Advertising Bcom Notes

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Advertising Bcom Notes:- In this post, we will give you notes of Principal of Marketing of BCom 3rd year English and Hindi, Advertising Bcom Notes Hindi and English. Advertising Bcom Notes PDF

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विज्ञापन (Advertisement)

 

विज्ञापन का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Advertisement)

विज्ञापन दो शब्दों से मिलकर बना है, वि + ज्ञापन वि का अर्थ है विशेष या विशिष्ट और ज्ञापन का अर्थ ज्ञान कराना अर्थात् विशेष ज्ञान कराने को ही विज्ञापन कहते हैं। साधारण भाषा में विज्ञापन का आशय वस्तु के सम्बन्ध में विशेष या विशिष्ट जानकारी देने से लगाया जाता है परन्तु यह विचारधारा अपने आप में पूर्ण नहीं है। आधुनिक युग में विज्ञापन का क्षेत्र व्यापक होता जा रहा है। वर्तमान समय में विज्ञापन के अन्तर्गत उन सभी क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है, जिनके द्वारा जनता को वस्तुओं एवं सेवाओं के सम्बन्ध में जानकारी देने साथ-साथ उन्हें क्रय करने के लिए भी प्रेरित किया जाता है। वुड (Wood) के अनुसार, “विज्ञापन जानने, स्मरण रखने तथा कार्य करने की एक विधि है।” व्हीलर (Wheeler) के अनुसार, “विज्ञापन लोगों को क्रय करने के लिये प्रेरित करने के उद्देश्य से विचारों, वस्तुओं तथा सेवाओं का अवैयक्तिक प्रस्तुतीकरण है जिसके लिये भुगतान किया जाता है। ”

अमेरिकन मार्केटिंग एसोसियेशन (American Marketing Association) के अनुसार, “विज्ञापन एक परिचय प्राप्त प्रायोजक द्वारा अवैयक्तिक रूप से विचारों, वस्तुओं या सेवाओं को प्रस्तुत करने तथा संवर्द्धन करने का एक प्रारूप है जिसके लिये भुगतान किया जाता है।”

 

विज्ञापन माध्यम का चुनाव करते समय ध्यान रखने योग्य बातें (Factors to be Considered While Selecting Advertising Media)

किसी वस्तु के विज्ञापन में विज्ञापन माध्यम का महत्वपूर्ण स्थान होता है। विज्ञापन का उद्देश्य जन सामान्य को प्रभावित करना होता है और जन-सामान्य कभी-भी समान प्रवृत्तियों, भावनाओं, विचारों, संस्कृति व इच्छाओं वाला नहीं हो सकता। सामान्यतः विज्ञापन के माध्यम का चुनाव करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

(1) वस्तुओं की प्रकृति (Nature of the Product) – वस्तुएँ अनेक प्रकार की होती हैं, जैसे-खाद्य सामग्री की वस्तुएँ, अन्य नवीय आवश्यकताओं सम्बन्धी वस्तुएँ, कृषि एवं व्यापारिक आवश्यकताओं सम्बन्धी वस्तुएँ। इन विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के लिए विभिन्न प्रकार के माध्यम उपयुक्त रहते हैं। अत: माध्यम के चुनाव में वस्तु की प्रकृति भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

(2) जनता का वर्ग (Class of Peoples) – जनता में कई वर्ग होते हैं, जैसे- धनवान, मध्यम, गरीब वर्ग आदि। मध्यम एवं धनी वर्ग के लिये विज्ञापन उच्च किस्म की पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों, टेलीविजन आदि के माध्यम से किया जाता है। निम्न वर्ग के लिये विज्ञापन का माध्यम भी उनके शिक्षा स्तर पर ही निर्भर करेगा।

(3) बाजार की प्रकृति (Nature of the market) – यदि वस्तु का बाजार सम्पूर्ण देश है तो राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन करना होगा। जबकि यदि वस्तु का बाजार किसी स्थान विशेष तक सीमित है तो उस स्थान विशेष के समाचार पत्रों, स्थानीय रेडियो स्टेशनों कार कार्ड आदि से विज्ञापन किया जाता है।

