Unit 1 Introduction Mcom Notes

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Unit 1 Introduction Mcom Notes:- In this post, we want to tell you that, mcom 1st year introduction: Constitutional Framework of indirect Taxes before GST (Taxation Power of Unioin & State Government); Major Defeat
in the Structure of Indirect Taxes prior to GST; Structure of GST (SGST, CGST, UTGST & IGST); GST Council; GST network State compensation mechanism.

 

परिचय (Introduction)

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार के पास धन का अत्यधिक अभाव था फलस्वरूप राजस्व वृद्धि के लिए सरकार द्वारा विभिन्न कर लगाए गए जिसके फलस्वरूप राजस्व में वृद्धि हुई केन्द्र सरकार के राजस्व का प्रमुख साधन सीमा कर, केन्द्रीय उत्पादन कर एवं सेवा कर था। कुछ कर ऐसे भी थे जिनमें कर का कुछ हिस्सा केन्द्र सरकार एवं कुछ हिस्सा राज्य सरकारों के पास रहता था जैसे अन्तर्राज्यीय क्रय-विक्रय एवं प्रेषण पर केन्द्रीय विक्री कर आदि। हालांकि राज्यों के राजस्व का प्रमुख स्रोत वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर कर, मानव उपभोग की शराब एवं अन्य मादक पदार्थों पर कर, विलासिता कर, मनोरंजन कर आदि पर लगे कर थे।

 

भारत में वस्तु एवं सेवा कर से पूर्व अप्रत्यक्ष करों की स्थिति (Condition of Indirect Taxes in India before GST)

वस्तु एवं सेवा कर के लागू होने से पूर्व अप्रत्यक्ष करों को निम्न प्रकार विभाजित किया गया था –

I, उत्पाद शुल्क

II, सीमा शुल्क

III, सेवा कर

IV, बिक्री कर/मूल्य संवर्द्धन कर

उपर्युक्त करों को निम्न प्रकार समझा जा सकता है –

1, उत्पाद शुल्क (Excise Duty)

केन्द्रीय उत्पाद शुल्क एक अप्रत्यक्ष कर था, जो भारत सरकार द्वारा उत्पादन के प्रारम्भिक बिन्दु पर लगाया और वसूल किया जाता था। इस कर कर योग्य घटना निर्माण (Manufacture) थी। इस कर का प्रशासन भारत सरकार द्वारा किया जाता था और भारत सरकार को यह अधिकार अनुसूची VII की सूची की प्रविष्टि 84 के अधीन प्राप्त था। केन्द्रीय उत्पाद शुल्क केन्द्रीय उत्पादन कर, 1944 के अधीन था। यह कर मूल्यानुसार या केन्द्रीय टैरिफ एक्ट, 1985 में वर्णित विशेष दरों के अनुसार लगाया जाता था। उत्पाद कर में सुधार के रूप में निम्न परिवर्तन हुए –

(i) वर्ष 1986 में मॉडीफाइड वैल्यू एडेड टैक्स (MODVAT) के नाम से एक्साइज ड्यूटी का पहला कर सुधार आया जिसके द्वारा कुछ वस्तुओं में टैक्स क्रेडिट का लाभ दिया गया।

(ii) धीरे-धीरे मॉडवेट को समाप्त करके केन्द्रीय मूल्यवर्द्धन कर [Central Value Added Tax (CENVAT)] लागू किया गया।

(iii) वर्ष 2001 में सेण्ट्रल एक्साइज रूल्स, 1944 को समाप्त करके नये नियम लागू किए गए जिसमें करों के सोपानी प्रभावों को समाप्त करने का प्रयास किया गया।

, सीमा शुल्क (Custom Duty)

सीमा शुल्क केन्द्र सरकार द्वारा लगाया और वसूल किया जाता था। सीमा शुल्क की वसूली आयात एवं निर्यात पर कस्टम एक्ट, 1962 एवं कस्टम टैरिफ एक्ट, 1975 के अधीन की जाती थी तथा इसकी व्यवस्थाएँ एवं नियम कार्गों के आयात-निर्यात, बैगेज, पोस्टेज वस्तुओं और समुद्री जहाजों के आवागमन पर भी लागू होते थे।

आयात निर्यात सम्बन्धी सभी एजेन्सियाँ कस्टम एक्ट से ही संचालित होती थीं तथा सीमा शुल्क का यह अधिकार केन्द्र सरकार को संविधान की अनुसूची VII के केन्द्रीय सूची I की प्रविष्टि 83 के अधीन प्राप्त था।

III, सेवा कर (Service Tax)

भारत में सेवा कर लगाने का अधिकार भी केन्द्र सरकार को प्राप्त था तथा वर्ष 1994 में पहली बार भारत में सेवा कर की अवधारणा लागू की गई। प्रारम्भ में इस व्यवस्था में केवल तीन सेवाओं को ही शामिल किया गया था। बाद में विस्तार करके अनेक सेवाओं को इस दायरे में शामिल किया गया। सेवा कर के लिए अलग से कोई अधिनियम नहीं बनाया गया। यह व्यवस्था वित्त अधिनियम, 1994 के अधीन ही रही । संविधान की अनुसूची VII के केन्द्रीय सूची I की प्रविष्टि 97 के अधीन केन्द्र सरकार ने अपने अधिकारों का प्रयोग करके सेवा कर को लागू किया।

IV, केन्द्रीय बिक्री कर/राज्य मूल्य संवर्द्धित कर [Central Sales Tax/State Value Added Tax (VAT)]

1 अप्रैल, 2005 से देश के कई राज्यों ने अपने यहाँ मूल्यवर्द्धित कर (Value Added Tax) को लागू किया। इसे कर सुधार का सबसे बेहतर रास्ता माना गया। इस कर व्यवस्था ने राज्यों के बिक्री कर को समाप्त कर दिया। यह बिक्री के हर बिन्दु पर लगाया जाने वाला कर था जिसमें टैक्स क्रेडिट की व्यवस्था थी। VAT का ही उन्नत रूप GST को माना जाता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि वस्तु  एवं सेवा कर से पूर्व अप्रत्यक्ष कर उपर्युक्त चार रूपों में वसूल किया जाता था। भारत में सरकार को अप्रत्यक्ष कर लगाने की शक्तियाँ संविधान की अनुसूची VII में वर्णित है जिसके अनुसार केन्द्र और राज्य सरकारों को अलग-अलग शक्तियों प्राप्त है तथा अनुसूची VII में वर्णित विषयों पर ही केन्द्र एवं राज्य सरकारें कर लगा सकती थीं। इन विषयों को निम्न सूचियों में वर्णित किया गया है—

सूची I : केन्द्र सूची

सूची II : राज्य सूची

सूची III : समवर्ती सूची

 

वस्तु एवं सेवा कर से पूर्व अप्रत्यक्ष करों में कमियाँ (Defects of Indirect Taxes before GST)

वस्तु एवं सेवा कर की व्यवस्था लागू करने से पूर्व अप्रत्यक्ष करो के ढाँचे में अनेक विसंगतियां आ गई थी जिस कारण उन्हें समाप्त करने के लिए वस्तु एवं सेवा कर जैसी प्रणाली को लागू करना पड़ा। ये कमियों निम्न प्रकार थी –

1, उत्पादन बिन्दु पर एक्साइज ड्यूटी का लगना (Levy of excise duty on manufacturing point) – केन्द्रीय मूल्यवर्द्धन कर के रूप में किसी वस्तु के उत्पादन बिन्दु पर ही केन्द्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगा देती थी जोकि उत्पादन का हिस्सा बन जाती थी। इस प्रकार, वस्तु का मूल्य प्रारम्भिक स्तर पर ही बढ़ जाता था। इसके अलावा इस व्यवस्था में एक्साइज ड्यूटी लगाने के लिए वस्तु की उत्पादन लागत को आधार न बनाकर उसके मूल्यांकन लागत पर ड्यूटी लगायी जाती थी जो कभी उत्पादन लागत से कम, कभी अधिक होती थी। अतः इसमें एकरूपता का अभाव था।

