B com 1st year Business Environment study material Effects of inflation

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Inflation मुद्रा प्रसार या मुद्रा स्फीति

Meaning of Inflation  मुद्रा स्फीति का अर्थ

B com 1st year Business Environment study material Effects of inflation : सामान्यत: कीमत स्तर में होने वाली निरन्तर व्रद्धि को मुद्रा स्फीति (Inflation) कहा जाता है मुद्रा प्रसार या मुद्रा स्फीति एक ऐसी स्थिति है जिसमे वस्तुओ के मूल्यों में निरन्तर व्रद्धि होती जाती है तथा मुद्रा के मूल्य में कमी होती जाती है |




जव देश में वस्तुओ और सेवाओ के उत्पादन की तुलना में मुद्रा की मात्रा में अपेश्रक्र्त तीर्व व्रद्धि होती है, तो मुद्रा स्फीति की स्थिति उत्पन हो जाती है | इससे मुद्रा की एक इकाई का मूल्य गिर जाता है तथा सामान्य मूल्य स्तर ऊँचा उठ जाता है उदाहरण के लिये स्वतन्त्रता से पूर्व एक रूपये में एक किलो देशी घी आता था जबकि वर्तमान में 350 रू में एक किलो घी आ रहा है, तो इस स्थिति को मुद्रा प्रसार की स्थिति कहेगे, क्योकि वस्तु (घी) का मूल्य बढ़ गया है तथा मुद्रा का मूल्य (रूपये) का मूल्य गिर गया है |

 

क्राउथर के अनुसार, “मुद्रा प्रसार यह अवस्था है जिसमे मुद्रा का मूल्य गिरता है और पदार्थो के मूल्य बढ़ते है |”

 

केमरर के अनुसार, “मुद्रा प्रसार की अवस्था उस समय विधमान होती है, जबकि मुद्रा की मात्रा अधिक हो, वस्तुओ तथा सेवाओ की मात्रा बहुत कम हो |”



 Types of Effects of inflation ( मुद्रा प्रसार के प्रकार )

 

  1. चलन स्फीति (Currency Inflation)— जब देश में मुद्रा की मात्रा बढ़ जाने से स्फीति उत्पन होती है, तो इसे चलन स्फीति कहते है | चलन स्फीति प्राय: केन्द्रीय बैक द्वारा अधिक कागजी मुद्रा चलन में डालने से उत्पन होती है | इस प्रकार की स्फीति का प्रभाव वस्तुओ के मूल्यों पर तत्काल पड़ता है |
  2. साख स्फीति (Credit Inflation)— जब देश के व्यापारिक बैक तीर्व गति से रकम उधार देने लगते है तो वस्तुओ की माँग बहुत अधिक व्रद्धि होती है | इसके प्रभाव से भी मूल्यों में व्रद्धि होने के लगती है | साख स्फीति प्राय: ब्याज की दर कम करने या ऋण नीति में उदारता बरतने के कारण होती है |
  3. लागत-प्रेरित स्फीति (Cost Push Inflation)— जब किसी देश में उत्पादन लागत में व्रद्धि के कारण मूल्य-स्तर बढ़ता है तो उसे लागत प्रेरित स्फीति कहता है
  4. माँग प्रेरित स्फीति (Demand Full Inflation)— जब देश की जनसख्या व्रद्धि या उपभोग स्तर में व्रद्धि के करण वस्तुओ की माँग बढने से मूल्य बढने लगते है तो इसे माँग प्रेरित स्फीति कहते है |
  5. उत्पादन-जनित स्फीति (Production-based Inflation)— कभी-कभी मानसून असफल होने, सुखा पड़ने, अन्य किसी कारण से फसल नष्ट होने, तथा हड़ताल, आदि के कारण उत्पादन में कमी आ जाती है | इसके प्रभाव से भी मूल्यों में व्रद्धि होती है और स्फीति की स्थिति दिखलाई देने लगती है |
  6. खुली एव दबी हुई स्फीति (Open and Suppressed Inflation)— जब जनता की आय को व्यय करने पर कोई नियन्त्रण न होने के कारण वस्तुओ के मूल्य बढ़ने लगते है, तो इसे खुली स्फीति कहा जाता है | इसके विपरीत जब मूल्य नियन्त्रण व् राशनिग की किर्याओ के कारण काला बाजार में वस्तुओ के मूल्य बढने लगते है, तो उसे दबी हुई स्फीति कहते है |
  7. हिनार्थ-प्रोत्साहित स्फीति (Deficit Induced Inflation)— आधुनिक प्रजातन्त्रवादी सरकारे प्राय: आर्थिक विकास के लिए बड़ी-बड़ी रकमे खर्च करती है | इतनी बड़ी रकमों को करो द्वारा या कभी-कभी ऋणों द्वारा पूरा करना भी सम्भव नही होता, अत: घाटे के बजट बनाए जाते है जिनमे आय कम और खर्च अधिक दिखलाया जाता है | इस घाटे की पूर्ति नए नोट छाप कर की जाती है | पाल इजिग ने इस प्रकार की स्फीति को बजटीय स्फीति (Budgetary Inflation) कहा है | यह घाटे की पूर्ति के कारण उत्पन्न होती है अत:इसे हिनार्थ-प्रोत्साहित भी कहा जाता है |
  8. पूर्ण एव आशिक मुद्रा स्फीति (Full and Partial Inflation)— पूर्ण रोजगार वे बिन्दु से पूर्व मूल्यों में व्रद्धि होने को आशिक स्फीति कहते है क्योकि इस स्थिति में उत्पादन की मात्रा भी बढती है इसके विपरीत जब पूर्ण रोजगार के बाद उत्पादन स्थिति रहने पर मूल्य बढ़ते है, तो उसे पूर्ण मुद्रा स्फीति कहते है |

