Public Finance Meaning Scope and Importance

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Public Finance Meaning Scope and Importance

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Public Finance Meaning Scope and Importance
Public Finance Meaning Scope and Importance

प्रश्न 1. राजस्व (लोक वित्त) की परिभाषा दीजिए। इसकी क्या विशेषताएँ हैं। राजस्व के महत्त्व की विस्तृत विवेचना कीजिए।

अथवा सार्वजनिक वित्त की परिभाषा दीजिए। सार्वजनिक वित्त की प्रकृति एवं विषय सामग्री को बताइए।

अथवा

“राजस्व सस्कारी संस्थाओं के आय तथा व्यय में अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों का उपयोग मात्र है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-आधुनिक राज्य सरकार का स्वरूप कल्याणकारी राज्य का है। केवल शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखना तथा देश को बाह्य आक्रमण से सुरक्षित रखना ही अब राज्य के कार्य नहीं रह गये हैं। अव नागरिकों को न्यूनतम सुविधाएँ प्रदान करना भी सरकार का दायित्व माना जाने लगा है। इतना ही नहीं देश का तीव्र आर्थिक विकास करना अब सरकार की जिम्मेदारी बन गया है। इन विभिन्न कार्यों को करने के लिए सरकार द्वारा धन इकट्ठा करने तथा उसे विभिन्न आर्थिक एवं सामाजिक उद्देश्यों के लिए व्यय करने का अध्ययन हो । | लोकविन के अन्तर्गत किया जाता है।

लोकवित्त/राजस्व का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Public Finance) लोकवित्त को अंग्रेजी में Public Finance कहते हैं, जो Public तथा Finance दो। शब्दों से मिलकर बना है। यहाँ पर Public शब्द का अर्थ जनता से न होकर जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं जैसे—सार्वजनिक सत्ताओं अथवा सरकार से है तथा Finance शब्द का अर्थ आय प्राप्त करना तथा व्यय करना है। संक्षेप में, राजस्व का अर्थ सरकार की वित्त से सम्बन्धित क्रियाओं के अध्ययन से है जिसमें मुख्यतः राजकीय आय, राजकीय व्यय तथा राजकीय ऋण के वित्तीय प्रबन्ध को शामिल किया जाता है।

राजस्व की मुख्य परिभाषाएँ इस प्रकार हैं

डॉ० डाल्टन (Dalton) के अनुसार, ‘राजस्व, राज्य की आय और व्यय तथा इनके एक-दूसरे के साथ समायोजन से सम्बन्धित है।”

बैस्टेबल (Bestable) के अनुसार, राजस्व का सम्बन्ध राज्य की आय एवं व्यय तथा उनके पारस्परिक सम्बन्ध एवं वित्तीय प्रशासन तथा नियन्त्रण से है।”

आमिटेज स्मिथ (Armitage Smith) के अनुसार, ‘राजकीय व्यय और आय की प्रकति और सिद्धान्तों की जाँच को राजस्व कहते हैं।”

प्रो० फिण्डले शिराज (Findlay Shiraj) के अनुसार, राजस्व सार्वजनिक संस्थाओं की आय एवं व्यय से सम्बन्धित सिद्धान्तों का अध्ययन है।”

निष्कर्ष-उपरोक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के उपरान्त हम यह कह सकते हैं। | “लोकवित्त अर्थशास्त्र की वह शाखा है जो सरकारों (केन्द्रीय, राज्य एवं स्थानीय) की वित्त व्यवस्था, जैसे—आय, व्यय, ऋण आदि से सम्बन्धित सिद्धान्तों, नीतियों, समस्याओं का अध्ययन करती है।”

राजस्व की विषय सामग्री, विभाग एवं क्षेत्र

(Subject Matter and Scope of Public Finance) सरकार और उससे सम्बद्ध संस्थाएँ लोक कल्याण के लिये किस प्रकार धन एकत्र करती हैं और किस प्रकार उसे व्यय करती हैं, मुख्यतः यही लोकवित्त की विषय सामग्री कहलाती है। अध्ययन की सुविधा के दृष्टिकोण से राजस्व को निम्नलिखित पाँच भागों में बाँटा जा सकता है ।