2, करों का सोपानी प्रभाव (Cascading effect of taxes) – करों के सोपानी प्रभाव से केन्द्र एवं राज्य दोनों की कर प्रणालियाँ प्रभावित थीं। एक बिन्दु पर कर लग जाने के बाद वह कर वस्तु की लागत का हिस्सा हो जाता है। अगले क्रम में जब कर लगता था तो इस जुड़े हुए कर पर भी टैक्स लग जाता था। इस प्रकार कई सोपानों पर कर पर कर लगने के कारण वस्तुओं की कीमत बढ़ती रहती थी तथा राज्य करों में भी कई स्तरों पर टैक्स क्रेडिट की सुविधा नहीं थी। केन्द्रीय विक्री कर भी कर पर कर की नीति को बढ़ावा दे रहा था, ऐसे में वस्तुओं की कीमत अधिक हो जाती थी।

3, कर विवादों की अधिकता (Huge pendency of taxation disputes) – व्यवस्थाओं और नियमों में एकरूपता न होने के कारण कर विवादों को बढ़ावा मिलता था। कभी-कभी तो यही विवाद होता था कि कोई सौदा विशेष राज्य स्तर का है या केन्द्र स्तर का है। दोनों विभाग अपना-अपना दावा करते थे जिसके कारण बड़ी संख्या में कर विवाद उत्पन्न हो जाते थे। कर विवादों को निपटाने के लिए केन्द्र सरकार को सेण्ट्रल अपीलेट अथॉरिटी की नियुक्ति करनी पड़ी थी।

4, व्यवस्था की समस्या (Interpretational issues) – केन्द्र एवं राज्य सरकारों के नियमों में एकरूपता न होने के कारण अधिकांश वस्तुओं की श्रेणी के निर्धारण को लेकर विवाद बने रहते थे। किसी राज्य में कोई वस्तु कर मुक्त थी तो किसी राज्य में वह कर योग्य थी। इन वस्तुओं की व्याख्या करने में परेशानी होती थी। विभिन्न राज्यों में वस्तुओं के नाम भी अलग-अलग बोले जाते थे।

5, कर प्रशासन में कठिनाई (Difficulty in tax administration) – पूर्व में करो की संख्या अधिक थी। कई प्रकार के अधिनियम थे। सभी में अपनी-अपनी अच्छाइयाँ और कमियाँ थीं। व्यवस्थाओं से समानता का अभाव था। ऐसे में कर का सुचारु प्रशासन एक कठिन कार्य था।

6, आयात निर्यात पर राज्यों का अधिकार नहीं (No jurisdiction of states on interstate export and import) – जिस राज्य से वस्तुओं का निर्यात होता था या जिस राज्य में वस्तुओं या सेवाओं का आयात होता था, उस राज्य को इन गतिविधियों में कर लगाने का अधिकार नहीं था। जिसके कारण उन्हें राजस्व की हानि होती थी। इन सौदों पर कर लगाने का अधिकार केन्द्र सरकार के पास था।

 

जी०एस०टी से विशिष्ट लाभ क्या है? वैट व्यवस्था से यह किस प्रकार श्रेष्ठ है? What are the special benefits of GST? How is it superior over earlir VAT regime?

उत्तर- वस्तु एवं सेवा कर एक गन्तव्य आधारित अप्रत्यक्ष कर है। यदि पुरानी व्यवस्था को ध्यान में रखा जाए तो कहा जा सकता है कि पूर्व में लागू वैट (VAT) प्रणाली की उन्नत किस्म ही वस्तु एवं सेवा कर है।” यह कर 1 जुलाई, 2017 से पूरे देश में समान दर से लगाया और वसूल किया जा रहा है। इस कर व्यवस्था के दायरे में वस्तुओं और सेवाओं को एकसमान मान लिया गया। अभी तक वस्तुओं पर कर की दरें अलग होती थीं और सेवाओं पर अलग दर से कर लगाए जाते थे लेकिन अब वस्तु एवं सेवा कर की दृष्टि में दोनों में कोई भेद नहीं है। वस्तु एवं सेवा कर ने केन्द्र एवं राज्य सरकारों के सभी अप्रत्यक्ष करों को हटाकर उनका स्थान स्वयं ले लिया है।

वस्तु एवं सेवा कर बहुस्तरीय और गन्तव्य आधारित कर है। यहाँ पर बहुस्तरीय शब्द का अर्थ व आशय यह है कि कोई भी वस्तु निर्माण से लेकर अन्तिम उपभोग तक कई चरणों के माध्यम से गुजरती है, जैसे कि पहला चरण है कच्चे माल को खरीदना, दूसरा चरण है उत्पादन या निर्माण फिर भण्डारण और फिर रिटेलर और सबसे अन्त में उपभोक्ता आता है।

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जी०एस०टी के विशिष्ट लाभ (Advantages of GST)

अथवा

जी०एस०टी की मुख्य विशेषताएँ (Main Features of Goods & Services Tax)

वस्तु एवं सेवा कर की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

(1) यह एक गन्तव्य आधारित कर व्यवस्था है अर्थात् माल आपूर्ति के अन्तिम चरण (उपभोग के स्तर पर प्रभावी होता है।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण देश में है।

(3) सम्पूर्ण देश में कर की दरें समान है।

(4) यह अप्रत्यक्ष कर है जिसे पूर्ववर्ती मूल्य-संवर्धित कर (VAT) का उन्नत किस्म माना जाता है।

(5) इस कर के दो भाग है –

(i) केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर (Central goods and services tax I (GST)

(ii) प्रान्तीय वस्तु एवं सेवा कर (State goods and services tax i,e,, SGST), केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर केन्द्रीय सरकार द्वारा रोपित एवं वसूला जाता है। राज्य या संघ शासित प्रदेश वस्तु एवं सेवा कर सम्बन्धित राज्य या संघ शासित प्रदेश द्वारा लगाया और वसूल किया जाता है। यदि कुछ सौदे या व्यापार राज्यों के मध्य होंगे तो वहाँ पर एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर लागू होता है जिसे केन्द्र सरकार द्वारा लगाया और वसूल किया जाता है तथा इस कर की राशि राज्यों के मध्य विभाजित कर दी जाती है। इसी प्रकृति के कारण इसे दोहरा कर (Double tax) भी कहा गया है।

(6) कर लगाने के नियम कर योग्य आय कर योग्य व्यक्ति, भरे जाने वाले फार्म, रिटर्न, प्रपत्र एवं परिभाषाएँ पूरे देश में एकसमान है। (7) वस्तु एवं सेवा कर को देश की आजादी के बाद का सबसे बड़ा और अच्छा कर सुधार माना जाता है।

(8) इस कर के माध्यम से राजनीतिक संपवाद (Political union) से अधिक संघवाद (Economie union) की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिली है। इस कर के माध्यम से देश के 29 राज्य एवं 7 केन्द्रशासित प्रदेश एक ही छतरी के नीचे आ गए हैं।

(9) कर मुक्त वस्तुओं और सेवाओं को छोड़कर शेष सभी वस्तुओं और सेवाओं पर वस्तु एवं सेवाकर लगाया जा रहा है।

(10) जी०एस०टी० की दरों का निर्धारण कर दिया गया है। उन वस्तुओं और सेवाओं की सूची भी निर्धारित कर दी गई है जिन पर निर्धारित दर से कर लगेगा।

(11) केन्द्र और राज्य वस्तु एवं सेवा कर के लिए करदाताओं को एक ही रिटर्न भरना पढ़ेगा।

(12) वस्तु एवं सेवा कर के लागू हो जाने से भारत एक बड़े और एकीकृत बाजार के रूप में परिवर्तित हो गया है।

(13) कर संग्रह के कई प्रकार के व्यर्थ के खर्चों में रोक लग गई है तथा राजस्व में तुलनात्मक रूप से वृद्धि हुई है।