(4) विज्ञापन का उद्देश्य (Object of the Advertising) – किसी विज्ञापन माध्यम के चुनाव पर विज्ञापन उद्देश्य का प्रभाव पड़ता है, जैसे यदि विज्ञापन तुरन्त कराना है तो इसके लिये समाचार पत्र व रेडियो लीक है। इसी प्रकार यदि विज्ञापन का उद्देश्य दीर्घकालीन प्रभाव डालना है तो पत्रिकाएँ ङ्गीक हैं।

(5) सन्देश सम्बन्धी आवश्यकताएँ (Message Requirement) – विज्ञापन सन्देशों को सभी प्रकार के माध्यम से एक-सा प्रसारित नहीं किया जा सकता है, जैसे यदि किसी विज्ञापन में चित्र या प्रदर्शन कराना आवश्यक है तो ऐसा विज्ञापन टेलीविजन से कराना उचित होगा। इसी प्रकार यदि विज्ञापन का सन्देश छोटा है तो उसको समाचार पत्र व पत्रिकाओं में दिया जा सकता है।

(6) माध्यम की लागत (Media Cost) – अधिकांश व्यावसायिक संस्थाओं के पास सीमित विज्ञापन कोष होते हैं, अतः प्रत्येक संस्था में उन सीमित कोषों का अधिकाधिक लाभप्रद ढंग से प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए जिससे कि उनके द्वारा अधिकाधिक लाभ प्राप्त किया जा सके।

(7) माध्यम की प्रतिष्ठा (Media Character) – माध्यम के चुनाव में माध्यम की प्रतिष्ठा का भी ध्यान रखना चाहिए। एक समाचार पत्र पत्रिका की प्रतिष्ठा का अनुमान उसके पाठकों की संख्या, सम्पादकीय तथा इसमें दिये जाने वाले विज्ञापनों के आधार पर लगाया जा सकता है।

(8) माध्यम का चलन (Circulation of the media) – विज्ञापन माध्यम का चुनाव करते समय माध्यम के चलन का भी ध्यान रखना चाहिए और उसी माध्यम को चुनना चाहिए जिसका चलन सबसे अधिक हो ।

(9) विभिन्न माध्यमों का तुलनात्मक अध्ययन (Comparative study of different media) – विज्ञापन के माध्यमों के चुनाव से पूर्व सब माध्यमों का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए।

 

विज्ञापन के विभिन्न माध्यम अथवा प्रकार (Different Forms or Types of Advertising Media)

विज्ञापन करने के लिये विज्ञापन के साधनों अथवा माध्यमों की जानकारी होना आवश्यक है क्योंकि सही प्रकार के माध्यम के चुनाव से उसको व्यापार की प्रसिद्धी में पूर्ण सफलता मिल सकती है। आजकल विज्ञापन के विभिन्न साधन प्रचलित हैं जिनको निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है –

 

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एक अच्छी विज्ञापन प्रति के आवश्यक गुण (Essentials of a Good Adverstising Copy)

प्रभावी विज्ञापन में अथवा एक विज्ञापन प्रतिलिपि को प्रभावकारी बनाने के लिये उसमें निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है –

(1) ध्यानाकर्षण करना (Attracting Attention) – विज्ञापन प्रति का सबसे महत्वपूर्ण गुण जनसाधारण का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना है। इसके लिये प्रतिलिपि में बड़े-बड़े शीर्षक, उपशीर्षक, चित्र, रंगों आदि का उपयोग किया जा सकता है जिससे कि जनसाधारण ऐसे विज्ञापनों को देखने के लिये विवश हो जाये और उनकी निगाह ऐसे विज्ञापन प्रतिलिपि पर अवश्य पड़ जाए।

(2) रुचि उत्पन्न करना (Arousing Interest) – एक विज्ञापन प्रतिलिपि का महत्वपूर्ण तत्व पढ़ने वालों में रुचि उत्पन्न करना होना चाहिए। इसके लिये विज्ञापन को मनोरंजक बनाया जाता है जिससे कि जनता उसको पढ़े। रुचि उत्पन्न करने में चित्र, कहानी, वार्तालाप आदि का भी समुचित उपयोग हो सकता है।