(1) सार्वजनिक व्यय Public Expenditure) :- यह राजस्व का अत्यन्त महत्वपूर्ण विभाग है क्योकि राजस्व का प्रारम्भ सार्वजनिक व्यय अथवा लोक व्यय से ही होता है। सरकार व्यय करने की योजना पहले बनाती है और फिर उसके अनुरूप आय प्राप्त करने का प्रयत्न करती है। लोक व्यय के अन्तर्गत उन सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है जिसके अनुसार सरकार अपना व्यय करती है। साथ ही सार्वजनिक व्यय के प्रभावों का विश्लेषण भी किया जाता है। इसके साथ-साथ यह भी अध्ययन किया जाता है कि किस प्रकार बढ़ते हुए सार्वजनिक व्ययों पर प्रतिबन्ध लगाए जाएँ जिससे मुद्रा स्फीति न बढ़े, बल्कि उत्पादन तथा आर्थिक विकास में वृद्धि हो।

(2) सार्वजनिक आय (Public Revenue)– -सार्वजनिक व्यय की पूर्ति हेतु सरकार | आय प्राप्त करने की व्यवस्था करती है। सार्वजनिक आय के अन्तर्गत इस बात का अध्ययन किया जाता है कि सरकार के आय के स्रोत क्या हैं एवं आय से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्त | एवं समस्याएँ कौन-कौन सी हैं। सार्वजनिक आय में करारोपण के सिद्धान्त, करों का भार एवं विवर्तन, करदान क्षमता आदि का अध्ययन किया जाता है। संक्षेप में कहा जा सकता है। कि इसके अन्तर्गत सार्वजनिक आय के विभिन्न स्रोत एवं उनको प्राप्त करने के सिद्धान्तों का | अध्ययन किया जाता है।

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(3) सार्वजनिक ऋण (Public Debt)—प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का यह मानना था बजट सन्तुलित “ना चाहिए अर्थात् सरकार की आय और व्यय बराबर रहना चाहिए न्तु आजकल सन्तु, बजट की मान्यता समाप्त हो गई है, क्योंकि राज्य के कार्यों में वृद्धि से  सार्वजनिक आय की तुलना में सरकार को अधिक व्यय करना पड़ता है और रिक्त व्यय की पूर्ति के लिए सरकार ऋण का सहारा लेती है। सार्वजनिक ऋण के गत ऋण के स्रोत, इसके विभिन्न सिद्धान्त, सार्वजनिक ऋण के भुगतान तथा इन ऋणों। * प्रभास एवं भार का अध्ययन किया जाता है।

(4) वित्तीय प्रशासन (Financial Administration)- राजस्व के अन्तर्गत  सार्वजनिक व्यय, आय एवं ऋणों की व्यवस्था के लिए प्रशासन तन्त्र की आवश्यकता होती है, जैसे—सार्वजनिक आय का एक अलग से विभाग होता है जिसके अन्तर्गत बचत निर्माण को प्रोत्साहित किया जाता है, सार्वजनिक व्यय को भी पृथक् रूप से व्यवस्थित एवं नियन्त्रित किया जाता है। सार्वजनिक ऋण के लेन-देन का भी पूरा हिसाब रखा जाता है।  संक्षेप में, वित्तीय प्रशासन से आशय सरकार की उस शासन व्यवस्था और संगठन से है जिसके द्वारा सरकार अपनी वित्तीय क्रियाओं का प्रबन्ध करती है। इस भाग के अन्तर्गत अध्ययन के मुख्य विषय निम्न प्रकार हैं

  • (1) बजट का निर्माण, पारित और क्रियान्वित होना,
  • (2) कर एकत्रण के लिए व्यवस्था,
  • (3) व्यय व्यवस्था का संचालन,
  • (4) लोक वित्त का अंकेक्षण एवं उस पर नियन्त्रण आदि।।