(14) दुनिया के लगभग 160 देशों में वस्तु एवं सेवा कर की व्यवस्था लागू है। भारत भी इसी विश्व बिरादरी में शामिल हो गया है।

(15) इलेक्ट्रॉनिक्स कॉमर्स व्यापार को वस्तु एवं सेवा कर के दायरे में रखा गया है।

(16) इस कर प्रावधान से देश का प्रत्येक नागरिक प्रभावित होगा क्योंकि प्रत्येक नागरिक किसी न किसी रूप में उपभोक्ता है।

(17) अप्रत्यक्ष करों के हटने से यदि राज्य सरकारों को आर्थिक क्षति होगी तो उसकी भरपाई की भी व्यवस्था की गई है।

(18) वस्तु एवं सेवा कर में सभी प्रकार के व्यक्तियों को शामिल कर लिया गया है।

(19) सौदे के प्रत्येक चरण में (ग्राहक को छोड़कर) इनपुट टैक्स क्रेडिट की व्यवस्था लागू है।

(20) वस्तुओं के आयात को अन्तर्राज्यीय आपूर्ति माना जाता है और एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर के नियम लागू होते हैं।

(21) सेवाओं के आयात को भी अन्तर्राज्यीय आपूर्ति माना जाता है और एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर के नियम लागू होते हैं।

(22) सभी रिटर्न इलेक्ट्रॉनिक तरीके से निर्धारित समय सीमा में भरे जाते हैं।

(23) निर्यात के मामलों में ITC का लाभ मिलेगा।

(24) यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की कर प्रणाली है।

(25) विवादों के लिए अपील की व्यवस्था की गई है।

(26) ₹10,000 तक की धनराशि को छोड़कर शेष भुगतान ऑनलाइन होगा।

 

वैट व्यवस्था से यह किस प्रकार श्रेष्ठ है (How Is It Superior Over Earlier VAT Regine)

अथवा

वर्तमान वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली, अप्रत्यक्ष करों की पूर्ण कर प्रणाली से किस प्रकार श्रेष्ठ है (Why GST System Is Better Than Pre-Indirect Tax System)

 

कहा जाता है कि वर्तमान वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली अप्रत्यक्ष करों की पूर्व कर प्रणाली से श्रेष्ठ है। इसके निम्नलिखित कारण हैं– (1) वस्तु एवं सेवा कर ने अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल किया है।

(2) अर्थव्यवस्था को मजबूत एवं शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से एक अकेला, सहयोगात्मक और अविभाजित बाजार सृजित होता है।

(3) कोई छिपा हुआ कर नहीं है अतः व्यवसाय करने की लागत में कमी आयी है।

(4) पारदर्शी तथा भ्रष्टाचार मुक्त कर प्रशासन के निर्माण में सहयोग मिला है।

(5) वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली पूर्णत: ऑनलाइन एवं इण्टरनेट आधारित प्रणाली है।

(6) सम्पूर्ण देश में एकमात्र अकेला कर है।

(7) पूर्व कर प्रणाली के समस्त दोषों/कमियों को दूर करने की कोशिश हुई है।

(8) भारतीय अर्थव्यवस्था में वस्तु एवं सेवा कर एक बड़ा सुधारात्मक कदम सिद्ध हुआ है।

(9) कर प्रणाली से सोपानी कर प्रभाव (Tax cascading effect) को दूर किया गया है।

(10) अनुपालन लागत कम हुई है।

(11) वस्तु एवं सेवाकर से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि में निखार आया है।

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वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax)

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् देश की कर व्यवस्था को दो भागों में विभाजित किया गया था- प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर प्रत्यक्ष करों में आयकर, धन कर आदि प्रमुख थे जो केन्द्र सरकार द्वारा लगाए एवं वसूले जाते थे।

अप्रत्यक्ष करों में बिक्री कर, व्यापार कर, उत्पादन कर, प्रवेश कर चुंगी आदि प्रमुख थे जिनके सम्बन्ध में प्रदेश सरकारों को अलग-अलग दर से वसूल करने की स्वतन्त्रता प्राप्त थी अर्थात् एक देश होते हुए भी इस व्यवस्था के अन्तर्गत अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दर से कर लगाया जाता था। इन्हीं कमियों को दूर करने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा 1 जुलाई 2017 से सम्पूर्ण भारतवर्ष में एक राष्ट्र एक कर व्यवस्था के अन्तर्गत ‘वस्तु एवं सेवा कर लागू किया गया।

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अर्थ (Meaning)

वस्तु एवं सेवा कर एक गन्तव्य आधारित अप्रत्यक्ष कर है। पूर्व में लागू वैट (VAT) कर प्रणाली की उन्नत किस्म ही वस्तु एवं सेवा कर है। यह कर 1 जुलाई, 2017 से पूरे देश में समान दर से लगाया और वसूल किया जा रहा है। इस कर व्यवस्था के दायरे में वस्तुओं और सेवाओं को एकसमान मान लिया गया। अभी तक वस्तुओं पर कर की दरें अलग होती थी और सेवाओं पर अलग दर से कर लगाए जाते थे लेकिन अब वस्तु एवं सेवा कर की दृष्टि में दोनों में कोई भेद नहीं है। वस्तु एवं सेवा कर ने केन्द्र एवं राज्य सरकारों के सभी अप्रत्यक्ष करों को हटाकर उनका स्थान स्वयं ले लिया है।

वस्तु एवं सेवा कर बहुस्तरीय और गन्तव्य आधारित कर है। यहाँ पर बहुस्तरीय शब्द का आशय यह है कि कोई भी वस्तु निर्माण से लेकर अन्तिम उपभोग तक कई चरणों के मध्य से गुजरती है। उदाहरण के लिए पहला चरण है कच्चे माल का खरीदना, दूसरा चरण है उत्पादन या निर्माण, तीसरा चरण है भण्डारण और फिर रिटेलर और सबसे अन्त में उपभोक्ता आता है।

परिभाषा – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 (12A) के अनुसार, “वस्तु एवं सेवा कर का आशय माल या सेवाओं या दोनों पर करारोपण से है, केवल मानवीय उपभोग के लिए मदिरा पर करों को छोड़कर।”

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वस्तु एवं सेवा कर के उद्देश्य (Objectives of GST)

(1) एक राष्ट्र एक कर की अवधारणा को लागू करना।

(2) करो की संख्या को कम करना तथा कर पर कर प्रभाव समाप्त करना।

(3) IT के प्रयोग को बढ़ावा देकर पारदर्शिता बढ़ाना।

(4) कर अपचन तथा कर प्रणाली में व्याप्त अनियमितताओं को रोकना।

(5) मुद्रा स्फीति की दर पर नियन्त्रण करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना।

 

वस्तु एवं सेवा कर की विशेषताएँ (Characteristics of Goods and Services Tax)

वस्तु एवं सेवा कर की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार है –

(1) यह एक गन्तव्य आधारित कर व्यवस्था है अर्थात् माल आपूर्ति के अन्तिम चरण (उपभोग के स्तर पर) पर प्रभावी होता है।

((2) यह सम्पूर्ण देश में समान दरों पर तथा समान रूप से लागू है।

(3) यह संघीय कर प्रणाली है।

(4) वस्तु एवं सेवा कर को देश की आजादी के बाद का सबसे बड़ा और अच्छा कर सुधार माना जाता है।

(5) कर मुक्त वस्तुओं और सेवाओं को छोड़कर शेष सभी वस्तुओं और सेवाओं पर वस्तु एवं सेवा कर लगाया जा रहा है।

(6) इस कर व्यवस्था में कुल वार्षिक टर्न ओवर की एक सीमा निर्धारित कर दी गई है। इस सीमा से नीचे व्यापार करने वालों की वस्तु एवं सेवा कर के दायरे से बाहर रखा गया है लेकिन उनको व्यापारिक वस्तुओं को दायरे से बाहर नहीं किया गया है।

