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Bcom 1st Year Chapter Wise Notes Effective Communication In Hindi

B.com 1st Year Chapter Wise Notes Effective Communication In Hindi

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Bcom 1st Year Chapter Wise Notes Effective Communication In Hindi

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प्रभावी संचार का अर्थ व परिभाषा

Meaning of effective communication

व्यवसाय के अंतर्गत संचार प्रणाली केवल तभी सफल हो सकती थी जब वह प्रभावशाली हो | संचार एक दिव्मर्गीय प्रक्रिया है इसके लिए यह आवश्यक है की पहले व्यक्ति के विचार , दूसरा व्यक्ति अच्छी प्रकार समझ सके और उसी के आधार पर कार्य कर सके | इसके विपरीत , यदि दूसरा व्यक्ति पहले व्यक्ति के विचार न तो समझ पता है और न ही उसके आधार पर कार्य कर पता है तो संचार का कोई महत्व नही रह जाता है संचार तभी प्रभावी होगा जब प्रेषक उसे जिस भाव से दे , प्राप्तकर्ता उसे उसी भाव से समझे और उससे प्रभावित हो | अत: प्रभावी संचार से आशय उस संचार प्रक्रिया से है जो प्राप्तकर्ता को प्रभावित करती है इस द्रष्टि से यह आवश्यक होता है की सन्देश स्पष्ट , संछिप्त तथा अर्थपूर्ण हो | प्ल्र्भावी संचार सन्देश भेजने तथा सन्देश प्राप्त करने की कला पर निर्भर करता है | प्रभावी संचार को विधानों ने निम्लिखित प्रकार परिभाषित किया है –




हैने यागर व हैंकर मैंन के शब्दों में , “ प्रभावी संचार वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सूचना भेजी तथा प्राप्त की जाती है | यह प्रबंध के  लिए आधारभुत व्यवस्था है जिसके बिना संगठन का अस्तित्व नही रह सकता है | इसका कारण बहुत स्पष्ट है की यदि हम अपने कराम्चारियो के साथ सवांद नही कर सकेगे तो हम किस प्रकार कम चाहते है , यह सूचित नही कर  सकेंगे | “

के० ओ० लोकर के शब्दों में , “ प्रभावी संचार वह प्रक्रिया है जिसमे व्यक्तियों ,समूहों तथा संगठनो के बिच में सुचना को सूचित करने , निवेदन करने , प्रोत्साहित करने तथा ख्याति प्राप्त करने के उदेश्य से प्रेषित किया जाता है | यह स्पष्ट , पूर्ण तथा सही होती है तथा पाठक का समय बचाती है और अपने उदेश्यों को प्राप्त करने में सहायक होती है “|

अत: स्पष्ट है की प्रभावी संचार वही होता है जो सही , शुध एंव पूर्ण हो तथा जिससे संचार के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है |

प्रभावशाली सम्प्रेषण के आवश्यक तत्व अथवा सिधान्त

( ESSENTIALS OF EFFECTIVE COMMUNICATION )

व्यावसायिक संचार व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए जिन महत्वपूर्ण बातो तथा नियमो को ध्यान रखना आवश्यक है , उनको संचार के सिधांत या प्रभावशाली संचार के आवश्यक तत्व कहा जाता है | व्यावसायिक संचार को पोर्भावी बनाने के लिए विभिन्न विद्वानों ने कई सिधांत दिए , जिनमे से प्रमुख सिधांत निम्नलिखित है –

(1)  स्पष्टता का सिधांत:- सम्प्रेषण की प्रक्रिया मुख्य रूप से दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बिच होती है | अत: प्रभावी सम्प्रेषण में हमें यह स्पष्ट होना चाइये की हम क्या कहना चाहते है | सन्देश ऐसा होना चाइये की उसका प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों सामान अर्थ लगाये | सम्प्रेषण तभी सफल मन जाता है , जब प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों सन्देश का सामान अर्थ समझे | सन्देश देते समय शब्दों के चयन के समय इस बात का ध्यान रखना चाइये की शब्द सामान्य रूप से प्रयोग किये जाने वाले हो , बहु अर्थी सह्ब्दो का प्रयोग न किया जाये |