(5) आर्थिक स्थायित्व (Economic Stabilisation)--लोकवित्त के इस विभाग में देश के आर्थिक स्थायित्व के लिए राजकोषीय नीति के प्रयोगों का अध्ययन किया जाता है। इस शाखा को कार्यात्मक वित्त (Functional Finance) भी कहते हैं। इस विभाग के अन्तर्गत देश में पूर्ण रोजगार को बनाये रखने, व्यापार चक्रों पर नियन्त्रण लगाने और मुद्रा स्फीति व मुद्रा-संकुचन पर अंकुश लगाने के लिए राज्य की वित्तीय, राजकोषीय तथा अन्य व्यापक आर्थिक क्रियाओं का समावेश होता है।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि लोकवित्त के उपर्युक्त पाँचों विभाग | एक-दूसरे से पृथक् न होकर परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक | युग में लोक वित्त का स्वरूप स्थिर न होकर प्रावैगिक होता जा रहा है।

राजस्व का महत्त्व

(Importance of Public Finance) वर्तमान समय में प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था में राजस्व की भूमिका अत्यन्त । महत्वपूर्ण हो गयी है और इस महत्व में निरन्तर वृद्धि हो रही है। वास्तविकता यह है कि ज्यों-ज्यों सरकार का कार्य-क्षेत्र बढ़ रहा है, राजस्व का महत्व भी बढ़ता जा रहा है। प्रारम्भ में अर्थशास्त्री निर्बाधावादी नीति के समर्थक थे और इस बात पर जोर देते थे कि सरकार को अपने नागरिकों के जीवन में कम-से-कम हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन आर्थिक नियोजन की विचारधारा के प्रारम्भ होने, समाजवादी समाज की स्थापना पर जोर दिये जाने तथा लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का महत्व स्वीकार करने के कारण सरकार के कार्यक्षेत्र में वृद्धि होने लगी। इन सबके कारण लोकवित्त के महत्व में तेजी के साथ वृद्धि हुई है।

संक्षेप में, राजस्व के महत्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत व्यक्त किया जा सकता है

(अ) आर्थिक क्षेत्र में महत्व-आर्थिक क्षेत्र में लोकवित्त के महत्व को निम्न प्रकार। से स्पष्ट किया जा सकता है

(1) आर्थिक नियोजन में महत्व-आधुनिक युग आर्थिक नियोजन का युग है। प्रत्यक देश अपने सन्तुलित एवं तीव्र आर्थिक विकास के लिए आर्थिक नियोजन को अपना रहा है। आर्थिक नियोजन की सफलता बहुत कुछ राजस्व की उचित व्यवस्था पर निर्भर करता है करारोपण या लोक व्यय की छोटी सी त्रुटि भी आर्थिक विकास के उद्देश्य की प्राप्ति में एक महत्वपूर्ण बाधा बन सकती है।

(2) पूंजी निमाण में सहायक-विकासशील देशों में आर्थिक विकास के क्षेत्र तपर्ण समस्या पूंजी निर्माण की धीमी गति की विद्यमानता है। इस समस्या का हल में राजस्व की महत्वपूर्ण भूमिका है। वस्ततः सरकार की राजस्व नीति बचतों को प्रोत्साहित करने तथा विनियोग आधिक्य को उत्पन्न करके पुँजी निर्माण में सहायक सिद्ध होती है।

(3) राष्ट्रीय संसाधनों का अनकलनों का अनुकूलतम प्रयोग-वर्तमान समय में यह स्वीकार किया जाता है कि देश के आर्थिक संसाधनों का विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में सर्वोत्तम प्रयोग सरकार की उचित और प्रभावशाली मौद्रिक एवं राजस्व नीतियों से ही सम्भव है। सरकार अपनी बजट नीति के द्वारा उपभोग, उत्पादन तथा वितरण को वांछित दिशा में प्रवाहित कर सकती है 

