते रहे और व्यक्तिगत अनुभव तथा अनुसंधानों के आधार पर उन्होंने प्रबन्ध में सर्वथा नवीन विचारों को जन्म दिया जिन्हें वैज्ञानिक प्रबन्ध की संज्ञा दी गई। टेलर ने अपने विचारों को अपनी दो पुस्तकों Principles of Scientific Management (1913) तथा Shop Management (1903) में प्रस्तुत किया है।

अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition)- सरल शब्दों में, वैज्ञानिक प्रबन्ध का अर्थ है-प्रबन्ध कार्य में रूढ़िवादी पद्धति (Rule of Thumb Method) और भूल सुधार प्रणाली (Trial and Error Method) के स्थान पर तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करना। टेलर के अनुसार, “वैज्ञानिक प्रबन्ध यह जानने की कला है कि आप व्यक्तियों से क्या कार्य कराना चाहते हैं और फिर यह देखना है कि वे इसको सर्वोत्तम एवं सबसे किफायती तरीके के साथ पूरा करते हैं। वैज्ञानिक प्रबन्ध वह सुव्यवस्थित प्रबन्ध है जिसमें निरीक्षण, विश्लेषण, प्रयोग तथा तर्कों का उपयोग किया जाता है।

Development of Management Thought

वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त (PRINCIPLES OF SCIENTIFIC MANAGEMENT)

टेलर ने अपने समस्त परीक्षणों और परिणामों के आधार पर वैज्ञानिक प्रबन्ध के कुछ महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। टेलर ने इन सिद्धान्तों को संक्षेप में निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया

विज्ञान, न कि अनुमान (Science, not rule of thumb)

संगति,  न कि असंगति (Harmony, not discard)

सहयोग, न कि व्यक्तिवाद (Co-operation, not individualism)

सीमित उत्पादन के स्थान पर अधिकतम उत्पादन (Maximum output, in place of restricted output)

प्रत्येक व्यक्ति का चरम कुशलता एवं सम्पन्नता तक विकास (The development of each man to his greatest efficiency and prosperity)

इस प्रकार वैज्ञानिक प्रबन्ध की योजना को सफल बनाने के लिए टेलर ने निम्नांकित 5 सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है –

1, विज्ञान, न कि अनुमान- इस सिद्धान्त के अनुसार वैज्ञानिक प्रबन्ध में सभी कार्य ‘गलती करो और सुधारो’ पद्धति के स्थान पर वैज्ञानिक एवं तर्कपूर्ण पद्धतियों के आधार पर किये जाते हैं। वैज्ञानिक पद्धति का अभिप्राय ऐसी पद्धति से होता है जो प्रयोगों द्वारा विकसित की गयी हों।

2, संगति, न कि असंगति- वैज्ञानिक प्रबन्ध का दूसरा सिद्धान्त यह है कि संस्था में विभिन्न स्तरों पर पाई जाने वाली असंगतियों अर्थात् मेल नहीं खाने वाली या प्रतिकूल स्थितियों को समाप्त करके उन्हें अनुकूल बनाया जाये। इस सिद्धान्त के आधार पर कच्चे माल, कार्य पद्धतियाँ, मशीनों तथा अन्य नीतियों में विभिन्नताओं के स्थान पर एकरूपता आती है।

3, सहयोग, न कि व्यक्तिवाद- वैज्ञानिक प्रबन्ध का यह भी एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है कि न केवल कर्मचारियों में आपस में बल्कि कर्मचारियों और मालिक के बीच भी सहयोग हो। टेलर महोदय ने मालिकों तथा कर्मचारियों के मध्य सहयोग स्थापित करने के लिए मानसिक क्रान्ति की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।

4, सीमित उत्पादन के स्थान पर अधिकतम उत्पादन- वैज्ञानिक प्रबन्ध का चौथा सिद्धान्त उत्पादन को अधिकतम करने पर जोर देता है जिससे अधिकतम लाभ हो और उत्पादन प्रक्रिया से सम्बन्धित सभी पक्षों को लाभ मिल सके। इस प्रकार यह सीमित उत्पादन की विचारधारा के विरुद्ध रहता है।

5, प्रत्येक व्यक्ति का अधिकतम कुशलता एवं सम्पन्नता तक विकास- वैज्ञानिक प्रबन्ध में प्रत्येक श्रमिक को उनकी अधिकतम कुशलता एवं सम्पन्नता तक पहुँचाने का भरसक प्रयास किया जाता है। इस दृष्टि से श्रमिकों का चयन वैज्ञानिक पद्धति पर किया जाता है। तत्पश्चात् उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। प्रशिक्षण के बाद कर्मचारियों को कार्य का उचित वितरण किया जाता है। कर्मचारियों को निरन्तर ऊँची दर से तथा प्रेरणादायक विधि से पारिश्रमिक प्रदान किया जाता है। इसका श्रमिकों की उत्पादकता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