(7) केन्द्रीय एवं राज्य सरकार के कर का भुगतान एक ही व्यक्ति करेगा लेकिन कर का आधा हिस्सा केन्द्र सरकार के खाते में और आधा हिस्सा सम्बन्धित राज्य या संघ शासित प्रदेश सरकार के हिस्से में जमा करना होगा।

(8) इस कर व्यवस्था में पंजीकरण के समय प्रत्येक करदाता को PAN लिंक्ड टैक्सपेयर आईडेंटिफिकेशन नम्बर दिया जाता है जो 15 अंकों तक का होता है। इस व्यवस्था से सभी करदाता आयकर विभाग से भी जुड़ गए हैं। आयकर विभाग को करदाता सम्बन्धी जानकारी स्वतः ही मिल जाएगी।

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वस्तु एवं सेवा कर की संवैधानिक स्थिति (Constitutional Status of GST)

कर लगाने का अधिकार संविधान प्रदत्त होने के कारण पूर्व में केन्द्र सरकार केवल उत्पत्ति बिन्दु पर कर लगाती थी, वस्तु की बिक्री पर नहीं तथा राज्यों को भी सेवा कर का अधिकार नहीं था लेकिन वर्तमान में वस्तु एवं सेवा कर में वस्तुओं एवं सेवाओं दोनों का समावेश होने के कारण इसकी संवैधानिक स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।

सरकार द्वारा 19 दिसम्बर, 2014 को वस्तु एवं सेवा कर से सम्बन्धित संविधान (122वाँ संशोधन) विधेयक लोक सभा में प्रस्तुत किया गया। बाद में यह विधेयक पारित होकर 16 दिसम्बर, 2016 को अधिसूचित किया गया। इस प्रकार, 122वाँ संशोधन संविधान (101वाँ संशोधन) संशोधन अधिनियम, 2016 अस्तित्व में आया। इस संविधान संशोधन अधिनियम के कारण भारत में वस्तु एवं सेवा कर लागू करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस संविधान संशोधन के कारण संविधान में निम्नलिखित संशोधन हुए |

(1) अनुच्छेद 246 A, 268 A एवं 279 A नये सिरे से संविधान में जोड़े गए।

(2) अनुच्छेद (Article) 248 249, 250, 268, 269, 270, 271, 286, 366 एवं 368 में परिवर्तन किए गए।

(3) अनुच्छेद 268 A को समाप्त किया गया। (4) अनुसूची (Schedule) VI को संशोधित किया |

(5) अनुसूची VII को संशोधित किया गया।

(6) वस्तु एवं सेवा कर के लागू होने के कारण राज्यों को होने वाली हानि की क्षतिपूर्ति, की व्यवस्था की गई।

(7) वस्तु एवं सेवा कर परिषद् की स्थापना की गई और इसकी स्थापना, कार्यों, अधिकारों, बैठकों आदि के सम्बन्ध में विस्तृत और स्पष्ट निर्देश दिए गए।

(8) अनुसूची VII के केन्द्र सूची और राज्य सूची के दायरे में पेट्रोलियम कच्चे तेल,

हाई स्पीड डीजल, मोटर स्पिरिट (पेट्रोल), प्राकृतिक गैस, विमानन टरबाइन ईंधन और तम्बाकू तथा तम्बाकू उत्पादों को शामिल किया गया।

(9) संविधान से प्राप्त शक्तियों का उपयोग करके केन्द्र एवं राज्यों ने अपनी विधायी शक्ति से वस्तु एवं सेवा कर सम्बन्धी निम्नलिखित अधिनियम पारित किए –

(i) केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017

(ii) एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017

(iii) संघ शासित क्षेत्र वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017

(iv) राज्य वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017

(v) वस्तु एवं सेवा कर (राज्यों को क्षतिपूर्ति) अधिनियम, 2017

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वस्तु एवं सेवा कर के लाभ/गुण (Advantages/Merits of GST)

‘एक राष्ट्र एक कर’ की अवधारणा पर आधारित ‘वस्तु एवं सेवा कर’ ने भारतवर्ष में व्यापारियों की परेशानियों को दूर करने के साथ ही कर व्यवस्था में पारदर्शिता लाने का अभिनव प्रयास किया है। इस कर व्यवस्था से निम्न लाभ हुए।

1, एक कर एक दाम (One tax one rate) – अब उपभोक्ता को यह लाभ होगा कि वह पूरे देश में कहीं से भी वस्तु या सेवा प्राप्त करे, उसे सभी जगहों पर लगभग समान मूल्य चुकाना होगा क्योंकि वस्तु या सेवा पर कर की दर पूरे देश में एक समान है। उपभोक्ता अब आसानी से इस बात का भी पता लगा सकता है कि उसने कितनी धनराशि कर के रूप में चुकायी है।

2, कीमतें कम हुई हैं (Reduced prices) – आम लोगों द्वारा महसूस किया जा रहा है। कि कुछ वस्तुओं को छोड़कर आमतौर पर वस्तुओं के मूल्यों में कमी आयी है। कुछ वस्तुएँ तो कर मुक्त हो गई हैं। अब कर पर कर नहीं लगते जिसके कारण कीमतें नीचे आती है।

3, कारोबार करना आसान हुआ (Ease of business) – वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली के लागू होने के बाद से भारत में व्यापार करना आसान हो गया है। यह आसानी व्यापारियों और आम जनता दोनों को हुई है। करों का जाल कम हो गया है।

4, कर विवादों में कमी (Lesser disputes) – वस्तु एवं सेवा कर से पूर्व की व्यवस्था में व्यापारियों को हर प्रदेश में अलग-अलग प्रकार के कर देने होते थे। व्यापारियों को कई सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने होते थे तथा कई अधिकारियों को सन्तुष्ट करना पड़ता था और तरह-तरह के साक्ष्य प्रस्तुत करने होते थे। वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद व्यापारियों को इन समस्याओं से मुक्ति मिल गई है। अब एक कर, एक दफ्तर और एक अधिकारी ही होता है।

5, सरल पंजीकरण व्यवस्था (Easy System of Registration) – नई कर व्यवस्था के अन्तर्गत पंजीकरण प्रक्रिया को अत्यन्त सरल कर दिया गया है जिससे व्यवस्था में पारदर्शिता के साथ-साथ व्यापारियों में भरोसा भी बढ़ा है।

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वस्तु एवं सेवा कर की कमियाँ या दोष या अवगुण (Shortcomings or Defects or Demerits or Disadvantages of Goods and Services Tax)

‘वस्तु एवं सेवा कर’ एक अत्यन्त सरल कर व्यवस्था है तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘एक राष्ट्र एक कर’ व्यवस्था की सराहना भी की जा रही है तथापि एक विशाल जनसंख्या तथा बड़ी अर्थव्यवस्था का देश होने के कारण इसमें कुछ कमियाँ भी महसूस की गई हैं जो अप्र प्रकार है

1, केवल नाम परिवर्तन – कुछ लोगों का कहना है कि जी०एस०टी० नया नहीं है वरन् यह केवल नाम परिवर्तन है। इस व्यवस्था से पहले भी केन्द्र सरकार एक्साइज, सेवा कर और कई तरह की ड्यूटी लगाती थी। अब इनका स्थान केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर ने ले लिया है। इसी प्रकार, राज्य सरकारें वैट (VAT), चुंगी, व्यापार कर आदि के नाम से कई तरह के कर लगाती थीं, अब उनका स्थान राज्य वस्तु एवं सेवा कर ने ले लिया है। पूर्व की व्यवस्था में अन्तर्राज्यीय सौदों में केन्द्रीय बिक्री कर लगता था। अब उसके स्थान पर एकीकृत वस्तु एवं, सेवा कर लगाया गया है। इस प्रकार, केवल नाम परिवर्तन किया गया है।