(3) समझने योग्य (Understandable) – विज्ञापन प्रतिलिपि ऐसी होनी चाहिए। कि उसकी भाषा को एक साधारण व्यक्ति भी समझ सके और उसको समझने के लिये किसी शब्दकोष की अन्य व्यक्ति को आवश्यकता न रहे।

(4) विश्वास करने योग्य (Believable) – एक अच्छी विज्ञापन प्रतिलिपि में ऐसा गुण होना चाहिए कि उसको पढ़ने या देखने पर विश्वास हो जाए कि जो भी उसमें लिखा या चित्रित किया गया है वह सही है। इसके लिये अतिश्योक्ति की बातें न करके सत्य का आचरण करना चाहिए।

(5) उपयोगिता सिद्ध करना (Prove Utility) – विज्ञापन प्रतिलिपि ऐसी होनी चाहिए कि वह वस्तु की उपयोगिता को सिद्ध करती हो ताकि ग्राहक को खरीदने के लिये प्रेरित हो, उदाहरण के लिये डिस्प्रिन खाइये और सर दर्द से छुटकारा पाइये।

(6) नवीनता दर्शाना (Demonstrating Novelty) – विज्ञापन प्रतिलिपि ऐसी होनी चाहिए कि उसमें नवीनता दर्शायी जाये जिससे कि ग्राहकों को उत्सुकता पैदा हो जैसे अपने मनचाहे रंगी में लक्स साबुन लीजिए इससे वस्तु को नवीनता का आभास होता है।

(7) सृजनात्मक होना (Be Creative) – विज्ञापन सृजनात्मक होना चाहिए जो ग्राहकों का सृजन करने में समर्थ हो । विज्ञापन में नये-नये ग्राहकों का सृजन करने की क्षमता होनी चाहिए।

 

विज्ञापन की प्रभावोत्पादकता मूल्यांकन की विधियाँ या तरीके (Methods of Evaluating Advertising Effectieness)

फिलिप कोटलर ने विज्ञापन की प्रभावोत्पादकता के मूल्यांकन की निम्नलिखित दो विधियों का उल्लेख किया है –

(I) संचार प्रभाव सम्बन्धी अनुसंधान (Communication Effect Research).

(II) विक्रय प्रभाव सम्बन्धी अनुसंधान (Sales Effect Research ) ।

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(I) संचार प्रभाव सम्बन्धी अनुसंधान (Communication Effect Research)

किसी विज्ञापन कार्यक्रम की प्रभावोत्पादकता दो प्रकार से मापी जा सकती है। एक तो विज्ञापन प्रति को विज्ञापन माध्यम को भेजने से पूर्व मापना कि क्या वह विज्ञापन प्रभावकारी होगा? इसको पूर्व परीक्षण (Pre testing) कहते हैं। दूसरे, जब विज्ञापन जनता तक पहुँच जाता है तब उसकी प्रभोत्पादकता आँकी जाती है इसको विज्ञापन के बाद परीक्षण (After testing) कहते हैं। संचार अनुसन्धान के लिए सामान्यतया निम्नलिखित परीक्षण प्रयोग किये जा सकते हैं –

(1) सम्मति अनुसंधान (Opinion or Ranking Test) – इस विधि को उपभोक्ता पंच परीक्षण (Test of Consumer Jury) भी कहते हैं। यह पूर्व परीक्षण (Pre testing) की विधि है। इस विधि के अन्तर्गत सम्भावित उपभोक्ताओं की कुछ पैनले (Pannels) तैयार की जाती हैं। प्रत्येक पैनल में सभी प्रकार के ग्राहकों के 8 से लेकर 10 सदस्य हो सकते हैं। इस विधि के अन्तर्गत प्रस्तावित विज्ञापनों के पैनलों को दिखाया जाता है और उन पैनलों की प्रतिक्रियायें एवं टिप्पणियाँ आमन्त्रित की जाती हैं। ऐसे परीक्षण के निष्कर्षो को निम्नांकित दो तरीकों द्वारा अभिलिखित किया जा सकता है –