वैज्ञानिक प्रबन्ध का मूल्यांकन (Appraisal of Scientific Management)- टेलर ने प्रबन्ध के वैज्ञानिक पहलू को उजागर किया तथा प्रबन्ध के व्यवस्थित अध्ययन की नींव रखी। उन्होंने प्रबन्ध में मानसिक क्रान्ति पर तथा वैज्ञानिक नियमों पर बल दिया। प्रबन्ध को कुशल बनाने के लिए उन्होंने अनेक तरीके भी दिये; जैसे—क्रियात्मक (Functional Foremanship), विभेदात्मक मजदूरी प्रणाली (Differential Piecerate Plan), समय अध्ययन (Time Study), गति अध्ययन (Motion Study), 441410&UT (Standardisation) आदि |

टेलर के वैज्ञानिक प्रबन्ध की निम्नलिखित आलोचनाएँ हुई हैं –

1, टेलर की मान्यता है कि एक व्यक्ति समूह की अपेक्षा व्यक्तिगत रूप से कार्य करता है। यह मान्यता गलत है, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह मिलकर कार्य करना चाहता है। टेलर ने एक कर्मचारी के व्यवहार एवं कार्य पर समूह के प्रभाव को नहीं बताया है।

2, टेलर ने कर्मचारी की अपेक्षा मशीन पर अधिक बल दिया है। उसने मानवीय पक्ष की उपेक्षा की है।

3, टेलर ने वैज्ञानिक तकनीक तथा कारखाना स्तर की समस्याओं पर अधिक विचार किया है। उसने प्रशासन के सर्वमान्य सिद्धान्तों पर ध्यान नहीं दिया है।

4, टेलर ने विशिष्टीकरण की आवश्यकता पर अत्यधिक बल दिया है, किन्तु आवश्यकता से अधिक विशिष्टीकरण कार्य में थकावट तथा नीरसता लाता है।

5, टेलर ने श्रमसंघों को अनावश्यक माना है। उनके अनुसार वैज्ञानिक प्रबन्ध के लाभों को जानने के पश्चात् श्रमिकों को किसी प्रकार की सौदेबाजी की आवश्यकता नहीं होगी, किन्तु आधुनिक युग में यह बात सही नहीं लगती।

इन आलोचनाओं के बावजूद यह कहना सर्वथा उचित है कि टेलर के विचार प्रबन्ध के विकास में मौलिक हैं तथा उन्हें आधुनिक प्रबन्ध का जन्मदाता कहा जाता है –

Development of Management Thought

प्रश्न 6, प्रबन्ध के विषय में हेनरी फेयोल के योगदान की विस्तृत समीक्षा कीजिये।

(Agra, 2009)

उत्तरप्रशासनिक सिद्धान्त अथवा प्रबन्ध प्रक्रिया पद्धति (Management Process Approach) का विकास मुख्यतया फ्रांस के विद्वान हेनरी फेयोल (Henri , Fayol) ने किया है। हेनरी फेयोल (1841-1925) ने एक खनिज कम्पनी में जूनियर इंजीनियर की नौकरी शुरू की। अपनी लगन एवं योग्यता से कार्य करके वे 1888 में इस कम्पनी के प्रबन्ध संचालक के पद पर पहुँच गए। उन्होंने प्रशासन के सिद्धान्तों की सार्वभौमिकता पर बल दिया है। उनके प्रबन्ध के सिद्धान्त जीवन के सभी क्षेत्रों में लागू होते हैं, परन्तु ये मार्गदर्शक हैं कड़े नियम नहीं। उनकी इस मान्यता के आधार पर उन्होंने प्रबन्ध के 14 सिद्धान्त प्रस्तुत किए हैं। फेयोल ने प्रबन्धकों के लिए औपचारिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण पर बल दिया। उनके अनुसार एक अच्छे प्रबन्धक में शारीरिक स्वास्थ्य एवं स्फूर्ति, बौद्धिक क्षमता, नैतिकता, सामान्य व विशिष्ट ज्ञान तथा अनुभव सम्बन्धी गुण होने चाहिएँ। फेयोल के विचार उनकी पुस्तक General and Industrial Management में उपलब्ध हैं। हेनरी फेयोल द्वारा प्रतिपादित प्रबन्ध के सिद्धान्त