(2)  संछिप्ता का सिधान्त :- प्रभावी सम्प्रेषण के लिए यह आवश्यक है की सन्देश संछिप्त हो तथा उसमे अनावश्यक शब्दों का प्रयोग नही किया जाना चाइये | सन्देश जितना अधिक छोटा होता है उसे भेजते और समझने में उठी ही सुविधा रहती है , लेकिन सन्देश को संछिप्त बनाते समय वह ध्यान  रखना जरुरी है की गह स्पष्ट या अर्थपूर्ण बना रहे |

(3) ध्यान आकर्षण का सिधांत :-  संचार ऐसा होना चाइये जो लोगो का ध्यान आकर्षित क्र सके | सन्देश देते समय लोगो की रूचि , एंव आवश्यकताओ को भी ध्यान में रखना चाइये तथा सन्देश से सम्बंधित प्रभाव को भी स्पष्ट कर देना चाइये |

(4) पूर्णता का सिधांत :- प्रेषित किया गया सन्देश उदेश्य प्राप्ति के लिए अपने आप में पूर्ण होना चाइये | अपूर्ण सन्देश उद्देश्य को पूरा नही क्र पोअते है और भरम की शिति उत्पन्न करते है सन्देश न अधिक छोटे होने चहिये  न अधिक बड़े |

(5) समयानुकूलता का सिधांत :- संचार को प्रभावशाली बनाने के लिए यह आवश्यक है की वह समयानुकूल हो | अलग अलग संदेशो का अलग –अलग समय पर महत्व होता है , अत: सन्देश समय को ध्यान में रखते हुए दिया जाना चाइये | यथा समय सन्देश न भेजने से उसका प्रभाव स्वत: कम हो जाता है |

(6)  संग्गता का सिधान्त :- यह सिधांत इस बात पर बल देता है की प्रेषित की जाने वाली सूचनाये एंव सन्देश संस्था की नीतियों में परस्पर विरोध नही होना चाइये |

(7)  उपयुक्त प्रसारण का सिधान्त :-  संचार का यह सिधांत इस बात पर जोर देता है की प्रेषित सुचना या सन्देश उपयुक्त व्यक्ति या विभाग के पास युप्कुत साधन द्वारा उपयुक्त समय में पहुचाई जनि चाइये | दुसरे शब्दों में , संचार्क्र्ताओ अथवा प्रबंध को संचार के दौरान समय , साधन एंव परिस्थितियों पर पूर्ण विचार करके ही कोई निर्णय लेना चाइये |

(8) सामान्य श्रोत का सिधांत :- संचार के दौरान सूचनाओ , संदेशो एंव तथ्यों का प्रसारण एक सामान्य श्रोत से किया जाना आवश्यक है , अन्यथा अधीनस्थ कर्मचारी इधर उधर से सूचनाये प्राप्त करने का प्रयास करेगे | परिणामस्वरूप सन्देश अथवा सुचना के भ्रमक या विकर्त होने की सम्भावनाये बढ़ जाती है और क्रमचारियो एंव प्रबंधको के मध्य  गलतफहमी का वातावरण तैयार होने लगता है , जिसे किसी भी द्रष्टि से उचित नही कहा जा  सकता |

(9) ध्यानपूर्वक श्रवण का सिधांत :- सम्प्रेषण उस समय तक प्रभावी नही हो सकता जब तक प्राप्तकर्ता उसे ध्यानपूर्वक घ्रण न करे | अत: प्रेषक व प्राप्तकर्ता दोनों का उतरदायित्व है की वे प्रभावी के लिया एक दुसरे की बात को ध्यान से सुने प्रबंधक को अच्छा श्रोता भी होना चाइये वर्ना एक तरफा संचार निश्चित रूप से प्रभावहीन हो जायेगा |