2, व्यापारियों के मध्य विवाद – जी०एस०टी० में इनपुट टैक्स क्रेडिट की व्यवस्था की गई है, लेकिन यदि किसी व्यापारी ने आपूर्तिकर्त्ता के रूप में कर नहीं चुकाया है तो माल का प्राप्तकर्त्ता इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं प्राप्त कर सकेगा। इस प्रकार, व्यापारियों के मध्य आपसी विवाद बढ़ गए हैं।

3, माल हस्तान्तरण में कठिनाई – यदि एक ही कम्पनी अपनी किसी सहायक कम्पनी या ब्रांच को माल हस्तान्तरित करती है तो वह बिना कर का भुगतान किए ऐसा नहीं कर पाती। पहले वह कर का भुगतान करे और फिर कर वापसी का दावा करे। इस प्रकार, अनावश्यक लेन-देन बढ़ गए हैं जबकि सरकार को कोई राजस्व प्राप्त नहीं होगा।

4, जी०एस०टी० विकास का पर्याय नहीं – जी०एस०टी० को देश के विकास का पर्याय कहा जा रहा है और इसे विकास का आधार बताया जा रहा है लेकिन केवल एकल कर प्रणाली के आधार पर किसी देश का विकास सम्भव नहीं है अतः कर प्रणाली में सुधार के अलावा भी कई कार्य करने होंगे; जैसे-उत्पादन और वितरण प्रणाली में सुधार, उत्पादन एवं सेवा के नये क्षेत्रों की खोज, नई तकनीकों का विकास, कृषि क्षेत्र में आधुनिकीकरण आदि।

5, व्ययों में बढ़ोतरी – जी०एस०टी० के साथ तालमेल बैठाने के लिए व्यापारियों को टेक्नोलॉजी आधारित जैसे कम्प्यूटर, इण्टरनेट आदि की व्यवस्था करनी होगी जिसमें अलग से व्यय करना पड़ता है। यह छोटे व्यापारियों के लिए कठिन कार्य है। बड़े संस्थानों में तो इस व्यवस्था के साथ-साथ कुछ कर्मचारी भी नियुक्त करने पड़े हैं। कुछ व्यापारी निजी सुविधा केन्द्र या कैफे की शरण में जा रहे हैं।

6, कम्प्यूटर साक्षरता की कमी – वस्तु एवं सेवा कर के अन्तर्गत सम्पूर्ण क्रियाविधि ऑनलाइन तथा कम्प्यूटर आधारित है जिस कारण कम्प्यूटर का ज्ञान न रखने वाले व्यापारियों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

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भारत में वस्तु एवं सेवा कर के अन्तर्गत कर वसूली कितने प्रकार से होती है? Explain different kinds of tax collection under GST,

वस्तु एवं सेवा कर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित हुआ है क्योंकि इसके द्वारा पूर्ववर्ती कर प्रणाली को एक सरल, पारदर्शी एवं टेक्नोलॉजी आधारित कर प्रणाली में परिवर्तित कर दिया गया है तथा अन्तर्राज्यीय व्यापार सम्बन्धी बाधाएँ भी लगभग समाप्त हो गई है।

भारतवर्ष में यह व्यवस्था संघीय प्रकृति की होने के कारण (अर्थात् केन्द्र व राज अलग-अलग करारोपण तथा वसूली करते हैं) अलग-अलग नामों के अधिनियमों की व्यवस्थ की गई है जिसका विवरण निम्न प्रकार है|

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केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर (Central Goods and Services Tax: CGST)

जब वस्तुओं या सेवाओं (या दोनों) की आपूर्ति एक ही राज्य के अन्दर होती है अर्थात् एक राज्य का व्यापारी अपने ही राज्य के दूसरे व्यापारी से लेन-देन करता है तो उस लेन-देन पर केन्द्र सरकार को कर लगाने और वसूल करने का अधिकार प्राप्त है जिसे केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर कहा जाता है। केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं –

(1) यह केन्द्र सरकार द्वारा पूर्व निर्धारित दरों से लगाया एवं वसूला जाता है।

(2) यह अन्तर्राज्यीय वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यवहार पर लगाया जाता है।

(3) यह वस्तु एवं सेवा कर का हिस्सा है जो केन्द्र सरकार के खाते में जमा किया जाता है।

(4) इससे सम्बन्धित अधिनियम केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017 है जिसमें 174 धाराएँ तथा 3 अनुसूचियाँ हैं।

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राज्य वस्तु एवं सेवा कर (State Goods and Services Tax: SGST)

यदि वस्तुओं या सेवाओं या दोनों की आपूर्ति एक ही राज्य के अन्दर होती है अर्थात् उसी राज्य का व्यापारी उसी राज्य स्थित व्यापारी से वस्तु या सेवा प्राप्त करके उसे उसी राज्य की सीमाओं के अन्तर्गत विक्रय अर्थात् आपूर्ति प्रदान करता है तो ऐसे मामलों में वस्तु एवं सेवा कर लगाने और वसूल करने का अधिकार सम्बन्धित राज्य सरकार का होता है। राज्य के अन्दर ही आपूर्ति होने की प्रकृति के कारण इसे राज्य वस्तु एवं सेवा कर (SGST) के नाम से पुकारा जाता है। राज्य वस्तु एवं सेवा कर के सम्बन्ध में मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

(1) यह कर राज्य सरकारों द्वारा लगाया तथा वसूल किया जाता है।

(2) इस कर की दरें पूर्व निर्धारित हैं जो केन्द्र सरकार की दरों के बराबर होती हैं।

(3) यह कर वस्तु एवं सेवा कर का हिस्सा होता है।

(4) यह सम्बन्धित राज्य की सीमाओं के अन्तर्गत होने वाली आपूर्तियों पर लगाया जाता है।

(5) इस कर की राशि सीधे राज्य सरकार के खाते में जमा की जाती है और राज्य सरकार ही इसका उपयोग करती है।

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संघ शासित प्रदेश वस्तु एवं सेवा कर (Union Territory Goods and Services Tax: UTGST)

यह कर संघ शासित क्षेत्र के प्रशासन का होता है। यह SGST की भाँति ही लगाया एवं वसूल किया जाता है तथा इस कर की धनराशि पर केवल उस संघ शासित प्रदेश का ही अधिकार होता है। ,

इससे सम्बन्धित अधिनियम संघ शासित प्रदेश वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 के नाम से जाना जाता है जिसमें कुल 26 धाराएँ हैं।’

संघ शासित प्रदेश वस्तु एवं सेवा कर के सम्बन्ध में मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

(1) यह कर वस्तु एवं सेवा कर का हिस्सा होता है।

(2) यह कर संघ शासित प्रदेशों द्वारा लगाया तथा वसूल किया जाता है।

(3) इस कर की दरें पूर्व निर्धारित हैं और केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर की दरों के बराबर है।

(4) इस कर की राशि सीधे संघ शासित प्रदेश के खाते में जमा की जाती है।

(5) यह कर सम्बन्धित संघ शासित प्रदेश की सीमाओं के अन्तर्गत होने वाली वस्तु एवं सेवा या दोनों की आपूर्तियों पर लगाया जाता है।

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एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (Integrated Goods and Services Tax: IGST)

जब दो अलग-अलग राज्यों या संघ शासित क्षेत्रों के व्यक्तियों या व्यवसायियों के बीच कोई सौदा होता है तो विवाद उत्पन्न हो जाता है कि राज्य के हिस्से का कर कौन वसूल करेगा। इस विवाद के समाधान के लिए ऐसे मामलों में कर लगाने एवं उसे वसूल करने का कार्य केन्द्र सरकार द्वारा किया जाता है और केन्द्र एवं राज्य दोनों का हिस्सा केन्द्र सरकार ही वसूल करती है। यद्यपि केन्द्र सरकार के पास कर की राशि जमा होने के बाद केन्द्र सरकार अपना हिस्सा रखकर राज्य का हिस्सा उस राज्य को हस्तान्तरित कर देती है जिस राज्य में आपूर्ति का उपभोग हुआ होता है। इस प्रकार, कर की वसूली का अधिकार तो अकेले केन्द्र सरकार के पास है लेकिन प्राप्ति में केन्द्र और राज्य दोनों बराबर के हकदार होते हैं।