Development of Management Thought

1, कार्य का विभाजन (Division of Work)— इसे विशिष्टीकरण का सिद्धान्त भी कहते हैं। इस सिद्धान्त की मान्यता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक प्रकार के काम करने के योग्य नहीं है; अत: जो व्यक्ति शारीरिक व मानसिक दृष्टि से जिस कार्य के करने के योग्य हो, उसे वही कार्य सौंपा जाना चाहिए। फेयोल के मतानुसार विशिष्टीकण एवं प्रमापीकरण के लाभों को प्राप्त करने के लिए कार्य का विभाजन अति आवश्यक है। कार्य विभाजन व विशिष्टीकरण का सिद्धान्त सभी कार्यों पर चाहे वे प्रबन्धकीय हों या तकनीकी, समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। कार्य के विभाजन के आधार पर उपयुक्त कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति की नियुक्ति (Appointment of right man to right job) करके श्रेष्ठ किस्म का और अधिक मात्रा में कार्य कराया जा सकता है।

2, अधिकार एवं उत्तरदायित्व (Authority and Responsibility)- फेयोल के अनुसार अधिकार और उत्तरदायित्व सहगामी हैं अर्थात् ये एक ही सिक्के के दो पहलू के समान हैं। यदि किसी व्यक्ति को कोई उत्तरदायित्व सौंपा जाता है, तो उस दायित्व को पूरा करने के लिए उसे अधिकार भी दिये जाने चाहिएँ। निना अधिकार के कोई भी व्यक्ति कुशलतापूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर सकता, परन्तु इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखें कि उत्तरदायित्वों एवं अधिकारों में समानता होनी चाहिए। यदि उत्तरदायित्व अधिक और अधिकार कम हैं, तो उत्तरदायित्व को भली प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता और इसके विपरीत यदि उत्तरदायित्व कम हैं और अधिकार अधिक हैं, तो अधिकारों के दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है। अत: अधिकार एवं उत्तरदायित्व में एकरूपता रहना आवश्यक है।

3, अनुशासन (Discipline)- अनुशासन से आशय अपने से उच्च अधिकारों की आज्ञा पालन करने, नियमों के प्रति आस्था तथा सम्बन्धित अधिकारियों के प्रति आदर का भाव रखने से है। एक औद्योगिक संस्था में अनुशासन बनाये रखने की बहुत आवश्यकता है तथा एक अच्छा नेता ही अच्छा अनुशासन कायम कर सकता है। फेयोल के शब्दों में, “बुरा अनुशासन एक बुराई है जो प्रायः बुरे नेतृत्व से आती है।” किसी भी संस्था में अनुशासन बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि उच्च कोटि के सुयोग्य निरीक्षकों की नियुक्ति की जाय, आदेशों या नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए दण्ड की उचित व्यवस्था हो तथा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार किया जाय।

4, आदेश की एकता (Unity of Command)— इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक कर्मचारी को उससे एकदम उच्च अधिकारी (Immediate Boss) के द्वारा ही आदेश मिलने चाहिएँ, न कि अन्य उच्च अधिकारियों से। अनेक अधिकारियों से आदेश मिलने पर कर्मचारी न केवल भ्रमित (Confused) हो सकता है, अपितु वह अपने दायित्व से भी विमुख हो सकता है।

5, निर्देश की एकता (Unity of Direction)- कार्य में एकरूपता तथा समन्वय लाने के लिए, यह सिद्धान्त अत्यन्त आवश्यक है, जिस प्रकार एक शरीर के दो सिर होने पर मानव, मानव न होकर दानव हो जाता है, ठीक ऐसी ही स्थिति एक कार्य के लिए दो पर्यवेक्षकों के होने पर हो जाती है। अत: किसी एक उद्देश्य की पूर्ति हेतु क्रियाओं के एक समूह का संचालन केवल एक ही व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए तथा उसकी एक ही योजना होनी चाहिए।

6, सामान्य हितों के लिए व्यक्तिगत स्वार्थों का समर्पण (Subordination of- Individual Interest to the Comman Good)- फेयोल के मतानुसार, एक कुशल प्रशासक को चाहिए कि वह संस्था के हितों एवं व्यक्तिगत स्वार्थ में समन्वय व सामंजस्य बनाये रखे। यदि कभी इन दोनों में संघर्ष उपस्थित हो जाय, तो व्यक्तिगत हितों की अपेक्षा सामान्य हितों को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह उसी दशा में सम्भव हो सकता है, जबकि प्रबन्धकीय व्यवहार में न्याय, दृढ़ता तथा सतर्कता हो। आलस्य, स्वार्थ, कमजोरी, अज्ञानता, कार्य में ढिलाई आदि कुछ ऐसे कारण हैं जो सामूहिक हित के महत्व को कम कर देते हैं।