(4) रोजगार में वृद्धि-प्रत्येक देश में अधिकतम रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य पर जोर दिया जाता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में भी राजस्व क्रियायें सहायक होती हैं। जहाँ एक ओर सरकार करारोपण की उचित नीति द्वारा रोजगार प्रधान योजनाओं और उद्योगों को प्रोत्साहित कर सकती है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक व्ययों के माध्यम से ऐसी योजनाएँ चला सकती है जिनमें अधिकाधिक व्यक्तियों को रोजगार मिल सके। | (5) राष्ट्रीय आय में वृद्धि– विकासशील देशों में राष्ट्रीय आय बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता है। इस दृष्टि से भी राजस्व का विशिष्ट महत्व है। राजस्व नीति के द्वारा आय में वृद्धि के लिये निम्न कदम उठाये जा सकते हैं

  • (अ) सार्वजनिक व्यय तथा ऋणों का अधिकतम भाग उत्पादक कार्यों में लगाया जाये,
  • (ब) ऐसी कर प्रणाली विकसित करना कि कर-साधनों का अधिकतम भाग विनियोजित किया जाये।
  • (स) निजी बचतों को प्रोत्साहित करना।।

(6) आर्थिक विषमताओं को कम करने में सहायक- लोकवित्त आर्थिक विषमताओं को दूर करने में सहायक है। धनी वर्ग की आय और सम्पत्ति पर भारी करारोपण करके तथा उससे प्राप्त आय को निर्धन वर्ग पर व्यय करके आर्थिक असमानताओं को घटाना सम्भव है। भारत में आर्थिक असमानताओं को कम करने में राजकोषीय क्रियाओं का महत्वपूर्ण योगदान | रहा है।

(7) सरकारी उद्योगों के संचालन में सुविधा- आज प्रत्येक देश में लोक उद्योगों (सार्वजनिक उपक्रमों) का संचालन किया जा रहा है। इन उद्योगों में काफी मात्रा में पूंजी का योजन करना पड़ता है। इस पूँजी की व्यवस्था करने तथा सामाजिक हित में हानि पर वाले सरकारी उद्योगों की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति की दृष्टि से भी राजस्व की चलने वाले सरकारी उद्योगों को महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।  

(8) आर्थिक स्थायित्व-   तीसा (1930) की विश्वव्यापी मन्दी के बाद प्रायः स्वीकार जाने लगा है कि देश में आर्थिक स्थिरता लाने की दृष्टि से लोक वित्त की विशिष्ट भूमिका है। लोक व्यय, करारोपण व लोक ऋण नीतियों के मध्य उचित समायोजन करके। आर्थिक स्थायित्व के उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है।

(ब) सामाजिक क्षेत्र में महत्त्वआधुनिक समय में लोक वित्त को सामाजिक न्याय की प्राप्ति का एक शक्तिशाली अस्त्र माना जाता है। आर्थिक असमानतायें, अज्ञानता, नित, पिछड़ापन व बेरोजगारी समाज में भयंकर असन्तोष उत्पन्न करती हैं। इन सामाजिक समस्याओं को लोक वित्त के द्वारा हल किया जा सकता है। इस दृष्टि से सरकार ऐसी लोकवित्त नीति अपना सकती है जिससे आर्थिक विषमतायें कम हों, निर्धनता व सामाजिक पिछड़ापन दूर हो, अज्ञानता व बेरोजगारी की समस्या का समाधान हो, हानिकारक वस्तुओं के उपभोग में कटौती हो और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध हो। |

(स) राजनैतिक क्षेत्र में महत्त्व- राजनैतिक क्षेत्र में भी राजस्व का महत्वपूर्ण योगदान है। सरकार अपनी राजनैतिक नीतियों को उचित प्रकार से क्रियान्वित तब ही कर । सकती है जबकि उसके पास पर्याप्त वित्तीय साधन हों और उन साधनों का प्रयोग करने के लिए उसके पास उचित राजस्व नीति हो। 

। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि वर्तमान समय में राजस्व विज्ञान ने एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है। प्रो० कोलिन क्लार्क ने ठीक ही कहा है, ‘जो राजस्व के क्षेत्र में | कार्य कर रहे हैं, वे केवल तकनीशियन और प्रशासक ही नहीं हैं, वरन् वे अपने देश के भविष्य के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।”

प्रश्न 2.”व्यक्ति अपनी आय के अनुसार व्यय को समायोजित करता है जबकि | राज्य अपनी आय को व्यय के अनुसार समायोजित करता है।” समझाइए।

अथवा सार्वजनिक वित्त एवं निजी वित्त में भेद कीजिए। वर्तमान समय में सार्वजनिक वित्त के बढ़ते महत्त्व पर प्रकाश डालिए।

अथवा ‘ ‘सार्वजनिक वित्त न केवल मात्रा में वरन् स्वरूप में भी निजी वित्त से भिन्न है।” क्या आप इस कथन से सहमत है? स्पष्ट कीजिए।

अथवा ‘लोकवित्त’ से आप क्या समझते हैं? इसके महत्त्व को समझाइये तथा निजी वित्त’ से इसका अन्तर कीजिए।

लोकवित्त (राजस्व या सार्वजनिक वित्त) का अर्थ-राजस्व के लिए! अंग्रेजी में Public Finance शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसका आशय जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं या सत्ता जैसे–केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारें एवं स्थानीय सरकार आदि के वित्तीय कार्य-कलापों के अध्ययन से है। सरल शब्दों में, लोक वित्त में | सार्वजनिक सत्ताओं के आय-व्यय सम्बन्धी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। निजी वित्त (Private Finance) के अर्गत किसी व्यक्ति के आय-व्यय सम्बन्धी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।

लोक वित्त तथा निजी वित्त की तुलना

लोक वित्त को भली-भाँति समझने के लिए लोक वित्त एवं निजी वित्त । तलनात्मक अध्ययन परमावश्यक है क्योंकि दोनों के तुलनात्मक अध्ययन से हो । शाखाओं की प्रकृति एवं समस्याओं को अधिक अच्छी तरह से समझा जा सकता है। इन दाना में कुछ समानताएं हैं तो कुछ असमानताएँ भी हैं, जिनकी संक्षिप्त विवेचना निम्नलिखित प्रकार है

लोक वित्त एवं निजी वित्त में समानताएँ (Similarities between Public Finance and Private Finance)

(1) समान उद्देश्य-  दोनों का उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करना है।

(2) अधिकतम सन्तुष्टि का प्रयास-   दोनों ही वित्त व्यवस्थाओं में अधिकतम सन्तुष्टि की प्राप्ति का प्रयास किया जाता है। जिस प्रकार एक व्यक्ति समसीमान्त उपयोगिता नियम के आधार पर व्यय करके अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करने का प्रयास करता है, ठीक उसी प्रकार सरकार व्यय करते समय अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त को ध्यान में रखकर अधिकतम सन्तुष्टि को प्राप्त करने का प्रयास करती है।

(3) आय-व्यय का समायोजन-  दोनों ही वित्त व्यवस्थाओं में आय एवं व्यय के बीच सन्तुलन स्थापित करने की समस्या होती है।।

(4) समान प्रयास-   दोनों को ही आय के स्रोत खोजने पड़ते हैं और जब व्यय की तुलना में आय कम रह जाती है तो दोनों को ऋण लेना पड़ता है।

Public Finance Meaning Scope and Importance

लोक वित्त एवं निजी वित्त में असमानताएँ ( अन्तर या भेद) (Dis-similarities or Difference between Private Finance and Public Finance)