इससे सम्बन्धित अधिनियम को ‘एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017’ के नाम से जाना जाता है जिसमें कुल 25 धाराएँ हैं।

एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर के सम्बन्ध में कुछ मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

(1) चूँकि केन्द्र एवं राज्य दोनों का हिस्सा एकीकृत होकर केन्द्र सरकार द्वारा वसूल किया जाता है, अतः इसी प्रकृति के कारण इसे एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर कहा जाता है।

(2) यह कर तभी लगता है जब आपूर्ति दो राज्यों के मध्य होती है।

(3) इस कर की दरें पूर्व निर्धारित है और केन्द्र तथा राज्य की दरों को जोड़कर पूरा कर केन्द्र सरकार द्वारा वसूला जाता है।

(4) किसी दूसरे देश से माल या सेवाओं के सौदे एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर के दायरे में आते हैं।

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वस्तु एवं सेवा कर परिषद् (GST Council) क्या है? इसके कार्यों का वर्णन कीजिए। What is Goods and Services Tax Council? Describe its functions,

वस्तु एवं सेवा कर परिषद् का गठन इसके कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं के समाधान, राज्यों की समस्याएँ सुनने तथा उन्हें समय-समय पर सम्बन्धित विषयों पर परामर्श देने के उद्देश्य से किया गया था। यह परिषद् केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल की संस्तुति तथा राष्ट्रपति महोदय की मंजूरी से 15 सितम्बर, 2016 को अस्तित्व में आयी।

जी०एस०टी० परिषद में केन्द्रीय वित्त मंत्री अध्यक्ष, केन्द्रीय वित्त (राजस्व) राज्य मंत्री सदस्य तथा राज्य सरकारों द्वारा मनोनीत मंत्री सदस्य रहेंगे।

उपाध्यक्ष का चुनाव राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों द्वारा उनके मध्य से ही किसी सदस्य को चुनकर किया जाता है। जी०एस०टी० परिषद् का सचिवालय वर्तमान में नई दिल्ली में है।

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जी०एस०टी० परिषद् की प्रमुख विशेषताएँ (Main Features of GST Council)

जी०एस०टी० परिषद् की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं –

(1) परिषद् एक संवैधानिक संस्था है।

(2) यह केन्द्र और राज्यों का एक साझा फोरम है।

(3) परिषद् निर्णय लेने वाली एक संस्था है।

(4) परिषद् का मुख्यालय नई दिल्ली में है।

(5) राजस्व सचिव (भारत सरकार) को परिषद् का पदेन सचिव बनाया गया है।

(6) सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एवं कस्टम्स प्रत्येक बैठक में स्थायी सदस्य के रूप में हिस्सा लेंगे लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होगा।

(7) जी०एस०टी० परिषद् में एक अतिरिक्त सचिव का भी पद होगा।

(8) परिषद् सचिवालय में ज्वाइंट सचिव स्तर के चार कमिश्नर भी नियुक्त होंगे।

9) परिषद् में कार्य करने के लिए केन्द्र एवं राज्यों से अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर लिए जाएंगे।

(10) सचिवालय के संचालन का समस्त वित्तीय भार केन्द्र सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।

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जी०एस०टी० परिषद् के कार्य (Functions/Role of the GST Council)

(1) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 279 A (4) के अनुसार, जी०एस०टी० परिषद् निम्नलिखित विषयों पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों को अपनी राय देती है –

(i) केन्द्र एवं राज्य सरकारों तथा स्थानीय निकायों द्वारा लगाए गए उन करो, उप-करों एवं अधिभारों पर जिन्हें जी०एस०टी० में समाहित किया जाना है।

(ii) वस्तुएँ एवं सेवाएं जिन्हें जी०एस०टी० के अन्तर्गत कर योग्य रखना है या कर मुक्त करना है।

(iii) जी०एस०टी० के लिए मॉडल कानून, लेवी के सिद्धान्त, IGST का बंटवारा तथा पूर्ति के लिए स्थान के निर्धारक तत्त्व

(iv) जी०एस०टी० मुक्त माल एवं सेवाओं के टर्न ओवर की प्रारम्भिक (Threshold) सीमा का निर्धारण

(v) जी०एस०टी० करो की दर, फ्लोर रेट सहित का निर्धारण

(vi) किसी प्राकृतिक आपदा या संकटकालीन स्थिति के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने के लिए किसी विशिष्ट अवधि के लिए कर की विशेष दरें तय करना। (vii) अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड, त्रिपुरा, जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड के सम्बन्ध में विशेष (viii) वस्तु एवं सेवा कर सम्बन्धी अन्य विषय जिन्हें परिषद् निर्णीत करना चाहे प्रावधान बनाना।

(2) जी०एस०टी० परिषद् निम्नलिखित वस्तुओं पर वस्तु एवं सेवा कर लगाने की तिथि की भी संस्तुति करेगी—

(i) पेट्रोल,

(ii) पेट्रोलियम क्रूड,

(iii) हाई स्पीड डीजल,

(iv) प्रकृतिक गैस,

(v) हवाई टरबाइन ईंधन

(3) जी०एस०टी० परिषद् इस प्रकार की क्रियाविधि निर्धारित करेगी, ताकि निम्नलिखित प्रकृति के विवादों का निपटारा किया जा सके –

(i) भारत सरकार तथा एक या अधिक राज्यों के मध्य विवाद।

(ii) भारत सरकार एवं एक या अनेक राज्य एक ओर हों तथा एक या अनेक राज्य दूसरी ओर हो।

(iii) दो या दो से अधिक राज्य सरकारों के मध्य के विवाद, जो जी०एस०टी० परिषद् की संस्तुति या उसके क्रियान्वयन के कारण उत्पन्न हुए हों।

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वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GST Network)

वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क एक अलाभकारी, गैर-सरकारी, एक निजी (Private) कम्पनी है जिसका गठन कम्पनी अधिनियम के अधीन किया गया है। इसका निगमन 28 मार्च, 2013 में हुआ। यह कम्पनी वस्तु एवं सेवा कर के लिए समस्त आई०टी० सम्बन्धी आधारभूत ढाँचे की व्यवस्था करती है। इस कम्पनी ने आई०टी० आधारित एक जी०एस०टी० पोर्टल तैयार किया है। यह पोर्टल एक प्रकार से मदरबोर्ड का कार्य करता है, जिसमें जी०एस०टी० सम्बन्धी सभी प्रकार की सूचनाएँ भरी जा सकती हैं और प्राप्त की जा सकती है। यह कम्पनी अपने इस कॉमन पोर्टल के माध्यम से करदाताओं को पंजीयन कर की गणना कर भुगतान, विवरण भरना जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराकर उनकी कर सम्बन्धी सूचनाओं का रख-रखाव करती है।

पूँजी व्यवस्था (Capital Structure) – वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GSTN) नामक कम्पनी की कुल अधिकृत पूँजी ₹10 करोड़ है। कम्पनी की पूंजी व्यवस्था में निम्नलिखित हिस्सेदार हैं –

 

हिस्सेदारहिस्सेदार प्रतिशतता
1. भारत सरकार24.5%
2. राज्य सरकारें एवं एम्पवोर्ड कमेटी24.5%
3. एच०डी०एफ़०सी० बैंक10%
4. आई०डी०बी०आई०बैंक10%
5. आई०सी०आई०सी०आई० बैंक10%
6. NSE स्ट्रेटेजिक इन्वेस्टमेंट कम्पनी10%
7. LIC हाउसिंग फाइनेंस लि०11%
योग100%

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I, कार्य (Functions):

नेटवर्क कम्पनी के मुख्य कार्य निम्न प्रकार हैं –

(A) वैधानिक कार्य (Statutory Functions) –

(1) पंजीकरण की स्वीकृति (Approval of registration)

(2) निर्धारण (Assessment)

(3) वापसी (Refunds)