7, कर्मचारियों का पारिश्रमिक (Remuneration of Personnel)— इस सद्धान्त के अनुसार कर्मचारियों को पारिश्रमिक देने की पद्धति सन्तोषजनक तथा यायोचित होनी चाहिए। इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पारिश्रमिक नयोक्ता (Employer) तथा कर्मचारियों दोनों की दृष्टि से उचित होना चाहिए अन्यथा संस्था में तनाव की स्थिति बनी रहेगी। अत: पारिश्रमिक देने की पद्धति ऐसी होनी वाहिए जिसमें पारिश्रमिक की सुरक्षा हो, अधिक कार्य करने पर अधिक पुरस्कार की व्यवस्था हो और एक निश्चित सीमा से अधिक भुगतान न हो।

8, केन्द्रीकरण (Centralisation)- केन्द्रीकरण एक ऐसी स्थिति होती है जसके अन्तर्गत सभी प्रमुख अधिकार किसी एक व्यक्ति या विशिष्ट पद के पास सुरक्षित रहते हैं अर्थात् इस व्यवस्था के अन्तर्गत अधिकारों का सहायकों को भारार्पण नहीं किया जाता है। इसके विपरीत, विकेन्द्रीकरण एक ऐसी व्यवस्था होती है जिसके अन्तर्गत सभी अधिकार किसी विशिष्ट व्यक्ति या पद के पास एकत्रित नहीं होते, अपितु अधिकार उन व्यक्तियों को भारार्पित कर दिये जाते हैं जिनसे यह सम्बन्धित होते हैं। फेयोल ने केन्द्रीकरण व विकेन्द्रीकरण को समझाते हुए कहा है कि वे सभी चीजें जो सहायकों के महत्व को बढ़ाती हैं, विक्रेन्दीयकरण हैं और इसके विपरीत वे सभी चीजें ब्लो सहायकों के महत्व को कम करती हैं, केन्द्रीकरण हैं। अत: दोनों की पूर्णता अवांछनीय है। दोनों के मध्य संस्था की आवश्यकता एवं परिस्थिति के अनुसार किसी ऐसी स्थिति को व्यवहार में लाना चाहिए जिससे संस्था के कर्मचारियों को अपनी योग्यता का प्रदर्शन करने का पूर्ण अवसर मिल सके और संस्था निरन्तर प्रगति कर सके।

9, क्रम श्रृंखला या पदाधिकारी सम्पर्क श्रृंखला (Scalar Chain)- इससे आशय उच्चतम पदाधिकारी (Top Management) से लेकर निम्नतम पदाधिकारी तक के बीच सम्पर्क की व्यवस्था के क्रम से है। फेयोल के मतानुसार संस्था के पदाधिकारी ऊपर से नीचे की ओर एक सीधी रेखा के रूप में संगठित होने चाहिए तथा किसी भी अधिकारी को अपनी सत्ता-श्रेणी का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

10, व्यवस्था (Order)— यह सिद्धान्त सामग्री और कर्मचारी दोनों की व्यवस्था से सम्बन्धित है। फेयोल के अनुसार, ‘प्रत्येक वस्तु के लिए एक निश्चित स्थान एवं प्रत्येक वस्तु अपने निश्चित स्थान पर’ होनी चाहिए और ‘प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक निश्चित स्थान एवं प्रत्येक व्यक्ति अपने स्थान पर’ होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था होने से सामग्री की क्षति एवं समय की बरबादी को रोका जा सकता है।

11, समता या न्याय (Equity)- समता का आशय कर्मचारियों के प्रति न्यायोचित तथा उदारता का भाव रखने से है अर्थात् समता, न्याय तथा दया का मिश्रण है। कर्मचारियों के साथ व्यवहार करते समय और विशेषकर दण्ड देते समय केवल न्यायिक पक्ष को ही ध्यान में नहीं रखना चाहिए, अपितु दया और मानवता को भी महत्व देना चाहिए। इसके अतिरिक्त सभी कर्मचारियों के साथ व्यवहार की समानता भी आवश्यक है। कर्मचारियों के साथ समानता का व्यवहार करने से कर्मचारियों में कार्य के प्रति लगन तथा संस्था के प्रति लगाव पैदा होता है।