(i) योग्यता क्रम परीक्षण (Order or Merit Test) – इसके अन्तर्गत उपभोक्ताओं को विज्ञापन की अनेक प्रतिलिपियाँ दी जाती है और प्राथमिकताएँ देते हुए अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने को कहा जाता है। उपभोक्ता, योग्यता के अनुसार प्राथमिकताएँ देते हैं। दूसरे शब्दों में, सबसे अच्छी लगने वाली प्रति को प्रथम और सबसे खराब प्रति को अन्तिम प्राथमिकता दी जाती है। उपभोक्ताओं की इन प्राथमिकताओं के विश्लेषण द्वारा निष्कर्ष निकाल लिया जाता है।

(ii) तुलनात्मक युगल परीक्षण (Paired Comparison Test) – इसके अन्तर्गत उपभोक्ताओं को विज्ञापन प्रतियों को जोड़े में दिया जाता है और सर्वोत्तम का चुनाव करने के लिए कहा जाता है। इसमें सभी विज्ञापन प्रतियों की एक-दूसरे से तुलना जोड़ों के आधार पर की जाती है। जोड़ों के आधार पर तुलना का कार्य तब तक चलता रहता है जब तक कि सभी प्रतियों की एक-दूसरे से तुलना न हो जाये। जो विज्ञापन की प्रति सबसे ज्यादा बार पसन्द की जाये, उसे ही सर्वोत्तम प्रतिलिपि के रूप में चुन लिया जाता है।

(2) स्मृति परीक्षण (Memory Tests) – स्मृति परीक्षणों का प्रयोग विज्ञापन के ध्यानाकर्षण सम्बन्धी महत्व को जानने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, उपभोक्ताओं या विज्ञापन प्रत्यर्थी को कुछ सेकेण्डों के लिए विज्ञापन की प्रति को दिखाया जाता है इसके कुछ समय बाद प्रत्यर्थी से विज्ञापन के तत्वों के सम्बन्ध में उसे जो भी याद रहा हो, बताने के लिए अनुरोध किया जाता है। इस प्रकार के परीक्षणों से यह ज्ञात किया जा सकता है कि विज्ञापन उपभोक्ताओं का ध्यान किस सीमा तक आकर्षित करने में सफल हो सकेगा।

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(II) विक्रय प्रभाव सम्बन्धी अनुसंधान (Sales Effect Research)

विज्ञापन अभियानों का प्रमुख उद्देश्य विक्रय मात्रा में वृद्धि करना होता है। अतः किसी विशेष विज्ञापन अभियोग के पश्चात विक्रय मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ा है यह जानने के लिए विक्रय विश्लेषण किया जाता है।

विक्रय प्रभाव सम्बन्धी अनुसंधान विधि में दो क्षेत्रों को चुना जाता है जिन्हें परीक्षण क्षेत्र और नियन्त्रण क्षेत्र कहा जाता है। परीक्षण क्षेत्र वह क्षेत्र होता है। जहाँ विज्ञापन किया जाता है और नियन्त्रण क्षेत्र वह होता है जहाँ विज्ञापन नहीं किया जाता। मान लीजिये कि विज्ञापन प्रारम्भ करने से पूर्व दोनों क्षेत्रों में विक्रय की मात्रा समान हो तो यदि विज्ञापन प्रारम्भ करने से परीक्षण क्षेत्र में विक्रय की मात्रा में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है तो यह माना जाता है कि विज्ञापन प्रभावशाली रहा। यह उल्लेखनीय है कि परीक्षण क्षेत्र में नियन्त्रण क्षेत्र की तुलना में विक्रय की मात्रा में पर्याप्त वृद्धि होनी चाहिए, तभी विज्ञापन प्रभावोत्पादक कहलायेगा।

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विज्ञापन के उद्देश्य (Objects of Advertisement)

विज्ञापन के उद्देश्यों के सम्बन्ध में विलियम जे० स्टेण्टन ने कहा है कि “विज्ञापन का एक मात्र उद्देश्य कुछ बेचना है— उत्पाद, सेवा या कोई विचार”।