Effects of Inflation ( मुद्रा स्फीति के प्रभाव )




B com 1st year Business Environment study material Effects of inflation : मुद्रा स्फीति विभिन वर्गो भिन-भिन प्रकार से प्रभावित करती है | इससे कुछ समय तक तो आर्थिक प्रगति को प्रोत्साहन मिलता है परन्तु इसकी निरंतर व्रद्धि आर्थिक विकास की गति को शिथिल बना देती है | वस्तु: मुद्रा स्फीति का समाज के आर्थिक, सामाजिक और राजनितिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पढ़ता है | मुद्रा स्फीति के विभिन प्रभावों को निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है—

भारत में मुद्रा स्फीति के प्रमुख कारण

  1. मुद्रा की मात्रा में व्रद्धि करने वाले कारण
  2. उत्पादन मात्रा में कमी करने वाले कारण

भारत में मुद्रा की मात्रा में व्रद्धि करने वाले प्रमुख कारण

  1. केन्द्रीय बैक की मुद्रा एव साख नीति— सरकार को जब युद्ध, प्राक्रतिक विपति या आर्थिक विकास आदि के लिए अधिक मुद्रा की आवश्यकता होती है तथा वह कर और ऋण से पर्याप्त राशि प्राप्त करने में असमर्थ होती है, तो वह केन्द्रीय बैक के द्वारा पत्र मुद्रा के निर्गमन का सहारा लेती है | इस पत्र मुद्रा के निर्गमन के परिणामस्वरूप मुद्रा की मात्रा में व्रद्धि हो जाती है |

इसी प्रकार जब सरकार के निर्देश पर केन्द्रीय बैक, बैक दर,खुले बाजार की नीति, आदि के माध्यम से अधिक साख का निर्माण करता है तो कुल मुद्रा की मात्रा में अत्यधिक व्रद्धि हो जाती है | इस प्रकार केन्द्रीय बैक मुद्रा तथा साख की मात्रा में व्रद्धि हो जाती है |