12, कर्मचारियों के कार्यकाल में स्थायित्व (Stability of Tenure of Personnels)— फेयोल के मतानुसार जहाँ तक सम्भव हो सके कर्मचारियों के कार्यकाल में स्थायित्व होना चाहिए जिससे कि वे निश्चित होकर लगन से कार्य कर सकें।

13, पहल क्षमता (Initative)- पहल क्षमता से अभिप्राय किसी योजना को सोचने, प्रस्तावित करने और उसको लागू करने की स्वतन्त्रता से है। प्रत्येक प्रबन्धक को चाहिए कि वह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को पहल करने का अवसर प्रदान करे। अधीनस्थ कर्मचारियों के अच्छे सुझाव एवं योजनाओं को क्रियान्वित किया जाना चाहिए और उनकी सहायता की जानी चाहिए।

14, सहयोग की भावना (Espirit de Corps)- फेयोल ने मिलकर कार्य करने की भावना पर अधिक बल दिया है। समस्त संगठन को एक टीम की भांति सहयोगपर्वक काम करना चाहिए। पारस्परिक सहयोग ही कार्यसिद्धि का मूल मन्त्र है। सहयोग भावना को प्रेरित करने के लिए आदेश की एकता के सिद्धान्त का कठोरता से पालन होना चाहिए तथा सन्देशवाहन प्रणाली अत्यन्त प्रभावशाली होनी चाहिए और कर्मचारियों के साथ-साथ मिलकर कार्य करने का वातावरण विकसित किया जाना चाहिए।

                हेनरी फेयोल का यह दृढ़ विश्वास था कि उपरोक्त सिद्धान्तों का प्रयोग न केवल व्यावसायिक संस्थाओं में वरन् आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि सभी संस्थाओं में समान रूप से किया जा सकता है।

Development of Management Thought

प्रश्न 8, नव प्रतिष्ठित प्रबन्ध पद्धति में हॉथोर्न परीक्षण पर एक लेख लिखिये।

उत्तरप्रबन्ध में मानवीय विचारधारा का सूत्रपात मुख्यतया हॉथोर्न परीक्षणों से हुआ। ये परीक्षण अमेरिका के Haward Business School में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर एल्टन मायो एवं उनके साथियों ने 1927-32 वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कम्पनी के हॉथोर्न स्थित कारखाने में किये थे। इन परीक्षणों का उद्देश्य उत्पादन तथा कारखाने की दशाओं में सम्बन्ध मालूम करना था। इन परीक्षणों में निम्नलिखित अध्ययन मुख्य

1, जाँच कक्ष अध्ययन (Test Room Studies) – जाँच कक्ष अध्ययन के अन्तर्गत मायो ने दो अध्ययन किये। प्रथम, अध्ययन में

Development of Management Thoughtप्रकाश व्यवस्था के परिवर्तन से कर्मचारियों की उत्पादन क्षमता पर होने वाले प्रभाव को जाँचा गया। मायो ने पाया कि प्रकाश का उत्पादन क्षमता पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता। द्वितीय, अध्ययन में कर्मचारियों को दो समूहों में बाँटकर उन्हें अलग-अलग कमरों में कार्य करने के लिए कहा गया। Development of Management Thought एक समूह में कार्यानुसार मजदूरी, मध्यांतर, कार्य के कम घंटे आदि सुविधाएँ दी गयीं जिनसे उत्पादन में वृद्धि हुई। मायो दल इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि श्रमिकों की कार्यक्षमता को बढ़ाने में भौतिक वातावरण की अपेक्षा प्रबन्धकों का व्यवहार एवं कर्मचारियों का मनोबल अधिक महत्वपूर्ण है। स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करने का अवसर, अनौपचारिक संगठन तथा सामाजिक सम्बन्ध एवं मनोबल उत्पादन बढ़ाने में सहायक होते हैं। ,

2, साक्षात्कार अध्ययन (Interviewing Studies)- इस अध्ययन में कर्मचारियों का उनके कार्य एवं निरीक्षकों के प्रति दृष्टिकोण ज्ञात करने के लिए उनसे स्वतन्त्र साक्षात्कार किया गया। इनसे निम्नलिखित तथ्य प्रकट हुए –

(क) श्रमिकों के मनोबल को ऊँचा रखने के लिए उन्हें अपनी शिकायतों तथा परेशानियों को स्पष्ट करने की स्वतन्त्रता या अवसर प्रदान करना आवश्यक है।