फिलिप कोटलर के अनुसार, “विज्ञापन का उद्देश्य सम्भावित ग्राहकों को फर्म के प्रस्तावों के प्रति अधिक अनुकूल बनाना है।”

विज्ञापन के उद्देश्यों का विधिवत् अध्ययन करने के लिए उसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता है

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(I) विज्ञापन के मुख्य उद्देश्य

(i) नव-निर्मित वस्तुओं के सम्बन्ध में जनता को उचित जानकारी देना,

(ii) वस्तुओं या सेवाओं की माँग उत्पन्न करना।

(iii) वस्तुओं या सेवाओं की माँग को स्थिर बनाये रखना।

(iv) वस्तुओं या सेवाओं की माँग को बढ़ाना।

(v) जन साधारण को वस्तु एवं सेवाओं के उपयोग समझाना।

(vi) विक्रेताओं के प्रयत्नों में सहायता पहुँचाना।

(vii) व्यावसायिक सम्बन्धों में सुधार करना।

(viii) उत्पादक या निर्माता की ख्याति में वृद्धि करना।

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(II) विज्ञापन के सहायक उद्देश्य

विज्ञापन के सहायक उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(1) अन्धविश्वासों एवं कुरीतियों के दोष समझाकर उन्हें समाप्त करना, नौकरी प्राप्त करने तथा जीवन साथी चुनने

जैसे अनेक सामाजिक कार्य सम्पन्न करने में सहायता प्रदान करना,

(ii) व्यक्तियों या संस्थाओं का प्रचार करना,

(iii) आर्थिक योजना को सफल बनाने में सहायता प्रदान करना।

(iv) उत्पादन एवं वितरण लागत को कम करना।

(v) जनता को महत्त्वपूर्ण सूचनायें देना।

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“विज्ञापन पर व्यय किया गया धन अपव्यय हैं” (“Money spent on Advertising is Waste”)

विज्ञापन के अनेक लाभ होते हुए भी इसको दोष से मुक्त नहीं कहा जा सकता। विज्ञापन की अनेक कमियों के कारण ही विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विज्ञापन की निरन्तर आलोचनाये की जाती रही हैं। आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से विज्ञापन के प्रमुख दोष अथवा आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) धन का अपव्यय (Extravagance of Money) – विज्ञापन उपभोक्ता को उन वस्तुओं को खरीदने के लिये प्रेरित करता है जिनकी आवश्यकता नहीं है या जो उसके स्तर को देखते हुए विलासिता की है। इस प्रकार ऐसी वस्तुओं पर उसके द्वारा किया गया व्यय अपव्यय ही होता है।

(2) एकाधिकार को प्रोत्साहन – कुछ निर्माता अपनी वस्तु का निरन्तर विज्ञापन कराके बाजार पर एकाधिकार जमा लेते हैं और उपभोक्ताओं से अधिक कीमत वसूल करके उनका शोषण करने लगते हैं।

(3) मिथ्या प्रचार (Misleading Advertising) – विज्ञापन में अधिकांशतः मिथ्या वर्णन होता है, तथा अनेक विज्ञापन कपट पर आधारित होते हैं। विज्ञापन करने वाले अधिक मूल्यवान वस्तुओं को कम मूल्य पर देने का विज्ञापन करते हैं। उपभोक्ता ऐसे विज्ञापन के चक्कर में पड़ जाता है।

(4) अश्लील विज्ञापनों से हानियाँ (Loss Due to obscenely Advertising) – विज्ञापन में कभी-कभी बहुत से चित्र अश्लील भी होते हैं जिनका समाज पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

(5) चंचलता (Instability) – विज्ञापन उपभोक्ताओं के मन को चलायमान कर देता है क्योंकि वह विज्ञापन की चमक-दमक से बहुत प्रभावित हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह उस वस्तु को नहीं खरीद पाता जिसको कि वह वास्तव में खरीदना चाहता है बल्कि उस वस्तु को खरीदता है जिसने उसके मन को मोह लिया है।