  1. हिनार्थ-प्रबन्धक की नीति— जब सरकार अपने बजट का घाटा नई मुद्रा छापकर पूरा करती है तब ‘हिनार्थ-प्रबन्धन’ की सज्ञा दी जाती है | इससे प्रचलन में मुद्रा की मात्रा तथा जनता की मोद्रिक आय अनिवार्यत: बढ़ जाती है फलत: वस्तुओ और सेवाओ की माँग और मूल्य बढने लगते है |
  2. मुद्रा की चलन गति में व्रद्धि— जनता की उपभोग-प्रवर्ती बढ़ जाने या तरलता पसंदगी कम हो जाने से मुद्रा की चलन गति बढ़ जाती है | अत: मुद्रा का प्रवाह (जनता की मोद्रिक आय) बढ़ जाता है जिससे वस्तुओ और सेवाओ की माँग एव कीमतों में वर्धि को जन्म मिलता है |
  3. व्यापारिक बैक की साख नीति— जब व्यापारिक बैक अपने नकद जमा अनुपात में कमी कर साख की मात्रा बढ़ाने लगते है तो मुद्रा की पूर्ति अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ जाती है जबकि वास्तविक आय स्थिर रहती है | इससे मुद्रा स्फीति उत्पन होने लगती है |
  4. काले धन की अर्थव्यवस्था (Black Money)— कर-प्रशासन की ढिलाई और अकुशलता के कारण करो की चोरी के रूप में ‘बिना हिसाब की मुद्रा’ की मात्रा बढती जाती है | इससे काले धन की अर्थव्यवस्था का जन्म होता है जो अनियन्त्रित रूप से वस्तुओ और सेवाओ की माँग पर दबाव उपस्थित करती है |
  5. विकास जनित दबाव— नियोजन अर्थव्यवस्था में पुजीगत उधोगो की स्थापना तथा अन्य विकास के कार्यो पर बड़ी मात्रा में निवेश किया जाता है | फलत: जनता की मोद्रिक आय बढ़ जाती है इससे सिमित मात्रा में उपलब्ध उपभोग-पदार्थो पर दबाव उत्पन हो जाता है और कीमतों बढने लगती है |
  6. विदेशी पूजी का आयत— जब देश में विदेशी पूजी एव सहायता का निरंतर आयत होता रहता है तो जनता की मोद्रिक आय बढने लगती है फलस्वरूप मुद्रा स्फीति उत्पन हो जाती है |

Efforts made by the government to control inflation in India (भारत में मुद्रा स्फीति को नियन्त्रित करने के लिए सरकार द्वारा किये गये प्रयास )




B com 1st year Business Environment study material Effects of inflation : मुद्रा स्फीति के आर्थिक, सामाजिक एव राजनैतिक प्रभाव इतने व्यापक एव गम्भीर होते है की स्फीति को रोकना सरकार का परम कर्तव्य हो जाता है | सरकार द्वारा मुद्रा-स्फीति को नियन्त्रित करने के लिये निम्न उपायों का सहारा लिया जा सकता है—

  1. मोद्रिक उपाय— मोद्रिक उपायों के अन्तगर्त उन किर्याओ को शामिल किया जाता है जिनके द्वारा केन्द्रीय बैक मुद्रा की मात्रा तथा साख नियन्त्रण करता है | इसमे निम्नाकित कार्य आते है—
  • मुद्रा निर्गमन सम्बन्धी नियमो को कठोर बनाना
  • पुरानी मुद्रा को नष्ट कर के नयी मुद्रा का चलन करना
  • साख पर नियन्त्रण

 

  1. राजकोषीय उपाय— इसमे उन उपायों को सम्मिलित किया जाता है जिसमे सरकार कर, बजट, आय, व्यय, ऋण, आदि नीतियों में परिवर्तन के द्वारा स्फीति पर नियन्त्रण रखती है | इसमे निम्नाकित कार्य आते है—
  • करो में वर्धि
  • सावर्जनिक व्ययों में कमी
  • सन्तुलित बजट नीति
  • बचतों को प्रोत्साहन
  • सावर्जनिक ऋणों में वर्धि
  • अति मूल्यंन
  • मजदूरी नियन्त्रण

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