(ख) शिकायतें सदैव वास्तविक तथ्यों को इंगित नहीं करतीं। ये प्रायः अंत:मन में छिपी व्यथाओं का लक्षण होती हैं।

(ग) कारखाने के आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण से कर्मचारियों की मांगों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

(घ) किसी कर्मचारी की सन्तुष्टि का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वह किस सीमा तक संस्था में अपने सामाजिक अस्तित्व को समझता है और उसे प्राप्त करने का अधिकारी है।

3, अवलोकन अध्ययन (Observational Studies)- इस अध्ययन में पुराने तरीकों को बदले बिना श्रमिकों एवं उनके निरीक्षकों के सामाजिक सम्बन्धों को ज्ञात करने का प्रयास किया गया। इस उद्देश्य के लिए श्रमिकों को चौदह-चौदह के समूहों में विभाजित किया गया। इस अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि प्रत्येक श्रमिक का व्यवहार उसके समूह द्वारा नियन्त्रित होता है। कोई भी श्रमिक समूह के सामाजिक दबाव के विरूद्ध कार्य नहीं करना चाहता। अत: अनौपचारिक संगठन व्यक्तियों के विचारों तथा व्यवहार पर अत्यधिक प्रभाव डालता है।

उपरोक्त परीक्षणों से निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले गए –

1, श्रमिकों के मनोबल तथा उत्पादकता को बढ़ाने में उनकी सुरक्षा, मान्यता तथा आत्मीयता काम की दशाओं से अधिक महत्वपूर्ण है।

2, कर्मचारी केवल आर्थिक लाभ ही नहीं चाहते वे सामाजिक प्राणी भी हैं। भौतिक सुविधाओं की अपेक्षा सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक तत्त्व उनके व्यवहार तथा कार्यकुशलता पर अधिक प्रभाव डालते हैं।

3, कारखाने के अनौपचारिक समूह श्रमिक के दृष्टिकोण तथा कार्यक्षमता पर नियन्त्रण रखते हैं। कार्य एक सामूहिक क्रिया है।

4, शिकायतें कुछ तथ्यों के विवरण मात्र नहीं हैं, अपितु ये असन्तुष्टि का लक्षण हैं।

5, प्रबन्धकों का कर्मचारियों के साथ मानवीय व्यवहार, कर्मचारियों की कार्यकुशलता बढ़ाता है और साथ ही उन्हें सामाजिक सन्तुष्टि प्रदान करता है।

6, एक स्थापित समाज से नए समाज में परिवर्तन कारखाने के सामाजिक जीवन में उथल-पुथल मचाता है।

हॉथोर्न परीक्षणों ने प्रबन्ध के अध्ययन एवं विकास को नई दिशा प्रदान की। इन परीक्षणों के बाद रोयलिस बर्जर, मेकग्रेगर, हर्जबर्ग, फौलेट आदि अनेक विद्वानों ने लम्बी अवधि तक प्रयोग किए। इन प्रयोगों ने प्रबन्ध में मानवीय व्यवहार विचारधारा को जन्म दिया। इस विचारधारा के अनुसार व्यवसाय की समस्त क्रियाओं का आधार मानव है। यदि मानव के व्यवहार, भावनाओं तथा आकांक्षाओं को भली-भाँति समझ लिया जाए, तो उनसे कार्य आसानी से कराया जा सकता है। अतः प्रबन्धकों को अपने अधीनस्थों की भावनाओं का आदर करना चाहिए तथा आपसी सम्बन्ध (Inter-personal relation) विकसित करने चाहिएँ।

मानवीय व्यवहार विचारधारा समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के उन आधारभूत सिद्धान्तों की तरफ ध्यान दिलाती है जिनसे श्रमिकों को सामाजिक तथा मानसिक रूप से सन्तुष्ट रखा जा सकता है। इस विचारधारा के समर्थक श्रमिक को कार्यों का केन्द्रबिन्दु मानते हैं, मशीन का पुर्जा नहीं। उन्होंने प्रबन्धकीय समस्याओं के निवारण के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाने, कर्मचारियों को निर्णयन में हिस्सा देन, अनौपचारिक समूहों को बढ़ावा देने, व्यक्ति विचार विमर्श करने आदि पर बल दिया