(10) प्रतिपुष्टि का सिधांत :- सम्प्रेषण को तभी सफ़लत मना जाता है जब सन्देश प्राप्त करने वाला वांछित प्रतिक्रिया को व्यक्त करे और यह जानने के लिए सम्प्रेषण की प्रतिपुष्टि आवश्यक होती है इसलिए संचार प्रणाली ऐसी होनी चाइये जिससे लगातार प्रतिपुष्टि प्राप्त होती रहे |

(11)  प्रत्यक्ष संचार का सिधांत :- इस सिधांत के अनुसार सन्देश सम्बंधित व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से प्रेषित किया जाना चाइये क्योकि संचार प्रक्रिया में अधिक मध्यस्थ होने से संचार की प्रभावशीलता तथा सुधता कम हो जाती है |

(12) प्रशासन के विभिन्न अंगो में मधुर सम्बन्ध :- संदेश्वाहन के प्रभावशाली होने के लिए यह आवश्यक है की प्रशासन के विभिन्न अंगो में मधुर सम्बन्ध हो तभी सन्देश क्रियाशील होकर  अपने लक्ष्यों को प्राप्त क्र सकेगा | शोभना खंडेलवाल के शब्द में “संदेश्वाहन के सम्बन्ध का स्थानापन्न नही होता , किन्तु प्रभावपूर्ण ढंग से कुशल संदेश्वाहन के लिए श्रेष्ठ सम्बन्ध आवश्यक होता है |”

(13) भावनात्मक अपील का सिधांत :- इस सिधान्त की मान्यता है की संचार की सफलता अथवा प्रभावशीलता उसकी भावात्मक अपील पर निर्भर करती है | प्राय: ऐसा ही देखा जाता है की बौधिक या तार्किक संचार की अपेक्षा भावात्मक संचार की अधिक प्रभावशीलता होती है | अत: पर्याप्त मात्रा में तर्क एंव भावुकता दोनों का सुन्दर समिश्रण संचार के अंतर्गत होना चाइये , क्योकि मनुष्य कई अवसरों पर भावना से प्रेषित होकर कार्य करने को तत्पर हो जाता ,  भले ही विवेक तर्क के अधर पर उसका कोई औचित्य नही हो |

(14)  शिष्टता तथा नर्मता का सिधांत :- सन्देश सदैव शिष्ट , शालीन एंव नर्म भाषा में दिए जाने चाइये तभी वह प्रभावशाली हो सकते है | सिष्ट भाषा सन्देश प्राप्तकर्ता पर अनुकूल प्रभाव डालती है नर्म भाषा से दुसरो को सम्मान दिया उज सकता है सन्देश में सदैव ऐसे शब्दों का प्रयोग करना चाइये जिन पर किसी को आपत्ति न हो |




प्रभावी संचार , व्यवसाय में प्रभावी संचार के महत्व

( EFFECTIVE COMMUNICATION , IMPORTANCE OF EFFECTIVE COMMUNICATION IN BUSINESS )

सम्प्रेषण में दक्षता किसी भी व्यवसायिक क्रिया की पूर्व आवश्यकता होती है | यह उस स्थिति में अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जहाँ प्रतिक्षण प्रबंधको , व्यवसायी और उनके ग्राहकों के कार्य के मध्य वाद –सवांद सम्पन्न होता है | संचार व्यवसाय के प्रारम्भकाल से ही उसके अस्तित्व की रक्ष का आधार होता है , यदि संचार प्रकृति रूप जाती है तो संगठन की सभी क्रिया रुक जाएगी | अत: वर्तमान सुचना एंव संचार के गुण में व्यवसायिक सफलता का आधार प्रभावी संचार ही है | व्यवसाय में प्रभावी संचार के महत्व को निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है |




(1)  यह व्यवसाय का जीवन रक्त होता है :- जिस प्रकार मानव शरीर के संचालन के लिए रक्त अनिवार्य होता है , ठीक उसी प्रकार सम्प्रेषण भी व्यवसाय के लिए आवश्यक होता है प्रबंधक अपने विभिन्न कार्यो जैसे योजना बनाना , नीति निर्धारित करना , संगठन की प्रभावी व्यवस्था आदि का सफल संपादन प्रभावी संचार के माध्यम से ही क्र सकते है व्यवसाय में प्रभावी संचार वह माध्यम है जिससे क्रमचारियो की  कर्य्चामता में वृधि , आपसी व्यवहार में समन्वय एंव कार्यो में एकरूपता ली जा सकती है |