दोनों में पाये जाने वाले प्रमुख अन्तर निम्न प्रकार हैं

(1) आय और व्यय का समायोजन- आय और व्यय के समायोजन की दृष्टि से राजस्व और निजी वित्त में अन्तर होता है। निजी वित्त ‘तेते पाँव पसारिये जितनी लम्बी सौर के सिद्धान्त पर आधारित होता है। अर्थात् एक व्यक्ति अपनी आय के अनुसार व्यय करता है। जबकि सरकार पहले अपना व्यय निश्चित करती है और उसके पश्चात् व्यय के अनुसार आय को समायोजित करती है। इस सन्दर्भ में डाल्टन का यह कथन  उल्लेखनीय है कि जहा व्यक्तिगत व्यय उसकी आय से निर्धारित होता है वहीं सरकार का व्यय उसकी आय को निर्धारित करता है।”

(2) व्यय का उद्देश्य- सार्वजनिक व्यय का उद्देश्य जनकल्याण होता है तथा इसी उद्देश्य से सरल । स सरकार विभिन्न योजनाओं पर व्यय करती है। इस प्रकार सरकार किसी विशेष के हित में व्यय न करके अधिकतम सामाजिक कल्याण को ध्यान में रखकर व्यय है, किन्तु व्यक्तिगत (निजी) व्यय का उद्देश्य व्यक्ति के स्वयं के स्वार्थों की पूर्ति एवं धकतम सन्तुष्टि प्राप्त करना होता है।

(3) गोपनीयता का अन्तर-   एक व्यक्ति अपनी आय एवं व्यय को गोपनीय रखता है। सकी साख एवं प्रतिष्ठा पर कोई नुकसान न हो। उसका व्यय, आय से अधिक होने ताकि उसकी साख एव प्रतिस्ठा पर कोई नुकसान न हो उसका व्यय आय से अधिक होने पर, यदि वह ऋण लेकर कार्य चलाता है तो वह भी इस बात को गोपनीय रखता है। जहाँ  तक सार्वजनिक वित्त का प्रश्न है वह एक खुली किताब के समान है। सरकार की आय के विभिन्न स्रोतों की जानकारी सभी को रहती है तथा सार्वजनिक व्यय की भी लोक-सभा और विधान सभाओं में स्वीकृति ली जाती है। इसी प्रकार सार्वजनिक ऋण भी गुप्त नहीं रहता। सरकार तो अपनी आय, व्यय एवं बजट को प्रकाशित करती है। |

( 4 ) बजट का निर्माण-  बजट निर्माण की दृष्टि से भी सार्वजनिक और निजी वित्त में अन्तर रहता है। सरकार आवश्यक रूप से बजट का निर्माण करती है तथा वह बजट संसद में प्रस्तुत किया जाता है और इस पर गहन विचार विमर्श किया जाता है। सरकार को बजट की स्वीकृति लेनी पड़ती है, किन्तु एक व्यक्ति के लिए बजट बनाना आवश्यक नहीं होता क्योंकि उसका आय-व्यय इतना अधिक नहीं होता कि उसके लिए बजट बनाने की आवश्यकता पड़े। |

(5) बजट की प्रकृति एवं अवधि- प्रकृति की दृष्टि से निजी वित्त-व्यवस्था में बचत का बजट अच्छा माना जाता है, लेकिन सरकारी वित्त-व्यवस्था में बचत के बजट को प्रायः अच्छा नहीं माना जाता है। सरकारी बजट में बचत के दो अर्थ निकलते हैं या तो सरकार ने कर अधिक लगा रखे हैं या जनता पर व्यय कम किया जाता है। स्पष्ट है कि लोक वित्त के अन्तर्गत घाटे के बजट को अच्छा माना जाता है, जबकि निजी वित्त में बचत के बजट को अच्छा माना जाता है। जहाँ तक बजट की अवधि का प्रश्न है, सरकारी बजट सामान्यतः एक वर्ष की अवधि का होता है लेकिन निजी बजट में ऐसी परम्परा नहीं होती। निजी बजट मासिक, त्रैमासिक या छमाही या अन्य किसी अवधि का होता है। |