मूल्यांकन (Appraisal)— मानवीय व्यवहार विचारधारा से प्रबन्ध के विकास में निःसन्देह एक क्रांतिकारी मोड़ आया। इससे व्यावसायिक जगत में मानव का महत्व बढा परन्तु कुछ विद्वानों ने इस विचारधारा की आलोचना की है। सर्वप्रथम, इस विचारधारा में मानव पक्ष पर अत्यधिक जोर दिया गया है जिससे प्रवन्ध का कलापक्ष तो अधिक मजबूत बन गया है एवं विज्ञान पक्ष कमजोर पड़ गया है। दूसरे, इस विचारधारा में व्यापक सामाजिक वातावरण को अनदेखा किया गया है। व्यवसाय समाज का अंग है और इस पर समाज की परिस्थितियों का गहरा प्रभाव पड़ता है। मानवीय व्यवहार ही सम्पूर्ण प्रबन्ध नहीं है और इसके अतिरिक्त प्रबन्ध के अन्य पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है। पीटर ड्रकर के शब्दों में, “यद्यपि मानवीय सम्बन्ध विचारधारा ने प्रबन्ध को नया रूप दिया है तथा गलत विचारों से मुक्त किया है, परन्तु इसने कोई नवीन विचारधारा प्रस्तुत नहीं की है। मानवीय सम्बन्धों की यह विचारधारा आपसी सम्बन्धों तथा अनौपचारिक समूहों पर विशेष जोर देती है। इस विचारधारा का प्रारम्भिक पहलू व्यक्तिगत मनोविज्ञान है न कि श्रमिक तथा कार्य।”

Development of Management Thought

प्रश्न 9, प्रबन्ध की सम्भाव्यता/प्रासंगिक विचारधारा को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर यह विचारधारा प्रबन्ध सिद्धान्त का नवीनतम दृष्टिकोण है। यह विचारधारा प्रबन्ध सिद्धान्त की सार्वभौमिक प्रकृति को अस्वीकार करती है अर्थात् इस विचारधारा के अनुसार कोई भी प्रबन्धकीय सिद्धान्त या कार्य (action) ऐसा नहीं हो सकता जो कि सभी परिस्थितियों में उचित या अनुकूल सिद्ध हो। अनेक बार प्रबन्धकों ने अनुभव किया है कि जो सिद्धान्त अथवा तकनीक विशेष परिस्थिति में सफल हई है वहीं अन्य परिस्थितियों में असफल रही है। इस प्रकार के अनुभवों ने प्रासंगिक विचारधारा (Contingency Approach) को जन्म दिया। इस विचारधारा का विकास मुख्य रूप से टॉम बर्न्स, डब्ल्यू० स्टाकर, जोन वुड़वार्ड, पाल लारेस, जे० लार्च एवं जेम्स थॉम्पसन, आदि विद्वानों ने किया है। इस विचारधारा के अनुसार प्रबन्ध पूर्व-निर्धारित अथवा रिडीमेड़’ नहीं है, वरन् एक प्रबन्धक को क्या करना चाहिए यह सम्बन्धित परिस्थिति पर निर्भर करता है। अत: प्रबन्धक को वही विधि या मार्ग अपनाना चाहिए जो विद्यमान परिस्थिति में प्रासंगिक होता है अर्थात् जो समय की माँग होता है। इस प्रकार इस विचारधारा के अनुसार प्रबन्धक के कार्य एवं निर्णय तत्कालीन परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं।

मान्यताएँ एवं विशेषताएँ (Assumptions and Characteristics)- सम्भाव्यता अथवा आकस्मिकता विचारधारा की प्रमुख मान्यताएँ एवं विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1, इस विचारधारा के अनुसार ऐसा कोई भी सर्वश्रेष्ठ मार्ग, तकनीक अथवा विधि नहीं है जिसके द्वारा सभी प्रबन्धकीय समस्याओं का समाधान किया जा सके।

2, यह विचारधारा प्रबन्ध कार्य को परिस्थितिजन्य अथवा सांयोगिक (Situational or Contingent) मानती है अर्थात् प्रबन्धकों को प्रत्येक प्रबन्धकीय निर्णय लेते समय विद्यमान परिस्थितियों पर निर्भर करना पड़ता है।

3, यह विचारधारा निर्णयों के लेने अथवा कार्यों को करने से पूर्व उनके प्रभावों से उत्पन्न होने वाले परिणामों पर भी ध्यान देती है।

4, इस विचारधारा के अनुसार प्रबन्धक वही व्यवहार करते हैं जो परिस्थितियों की माँग के अनुकूल होते हों।

5, यह विचारधारा प्रबन्ध विधि एवं निर्णयों को पर्यावरण से जोड़ने पर बल देती है।

6, विशिष्ट संगठन-पर्यावरण-सम्बन्धों के कारण कोई क्रिया ऐसी नहीं है, जोकि सार्वभौमिक हो।