(2) नियोजन का आधार :- नियोजन प्रबंध का प्राथमिक कार्य है तथा इसकी सफलता प्रभावी संचार पर ही निर्भर करती है | संस्था के लक्ष्यों को पोराप्त करने तथा विभिन्न स्तरों पर सम्बंधित व्यक्तियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी संचार अत्यंत आवश्यक होता है नियोजन कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु भी कुशल संचार आवश्यक होता है |

 

(3)  निर्णयन का आधार :- व्यवसायिक संगठन व् प्रबंध में पर्बंध्को को पग –पग पर निर्णय लेने पड़ते है तथा छोटी –बड़ी सभी प्रकार की समस्याओ को सुलझाना पड़ता है प्रभावी संचार प्रबंधको को सही तथा शीघ्र निर्णय लेने में सहायक होता है | प्रबंध द्वारा व्यवसाय में किसी भी निर्णय को लेने से पूर्व उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की जाती है और यह सुचना प्रभावी संचार प्रक्रिया द्वारा ही प्राप्त हो सकती है अत: प्रभावपूर्ण संचार के माध्यम से ही प्रबंधकीय निर्णय को कार्यरूप में प्रिंट किया जाता है |

(4)  प्रभावशाली नियंत्रण में सहायक :- वर्तमान समय में व्यावसायिक संगठनो का आकर बहुत विशाल हो गया है जिनमे हजारो /लाखो लोग एक साथ कार्य करते है | इस स्थिति में प्रभावपूर्ण सम्प्रेषण का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है | प्रभावी सम्प्रेषण के द्वारा ही प्रबंधक अपने क्रमचारियो द्वारा किये गये कार्यो की सुचना प्राप्त करके उन पर नियंत्रण रखता है |

(5)  मानवीय संबंधो का विकास :- उत्पादन प्रक्रिया के बदलते परिवेश में अब यह स्वीकार किया जाता है की श्रमिक उत्पादन का सक्रिय एंव महत्वपूर्ण अंग है और उसके साथ श्रेष्ट मानवीय संबंधो पर ही संस्था का भविष्य निर्भर करता है | क्रम्चैर्यो से मानवीय और आत्मीयता पूर्ण संबंधो के निर्माण में प्रभावी संचार प्रक्रिया बहुत सहायक है | संचार द्रस्तिकों बदलने में , क्रमचारियो की नैतिक शक्ति बढ़ने में एंव समन्वय का वातावरण तैयार करने में बहुत मदद करता है अत: संचार एक ऐसा मन्त्र है जिससे मानवीय संबंधो को बनाने एंव उन्हें विकसित करने में बहु मदद मिलती है | संचेप्त में संचार की प्रभावी पोर्नाली प्रबंध की अधीनस्थ क्रमचारियो के विचार बदलने में उसकी नैतिक शक्ति बढ़ने में तथा उन्हें संतुष्टि प्रदान करने में सहायक होती है |

(6) समन्वय क्षमता का विकास :- संचार व्यक्तियों में सहयोग व समन्वय क्षमता का विकास करता है , आपस में सुचना व् विचारो का आदान –प्रदान करता है व उनकी एकता व क्रियाशीलता को बढ़ता है क्योकि एक उपक्रम में विभिन्न विभाग होते है जो अपनी अपनी विशिष्ट क्रियाए अपने विभाग में संचालित करते है | प्रत्येक विभाग अपने सभी विभागीय कार्यो के लिए स्वतंत्र होता है व उच्च प्रबंध के निर्देश में समस्त विभागों के मध्य समन्वय स्थापित करता है | संचार के बिना एकता व क्रियाशीलता का होना असंभव है |