(4) ऑडिट एवं लागू करना (Audit and enforcement)

(5) न्याय निर्णयन (Adjudication)

(6) वसूली (Recovery)

(7) विश्लेषण (Analytics)

(B) गैर-वैधानिक कार्य (Non-statutory Functions) –

(1) कोर सेवाएँ (Core services)

(i) पंजीकरण (Registration)

(ii) विवरणी (Returns)

(iii) भुगतान (Payments)

(2) हेल्पडेस्क सेवाएँ (Helpdesk support) –

(3) अन्तर्राज्यीय आपूर्ति पर सूचनाएं एवं क्रॉस क्रेडिट उपयोगिता (Information on inter-state supply and cross-credit utilization)

(4) विश्लेषण (Analytics)

(5) एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर के विवादों का निपटारा (IGST Settlement)

मुख्य विशेषताएँ (Main Features)

जी०एस०टी० नेटवर्क की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है –

(1) यह एक अलाभकारी और निजी क्षेत्र की कम्पनी है जिसमें केन्द्र एवं राज्य सरकारों

की भी हिस्सेदारी है।

(2) यह कम्पनी वस्तु एवं सेवा कर के लिए इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करती है।

(3) इस कम्पनी में सभी सूचनाएं सुरक्षित (Secure) रहती है।

(4) यह कम्पनी निम्नलिखित के लिए कार्य करती है –

(i) केन्द्र सरकार, (ii) राज्य सरकार, (iii) करदाता।

(5) यह कम्पनी कर व्यवस्था के पेचीदा मामलों को हल करती है।

(6) कम्पनी के खर्ची को केन्द्र और राज्य सरकारें आधा-आधा वहन करती हैं। राज्य सरकारें अपना हिस्सा राज्य में करदाताओं की संख्या के अनुपात में वहन करती हैं।

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वस्तु एवं सेवा कर (राज्यों को क्षतिपूर्ति) अधिनियम, 2017 [The Goods and Services Tax (Compensation to States) Act, 2017]

 

संसद में पारित होने के बाद वस्तु एवं सेवा कर (राज्यों को क्षतिपूर्ति) अधिनियम, 2017; 12 अप्रैल, 2017 को भारत के राजपत्र (The Gazette of India) में प्रकाशित हुआ। इस प्रकार, यह अधिनियम अपने अस्तित्व में आया इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार है –

(1) यह अधिनियम 12 अप्रैल, 2017 को अस्तित्व में आ गया।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत में है।

(3) इस अधिनियम में प्रमुख 20 शब्दों को परिभाषित किया गया है।

(4) इस अधिनियम में कुल 14 धाराएँ एवं एक अनुसूची है।

(5) राजस्व का आकलन करने के लिए उन्हीं राज्य करों को ध्यान में रखा जाएगा, जो वस्तु एवं सेवा कर में समाहित हो गए हैं।

(6) 31 मार्च, 2016 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष को राजस्व की गणना के लिए आधार वर्ष (Base year) माना गया है।

(7) यह मान लिया गया है कि राजस्व की सामान्य वृद्धि दर 14% वार्षिक होगी।

(8) वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के प्रारम्भिक 5 वर्षों तक राज्यों को राजस्व की क्षतिपूर्ति करने की व्यवस्था की गई है।

(9) स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा लगाए जाने वाले करों को इस क्षतिपूर्ति में शामिल नहीं किया जाएगा।

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क्षतिपूर्ति की क्रियाविधि (Mechanism of Compensation)

राज्यों को दी जाने वाली राजस्व की क्षतिपूर्ति की गणना एवं उसके भुगतान की क्रियाविधि निम्न प्रकार होगी–

(1) सर्वप्रथम 31 मार्च, 2016 को समाप्त होने वाले आधार वर्ष के लिए सम्बन्धित राज्य के उन करों से वसूल की गई राशि की गणना की जाएगी जो कर वस्तु एवं सेवा कर के लागू होने के कारण समाप्त हो गए हैं। इन करों में राज्य एवं स्थानीय निकायों द्वारा लगाए गए। करों की राशि तथा शुद्ध वापसी की राशि शामिल रहेगी। इस धनराशि को कम्पट्रोलर एण्ड ऑडीटर जनरल से ऑडिट कराना होगा। अगले वर्षों के लिए यही धनराशि आधार वर्ष का काम करेगी।

(2) आधार वर्ष से अगले 5 वर्षों तक क्षतिपूर्ति के वर्ष होंगे अतः जिस वर्ष की क्षतिपूर्ति की राशि की गणना करनी होगी उसी वर्ष की अनुमानित राजस्व राशि की गणना 14% वार्षिक वृद्धि दर मानकर की जाएगी। फॉर्मूला इस प्रकार होगा –

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(3) राज्य सरकारों को प्रतिवर्ष प्रत्येक दो माह के अन्त में क्षतिपूर्ति की राशि का भुगतान किया जाएगा। इसके लिए सर्वप्रथम सम्पूर्ण वर्ष की अनुमानित राजस्व राशि की गणना कर ली जाएगी, फिर आनुपातिक रूप से प्रत्येक दो माह में धनराशि का भुगतान किया जाएगा।

(4) क्षतिपूर्ति की राशि ज्ञात करने के लिए सम्बन्धित वर्ष की अनुमानित राशि में से उस वर्ष विशेष में वस्तु एवं सेवा कर के माध्यम से एकत्र की गयी राशि को घटा दिया जाएगा। शेष राशि क्षतिपूर्ति की राशि होगी।

(5) सम्पूर्ण वर्ष में प्रत्येक दो माह में प्रॉवीजनली क्षतिपूर्ति का भुगतान किया जाएगा। वर्ष के अन्त में महालेखाकार (CAG) से खाते ऑडिट होने के बाद वास्तविक राशि की गणना की जाएगी।

(6) यदि वर्ष भर में भुगतान की गई क्षतिपूर्ति की राशि वास्तव में प्राप्त होने वाली क्षतिपूर्ति से कम या अधिक है तो शेष धनराशि अगले वित्तीय वर्ष में समायोजित की जाएगी।

(7) यदि किसी वर्ष में किसी राज्य को कोई क्षतिपूर्ति देय नहीं है अर्थात् अनुमानित राजस्व से अधिक राजस्व की वसूली हुई है, लेकिन गत वर्ष में क्षतिपूर्ति के रूप में राज्य को अधिक धनराशि का भुगतान हो गया है तो अधिक भुगतान की गई राशि राज्य सरकार को भारत सरकार को वापस करनी होगी।

इस प्रकार, क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी

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जी०एस०टी० के क्रियान्वयन के पश्चात् सरकार के समक्ष चुनौतियाँ (Challenges are Present the Government After the Implementation of GST)

 

वर्तमान समय में भारत एक राष्ट्र एक कर की अवधारणा पर कार्यरत है। वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को लागू हुए अभी तीन वर्ष ही हुए हैं अतः इसका मूल्यांकन करना जल्दबाजी होगी। जी०एस०टी० के क्रियान्वयन के पश्चात् सरकार को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

1, प्रौद्योगिकी का ज्ञान नहीं होना (No knowledge of technology) – सम्पूर्ण वस्तु एवं सेवा कर तन्त्र प्रौद्योगिकी और सॉफ्टवेयर आधारित है। इसमें कागजी लेन-देन नहीं होता, अपितु कम्प्यूटर इण्टरनेट और सॉफ्टवेयर की सहायता से कार्य होता है जबकि 80% व्यापारी वर्ग पुरानी व्यवस्था से ही चल रहे हैं। ऐसे में वे लोग इस व्यवस्था में स्वयं को अनफिट और असहज पाते हैं जिससे वह अभी इसको अपनाने में असहज महसूस करते हैं।