7, यह विचारधारा प्रबन्धकीय निर्णयों एवं तकनीकों को परिस्थितियों के सन्दर्भ में समायोजित करने पर बल देती है।

8, संगठन- संरचना ऐसी होनी चाहिए, ताकि वह संगठन को बाहरी पर्यावरण के साथ स्वस्थ अन्तर्सम्बन्धों की स्थापना में सहायता प्रदान कर सके।

सम्भाव्यता/प्रासंगिक विचारधारा का उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण (Explanation of Contingency Approach by Means of an Illustration)- मान लीजिए कि एक व्यावसायिक उपक्रम में उत्पादन में वृद्धि करने के लिए वहाँ पर कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठित प्रबन्ध विचारक कार्य-सरलीकरण योजना लागू करने का सुझाव देंगे। व्यवहारवादी प्रबन्ध विचारक कार्य के वातावरण को कार्य एनरिचमेण्ट योजना द्वारा मनोवैज्ञानिक रूप से अभिप्रेरित करने का सुझाव देंगे। इसके विपरीत, प्रासंगिक विचारधारा को अपनाने वाले प्रबन्धक पहले तो विद्यमान परिस्थिति एवं पर्यावरण का विस्तृत रूप में अध्ययन करेंगे। तत्पश्चात् यह पता लगाने की चेष्टा करेंगे कि विद्यमान परिस्थितियों में कौन-सी सर्वोत्तम प्रबन्ध तकनीक, विधि अथवा सिद्धान्त कार्य करेगा। वे यह देखेंगे कि यदि कर्मचारी अकुशल हैं और संसाधनों का अभाव है तो कार्य सरलीकरण की योजना अपनाना श्रेष्ठ रहेगा। इसके विपरीत, यदि कर्मचारी कुशल हैं और प्रबन्ध उनकी योग्यता में गर्व का अनुभव करता है, तो वे कार्य एनरिचमेण्ट योजना को लागू करने का निर्णय लेंगे। इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि प्रासंगिक विचारधारा विद्यमान परिस्थिति एवं पर्यावरण की आवश्यकता के अनुरूप प्रबन्ध करने पर बल देती है।

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मूल्यांकन (Appraisal)- प्रासंगिक विचारधारा व्यवसाय तथा उसके पर्यावरण में उचित सम्बन्ध बनाए रखने में सहायक है। इस विचारधारा से संगठन तथा पर्यावरण के आपसी सम्बन्ध का पता चलता है। यह विचारधारा व्यावहारिक दष्टि से अधिक सही लगती है और प्रबन्धकों को निरन्तर जागरुक रखती है। इसे अपनाकर प्रबन्धक बदलती हुई परिस्थितियों में व्यवसाय की सफलता कायम रख सकते हैं, परन्तु यह विचारधारा अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई है।

संक्षेप में, इस विचारधारा के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं (i) यह विचारधारा व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। (ii) इस विचारधारा के आधार पर ठोस निर्णय लिये जा सकते हैं।

(iii) यह विचारधारा प्रबन्धक को परिस्थिति की जटिलताओं के प्रति सचेत करती है।

(iv) यह विचारधारा परिस्थिति की जोखिमों, अनिश्चितताओं एवं दुष्प्रभावों से संगठन की रक्षा करती है।

(v) यह विचारधारा व्यक्तियों, कार्यों तथा प्रबन्ध की अन्तर्निर्भरता को समझने में सहायक होती है।

(vi) यह विचारधारा परिवर्तनों का प्रबन्ध करने में सहायता करती है।

सीमाएँ (Limitations)-यद्यपि प्रासंगिक विचारधारा का प्रबन्ध के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है, परन्तु इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण कमियाँ अथवा सीमाएँ दृष्टिगोचर होती हैं

1, इस विचारधारा को सैद्धान्तिक रूप से समझना आसान है, परन्तु व्यवहार में प्रयोग करना बहुत जटिल है। कभी-कभी परिस्थितियों की जटिलता एवं तीव्रता के कारण उनको समझना कठिन हो जाता है।

2, प्रासंगिक विचारधारा के सम्बन्ध में अभी तक Experimental एवं Research कार्य बहुत कम हुआ है जिसके कारण ऐसे सिद्धान्त विकसित नहीं हो सके है, जो यह बता सकें कि अमुक परिस्थितियों में अमुक प्रबन्धकीय तकनीक उपयुक्त रहेगी। इसलिए प्रबन्धक इस विचारधारा का पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।

Development of Management Thought


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