(6) सामाजिक बुराइयाँ (Social Evils) – विज्ञापन अधिकतर आरामदायक एवं विलासिता सम्बन्धी वस्तुओं के लिए किया जाता है। इसके कई सामाजिक दुष्परिणाम निकलते हैं। किन्हीं व्यक्तियों को जब किसी एक चीज के उपभोग करने की बुरी आदत पड़ जाती है तो उसका छूटना बहुत कठिन होता है, जैसे-सिगरेट तथा शराब पीना। आजकल विभिन्न प्रकार की सिगरेटों तथा शराब का प्रचार विभिन्न आकर्षक तरीकों से किया जा रहा है, जैसे- “Smoking adds to personality”, “Wine is symbol of friendship”. इन विज्ञापनों से प्रभावित होकर बहुत से व्यक्ति सिगरेट तथा शराब पीना आरम्भ कर देते हैं, बाद में यह आदत छूटती नहीं है।

(7) प्रतिस्पर्द्धा का जन्म (Birth to Competition) – जिन संस्थानों के पास विज्ञापन के लिए पर्याप्त साधन होते हैं वे दूसरी संस्थाओं जिनके पास पर्याप्त वित्तीय साधन नहीं है, से अनार्थिक प्रतिस्पर्द्धा करते हैं, जिससे कम वित्तीय साधन बाली संस्थाओं को हानि पहुँचती है। कभी-कभी प्रतिस्पद्धों के कारण वस्तु को कीमत में कमी करनी पड़ती है, जिसका वस्तु की किस्म पर बुरा प्रभाव पड़ता है |

(8) शहरों के प्राकृतिक सौन्दर्य का विनाश (Loss of Natural Beauty) – दीवारों, चौराहों पर होने वाले विज्ञापनों से शहर का प्राकृतिक सौन्दर्य ही नष्ट हो जाता है क्योंकि शहरों में जगह-जगह पोस्टर और साईन बोर्ड दिखाई देते हैं।

(9) देश के साधनों का अपव्यय (Wastage of National Resources) – विज्ञापन के द्वारा फैशन में परिवर्तन होता रहता है जिससे देश का बहुत सा उत्पादन पुराना एवं अप्रचलित हो जाता है इस कारण देश के साधनों का अपव्यय होता है। इसके अतिरिक्त उत्पादन के साधनों का प्रयोग विज्ञापन में किया जाता है, जिससे प्रत्यक्ष रूप से उत्पादन में वृद्धि नहीं होती।

(10) फैशन परिवर्तन (Changing Fashion) – विज्ञापन फैशन में परिवर्तन करता है जिसका प्रभाव उपभोक्ता व मध्यस्थ दोनों पर पड़ता है। उपभोक्ता को फैशन वाली वस्तु खरीदने में ज्यादा व्यय करना पड़ता है तथा मध्यस्थ को फैशन में परिवर्तन होने से हानि होती है क्योंकि उसकी वस्तु या तो विकती नहीं है या कम मूल्य पर बेचनी पड़ती हैं।

(11) खर्चीला (Expensive) – विज्ञापन पर पर्याप्त मात्रा में व्यय करना पड़ता है जो किसी न किसी रूप से वस्तु के मूल्य में वृद्धि करता है और जिसका अन्तिम बोझ उपभोक्ता पर ही पड़ता है।


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Advertising Media

 

MEANING OF ADVERTISING MEDIA

An advertising media is a means or vehicle of delivering a definite message. It is a means through which an advertising message or information is passed on to the prospective customers, readers, viewers, listeners or passers-by.

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FACTORS TO BE KEPT IN MIND WHILE SELECTING ADVERTISING MEDIA

(1) Nature of the Product: Products which require visual presentation or demonstration should be advertised through T.V. or colour magazines. Customer products like toothpaste, cold drinks meant for masses, requiring wide coverage can be advertised through radio, T.V., newspapers etc. Industrial products like machines, equipments which need focussed coverage can be advertised through trade, technical and professional journals.

(2) Type of Audience: The media habits of target audience should be considered. Illiterate and poor people should be approached through radio, T.V. Educated and well-to-do customers should be approached through newspapers, magazines, outdoor displays.