(7)  औधोगिक शांति को बढ़ावा :-अधिकतम उत्पादन के लिए कारखाने में शांति स्थापित रखना आवश्यक है | लम्बी हड़ताल तथा तालाबंदी संस्था को दिवालिया बना देती है | इनको रोकने के लिए आवश्यक है की क्रमचारियो को संस्था के सम्बन्ध में प्रयाप्त जानकारी मिलती रहे | क्रमचारियो को सूचनाओ को पहुचना तथा उनके असंतोष की सुचना तुरंत प्रबंधको को देना भी कुशल संचार प्रणाली पर ही निर्भर करता है |

(8)  प्रभावी नेत्रत्व की स्थापना का आधार :- किसी भी संगठन के प्रभावी नेतर्त्व का आधार प्रभावपूर्ण सम्प्रेषण प्रक्रिया का आधार प्रभावपूर्ण सम्प्रेषण प्रक्रिया होती है क्योकि एक सफल नेतर्त्व के लिए सम्बंधित व्यवसाय के प्रबंधक में सम्प्रेषण कला में दक्षता व योग्यता होना पूर्व अनिवार्य शर्त है एक प्रबंधक सफल नेटर्व करने में तभी सफल होगा जब वह प्रभावी सम्प्रेषण प्रक्रिया के सम्बन्ध में जानकारी रखता हो |

(9)  क्रमचारियो के मनोबल में वृधि :- प्रभावी संचार के द्वारा उपक्रम के क्रमचारियो में उपक्रम के उदेश्यों की प्राप्ति हेतु सरलता से गति प्रदान की जा सकती है | जब संचार के माध्यम से अधिकारियो एंव क्रमचारियो के मध्य विचारो तथा परामर्श का आदान – प्रदान , सुझाव को महत्व तथा शिकायतों का निवारण निरंतर होता रहता है तो उनकी संक्स्था के प्रति अपनत्व की भावना जाग्रत होती है तथा उनके मनोबल में वृधि होती है | परिणामस्वरूप वे कार्य के क्रियान्वयन एंव सफल निष्पादन में जुट जाते है और उनकी कार्य के प्रति रूचि उत्पन्न हो जाती है |

(10)  प्रबंधकीय कार्यक्षमता में वृधि संभव :-  प्रबंधकीय कार्यक्षमता इस बात पर निर्भर करती है की प्रबंधक अपने अधीनस्थ क्रमचारियो से कितनी कुशलतापूर्वक कम करा सकते है | इस कुशलता को प्राप्त करने के लिए प्रबंधक क्रमचारियो भिन्न भिन्न प्रकार के आदेश एंव निर्देश देते है उनकी कठिनाइयों को समझते है तथा उन्हें दूर करने के उपट सुझाते है | इन सब विचारो और संदेशो का आदर –प्रदान होता है और यदि यह आदान –प्रदान गलतफहमियो या नासमझी को उत्पन्न कर देता है तो इसका उधेश्य ही बेकार हो जायेगा और यह कार्यक्षमता बढ़ने के स्थान पर अव्यवस्था ही अधिक पैदा करेगा | इस प्रकार एक प्रबंधक की कार्यक्षमता उसकी अन्य लोगो से संचार योग्यता पर निर्भर करती है |

उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है की प्रभावी संचार आधुनिक व्यवसाय एंव प्रबंध की आधारशिला है | प्रबंधकीय कार्यो का सफलतापूर्वक संचालन करने , शर्मिको से मधुर सम्बन्ध बनाने तथा अधिकतम उत्पादन करने के लिए प्रभावी सम्प्रेषण प्रक्रिया का होना अत्यंत आवश्यक है |

हेराल्ड यास्किन के शब्दों में, “संचार हमारे व्यापर के पोरिचालन में अधिकाधिक महत्वपूर्ण भूमिका ऐडा क्र रहा है – हमें अधिक व्यक्तियों को सूचित करना होता है , अधिक व्यक्तियों की सुन्नी होती है तथा उनसे अपनी समस्याओ को सुलझाने में मदद लेनी होती है और अधिक चीजो के बारे में बातचीत करनी होती है |”


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