(6) व्यय को प्रभावित करने वाले तत्व-  एक व्यक्ति का व्यय उसके स्वभाव, सामाजिक रीति-रिवाज एवं उसके उत्तरदायित्व से प्रभावित होता है। जबकि सरकार के व्यय पर देश के आर्थिक विकास का प्रभाव पड़ता है। सरकारी व्यय में जितने व्यापक स्तर पर परिवर्तन किए जा सकते हैं उतने परिवर्तन व्यक्तिगत व्यय में सम्भव नहीं होते।

(7) आय के साधनों की लोच का अन्तर-  सरकार की आय के साधन प्रायः विस्तृत होते हैं जबकि व्यक्ति विशेष के आय के स्रोत अत्यन्त सीमित होते हैं। सरकार एक व्यक्ति | की अपेक्षा अधिक अच्छी स्थिति में होने के कारण अपनी आय को नोट छापकर, देश व विदेश से ऋण लेकर, कर की दर बढ़ा कर और लाभप्रद उद्योगों का सहज ही राष्ट्रीयकरण करके मनचाहे रूप में बढ़ा सकती है। लेकिन एक व्यक्ति उपरोक्त साधनों का प्रयोग नहीं। कर सकता क्योंकि उसकी स्थिति सरकार से भिन्न होती है।

(8) ऋण प्राप्ति सम्बन्धी अन्तर-   निजी वित्त में जब कोई व्यक्ति ऋण लेना चाहता है। तो वह ऋणदांता की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह ऋण दे या न दे, परन्तु लोक वित्त के अन्तर्गत सरकार ऋण लेने के लिए देशवासियों को विवश कर सकती है। इसके अतिरिक्त सरकार देश एवं विदेशों से असीमित मात्रा में ऋण ले सकती है, परन्तु एक व्यक्ति अपने जान पहचान के लोगों या बैंक आदि से एक सीमा तक ही ऋण प्राप्त कर सकता है।

(9) दृष्टिकोण सम्बन्धी अन्तर-   सामान्यत: निजी वित्त व्यवस्था में अल्पकालीन और लोक वित्त में दीर्घकालीन दृष्टिकोण अपनाया जाता है। निजी वित्त के अन्तर्गत धन का व्यय या विनियोजन ऐसे कार्यों में किया जाता है जिनके परिणाम तुरन्त या शीघ्रता से प्राप्त हो सके। इसके विपरीत सरकार ऐसी योजनाओं और कार्यों में भी धन का विनियोग करती है, | जिनका लाभ निकट भविष्य में न मिलकर एक अवधि के पश्चात् मिलेगा या लाभ न मिले | लेकिन भावी विकास के लिए उनका महत्व हो।

(10) आय प्राप्त करने में बल प्रयोग-   व्यक्ति की तुलना में सरकार अधिक शक्तिशाली होती है जिसके कारण सरकार अपनी शक्ति का प्रयोग करके करों के द्वारा बलपर्वक भी आय प्राप्त कर सकती है, परन्तु एक व्यक्ति बलपूर्वक आय प्राप्त नहीं कर सकता।

(11) संगठन एवं सुरक्षा सम्बन्धी अन्तर-   लोक वित्त की व्यवस्था को चलाने के | लिए एक प्रभावशाली संगठन की आवश्यकता होती है जबकि निजी वित्त में अलग संगठन | की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसके साथ-साथ लोक वित्त के अन्तर्गत देश की सुरक्षा पर  काफी खर्च किया जाता है, जबकि निजी वित्त के अन्तर्गत सुरक्षा पर नगण्य व्यय किया जाता 

निष्कर्ष-लोक वित्त और निजी वित्त का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट है कि निजी वित्त व्यवस्था के सिद्धान्तों को पूर्ण रूप से लोक वित्त व्यवस्था में नहीं अपनाया जा – सकता। अतः लोकवित्त का अध्ययन एक पृथक् विषय के रूप में ही किया जाना चाहिए।

संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि ‘निजी वित्त एवं लोक वित्त में आय-व्यय दोनों मदों में | मौलिक अन्तर है और दोनों को समानान्तर धुरों पर चलाना भारी भूल माना जाता है।”


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