(3) Nature and Size of Market: Outdoor displays, local cinema theatre, local newspapers are suitable for local markets. For a national market, radio, T.V. or countrywide dailies, magazines can be used.

(4) Advertising Objectives: Suitability of a medium should be judged from the point of view of objectives of advertising. For Example: The press is preferred to project corporate image while radio and T.V. is relevant for product advertising.

(5) Type of Message: Informative and descriptive messages are fit for press, whereas brief and reminding messages can be pushed through video or outdoor media.

(6) Cost of Media: The media should be selected with judicious balancing of cost and benefit consideration. e.g.-T.V. is costlier whereas newspaper is cheap.

(7) Media used by Competitors: Media strategy adopted by competitors should be carefully studied in choosing media for our product. In order to face competition, it becomes necessary to advertise in the popular media.

(8) Speed: Urgent messages require speedy communication systems such as newspaper, T.V., radio.

(9) Size and Nature of Business Enterprise: A manufacturer having comparitively large funds for advertising may choose T.V. or radio or both. On the other hand a medium or small sized businessman may prefer newspaper and magazine as advertising media.

(10) Media Circulation: When message is to be conveyed to masses, newspapers and other media having wide circulation are useful. If message is to be conveyed to limited number of people, direct mail, magazines and other media with limited circulation is useful.

(11) Media Availability: All media are not available to a company at all times whenever required. It may be difficult to obtain space or slot on mass media like T.V., radio at required time. Therefore question of media availability is quite relevant while considering advertising media.

(12) Media Character: Media differ in respect of reach (coverage), frequency and impact. For Example: T.V. is best. suited where high reach and impact is desired. Display has limited reach and impact.

MEDIA OF ADVERTISING

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METHODS OF MEASURING ADVERTISING EFFECTIVENESS

Communication goals can be measured with three kinds of tests which are as follows:

(1) Pre-Tests: Pre-tests are conducted before an Ad is published or relayed. It is also called as ‘copy testing. Some of the pre-campaign tests usually adopted are:

(i) Direct Rating Method: A panel of consumers are shown alternative ad copies and asked to assign points or ratings. The copy scoring high points may be selected..

(ii) Eye Movement Analysis: Respondents have the movements of their eyes recorded as advertisements are shown to them on a screen. The eye camera measures the path taken by the eyes as a subject views an advertisement. This device indicates which parts of the advertisements he reads and how much time is devoted to each part.

(iii) Tachistoscope Tests: Selected consumers are exposed to an advertisement. The time taken for an advertisement to register with an onlooker is recorded. The advertisement is revealed for a split second and perception questions are asked afterwards.

(iv) Portfolio Tests: A selected group of consumers are shown several ad copies simultaneously. Later on, they are asked to remember the ads. This would show the efficiency of the advertisement.

(2) Post Tests: These tests are held after ad is published or relayed. These tests are conducted to measure communication effects on ad as well as actual sales effectiveness. Some of the tests adopted in this context are as follows:

(i) Recall Tests: Consumers are asked to remember everything they saw or heard on media about the company and the product. Their replies show communication effectiveness of an advertisement. These tests could be done as a pre or post test. As a pre test, surveys could be conducted to determine the amount of information learnt by target customers.

(ii) Recognition Tests: Under this test, readers are asked to recognise the ads in a magazine as having seen earlier. They are interviewed to find out how many of them remember the advertisement and how long do they remember it..

(iii) Traffic Counts: This test measures how many people observed a hoarding or poster located at a point.

(iv) Concurrent Tests: Such tests are conducted while the cosumer is being exposed to the advertisement. For e.g-a T.V. viewer can be interviewed while a programme is in progress.

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ROLE OF ADVERTISING

(A) Benefits to Manufacturers:

  1. It increases sales volume.
  2. It helps easy introduction of products in the market.
  3. It helps in reducing production costs considerably.
  4. It helps in increasing profits of a company.
  5. Retail price maintenance is possible.
  6. It helps in creating brand image and goodwill of the manufacturer.
  7. It increases the rate of stock turnover.
  8. It protects the manufacturer from undue dependence on middlemen.
  9. It is helpful in creating or opening up new markets.
  10. It protects the manufacturer against unfair competition and other malpractices of the competitors.