2, वस्तु एवं सेवा कर केवल कर नहीं है (GST is not the only tax) – केन्द्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST), राज्य/संघ वस्तु एवं सेवा कर (SGST/UTGST) तथा एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (IGST) नाम के तीन कर है और व्यापारियों को इन तीनों करों और उनकी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। व्यापारियों को तिमाही रिटर्न के साथ-साथ पूरे वर्ष में एक दर्जन रिटर्न भी भरने पड़ते हैं जिससे व्यापारी इसका विरोध करते हैं। व्यापारी का मानना है कि उनका कार्य और बढ़ गया है।

3, एच०एस०एन० की रिपोर्टिंग (Reporting of HSN) – नामकरण प्रणाली (HSN) का हार्मोनाइज्ड सिस्टम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत कोडिंग प्रणाली है मासिक GSTR-3 को दाखिल करने में विवरण w,r,t, एच०एस०एन० आवक आपूर्ति की आवश्यकता नहीं थी हालांकि वार्षिक रिटर्न जी०एस०टी० आर-9 में एच०एस०एन० बार विस्तार की आवश्यकता है। जी०एस०टी० की इस जटिल प्रक्रिया का व्यवसाय पर प्रभाव पड़ रहा है।

4, एक कुशल हेल्पलाइन का अभाव (Lack of efficient helpline) – जी०एस०टी० भरना एक बड़ी चुनौती हो सकती है क्योंकि कोई हैल्पलाइन नम्बर नहीं है, जो इस काम को परेशानी मुक्त बना सकता है। नियम जटिल है और अनुपालन करना थकाऊ है। यहाँ तक कि कर विशेषज्ञ कभी-कभी यह समझने में भी विफल रहते हैं कि किसी विशेष स्थिति में क्या करने की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में एक सामान्य करदाता जी०एस०टी० की बारीकियों को नहीं समझ सकता है अत: हैल्पलाइन भी नहीं है जिससे करदाता अपने प्रश्नों पर चर्चा कर सके।

5, व्यापारियों के मध्य विवाद (Dispute between businessman) – जी०एस०टी० में इनपुट टैक्स क्रेडिट की व्यवस्था की गई है लेकिन यदि किसी व्यापारी ने आपूर्तिकत्र्त्ता के रूप में कर नहीं चुकाया है। तो माल का प्राप्तकर्त्ता इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं प्राप्त कर सकेगा। इस को लेकर व्यापारियों में आपसी विवाद उत्पन्न होता है जोकि सरकार के लिए भी एक चुनौती है।

6, जी०एस०टी० रिफण्ड मे देरी (Delay in GST refund) – वर्तमान में जी०एस०टी० रिफण्ड में देरी भी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य हो रहा है। सरकार द्वारा आश्वासन दिया गया था कि जी०एस०टी० के 90 प्रतिशत रिफण्ड जी०एस०टी० लागू होने के सात दिनों में करेंगे लेकिन फर्जी चालान और फर्जी प्रथाओं के कारण इनपुट टैक्स क्रेडिट के साथ मिलान करने में अधिक समय लग रहा है जिसके कारण रिफण्ड में भी देरी हो रही है जिससे भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिल रहा है।

7, खाद्य सामग्री का महंगा होने का भय (Fear of increase in price of food products) – वर्तमान व्यवस्था में सरकार द्वारा खाद्य सामग्री मूलत: अनाज, दालें, मक्का, बाजरा आदि को जी०एस०टी० से मुक्त रखा गया है लेकिन यही खाद्य सामग्री जब डिब्बा बन्द होंगी तो सेवाकर के दायरे में आ जाती हैं और उनकी कीमतों में वृद्धि होने लगती है जिससे महँगाई दर में भी वृद्धि होने की सम्भावना का डर सरकार को हमेशा बना रहता है।

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सरकार अथवा उद्योग द्वारा चुनौतियों का सामना (To Face the Challenge by Government or Industry)

सरकार अथवा उद्योग जी०एस०टी० का सामना करने के लिए अथवा उत्पन्न चुनौती से लड़ने के लिए निम्नलिखित कदमों को उठा सकती है –

1, लेखांकन सॉफ्टवेयर सरल बनाना (To make easy GST accounting software) – जी०एस०टी० रिटर्न दाखिल करने के लिए व करदाताओं की मदद करने के लिए बाजार में व्यापक रूप से लेखांकन सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं। सरकार द्वारा समय-समय पर इन सॉफ्टवेयर को और अधिक सरल एवं तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की आवश्यकता है। जिससे कोई भी व्यापारी इनका उपयोग बड़ी ही आसानी से कर सके।

2, रिफण्ड का समय से भुगतान (Payment of refund in time) – सरकार द्वारा व्यापारियों अथवा करदाताओं को समय पर जी०एस०टी० रिटर्न का रिफण्ड मिलने की व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाना होगा रिफण्ड में देर से कई बार व्यापारी को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है, जिसकी वजह से वह इस नये कानून का विरोध भी करता है।

3, पेट्रोलियम उत्पादों को जी०एस०टी० में सम्मिलित करना (To included petrolium products) – सरकार पर पेट्रोलियम उत्पादों को भी जी०एस०टी० में शामिल करने का दबाव निरन्तर पड़ रहा है क्योंकि भारत वर्ष में पेट्रोलियम पदार्थों पर कर लगाने को प्रक्रिया बहुत ही जटिल है जी०एस०टी० में शामिल होने पर कर प्रक्रिया सरल हो जाएगी तथा इनकी कीमत भी काफी कम हो जाएगी। केन्द्रीय सरकार शीघ्र ही इनको भी जी०एस०टी० में सम्मिलित करने पर विचार कर रही है।

4, कर दरों की बहुलता को कम करना (To reduce multitude of tax rate) – केन्द्रीय सरकार द्वारा एक राष्ट्र और एक कर का नारा दिया गया है लेकिन जी०एस०टी० की विभिन्न दरों जैसे–0%, 25%, 3%, 5%, 12%, 18%, 28% उपलब्ध हैं। व्यापारियों को कई बार किसी वस्तु पर कौन-सी दर से कर लगेगा यह याद रखना भी मुश्किल हो जाता है अतः सरकार को इन दरों के दायरे को और कम करना चाहिए ताकि व्यापारी को रिटर्न भरने में परेशानी न हो।

5, करदाताओं को हैल्पलाइन सुविधा उपलब्ध कराना (To provided Helpline facilities of assessees) – सरकार द्वारा करदाताओं को रिटर्न फाइल करते समय आने वाली परेशानी को दूर करने के लिए अति शीघ्र एक जी०एस०टी० हैल्पलाइन चालू करनी चाहिए जिससे कोई भी करदाता अथवा व्यापारी अपनी समस्या को उनसे चर्चा करके दूर कर सके। यह हैल्पलाइन सप्ताह में 7 दिन तथा 24 घण्टे उपलब्ध रहनी चाहिए ताकि व्यापारी अपनी सुविधा व आवश्यकतानुसार इसका प्रयोग कर सके।

6, कारोबार करने में आसानी (Ease of doing business) – वस्तु एवं कर प्रणाली के लागू होने से भारत में व्यापार बहुत सरल हो गया है। करों का जाल बहुत कम हो गया है तथा जी०एस०टी० की सुविधा आनलाइन होने के कारण कागजी कार्यवाही भी बहुत कम हो गई। है। भारत इंजी ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of doing business) के मामले में जहाँ 144 वें नम्बर पर था, वह अब सुधर कर 50 से कम नवम्बर पर आ गया है।

7, कर प्रशासन से सुविधा (Ease in tax administration) – सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित होने तथा ऑनलाइन रिटर्न फाइल करने के कारण अब कर अधिकारियों को कोई भी सूचना एक ही क्लिक पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है। GSTN द्वारा किसी भी आँकड़े की पूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाती है। कोई भी व्यापार कर की चोरी नहीं कर सकता तथा सरकार भी कोई छिपा कर लागू नहीं कर सकती है। प्रशासन को भी कर प्रक्रिया आसान होने के कारण करदाताओं को रिटर्न एवं रिफण्ड आदि को प्राप्त करने व भेजने में अधिक समय नहीं लगता है।

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