(B) Benefits to Consumers:

  1. Helps the consumers to take decision regarding selection of a product.
  2. Reduces shopping time of consumers.
  3. Modern advertisements are highly informative.
  4. Advertisements help the consumers in intelligent buying leading to satisfaction of wants more effectively and economically.
  5. It enables the consumers to compare merits and demerits of various substitute products.
  6. It enables the consumers to get goods at fair price.
  7. Consumers come to know about the varied and new uses of a product.
  8. It ensures the consumer better quality of goods.
  9. It raises the standard of living of the general public by impelling it to use the articles of modern type which may add to his material well being.

(C) Benefits to Wholesalers and Retailers:

  1. It ensures more economic selling due to reduction in selling cost.
  2. It supplements selling activities.
  3. It enables them to have product information.
  4. It increases the turnover, reduces risk on dead stock, reduction in overhead expenses.
  5. The reputation created by advertising is shared by the wholesalers and retailers alike.

(D) Benefits to Salesmen:

  1. It makes introduction of a product quite easy.
  2. It makes selling efforts more effective and productive.
  3. It helps in establishing permanent relations with the customers.
  4. It enables the salesman to reach the right man with least effort.
  5. It makes the task of salesman easier and simpler by preparing necessary ground to start their operation.

(E) Benefits to Community, Society:

  1. It leads to large scale production creating more employment opportunities.
  2. It promotes art and initiative.
  3. It is responsible for higher standard of living of the people.
  4. It is educative in nature.
  5. Advertising revenue makes the newspapers alive. Cheap production of newspapers is possible through publication of advertisements.
  6. It helps in intense economic activities and stimulates investment.

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CRITICISM OF ADVERTISING

(1) Economic Objections:

(i) Advertising is not Productive: Critics argue that advertising does not produce any tangible goods. Though it is true but all productive work need not necessarily result in tangible goods. On the other hand, it renders a very valuable service i.e., choosing from among the thousands of products which are similar in most respects which in turn leads to satisfaction of customer.

(ii) Advertising Multiplies the Needs of Consumers: It is said that advertising multiplies the needs of consumers by appealing to various sentiments and instincts who are forced to purchase goods which they cannot afford and do not need at all. But this is not entirely true because it helps in the extension of demand.

(iii) Advertising Increases Cost of Goods: In a sense it is true because expenditure incurred on advertisement forms a part of the total cost of the product. But on the other hand it is the advertising cost which brings savings in marketing and distribution cost.

(iv) Advertising Creates Monopoly: Advertising generally lays emphasis on a particular brand or brands. This emphasis makes the consumer to become a slave of a particular brand leading to brand monopoly.

(v) Advertising Encourages Waste: It is regarded as waste in the sense that with changes in fashions and styles, half used or old articles are often discarded.

(vi) Exaggeration of the Facts: The qualities of a product are exaggerated resulting in the creation of demand of those goods which are not useful to the consumers.

(2) Social Objections:

(i) Misrepresentation of Facts: Most of the advertisements contain tall claims in favour of their products.

(ii) Wastage of National Resources: It is said that advertising leads to wastage of national resources. It destroys the utility of the goods much before their normal use due to change in fashion, improved technology etc. This leads to wastage of national wealth.

(3) Ethical Objections:

(i) Moral Degrading: Advertisements contain outraging sentiments, exciting emotions, nude poses of girls and all these are given undue value. These are full of sex appeal, vulgar and are offensive to public decency. They lower down the morale of the younger generation.

(ii) Growth of Materialism: Advertising works to produce a society composed of greedy, self-centered individuals who worship materialism.

(iii) Birth to Social Evils: Advertising appeals make people to use such articles which might affect their health like liquors, cigarettes.

(iv) Consumers’ Deficit: It is argued that advertising forces people to desire and buy things which in fact are not within their reach. This makes a section of the society remain discontented and frustrated.

 

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