Lawful Consideration And Object Bcom Business Law Notes

Lawful Consideration And Object Bcom Business Law Notes

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Lawful Consideration And Object Bcom Business Law Notes
Lawful Consideration And Object Bcom Business Law Notes

न्यायोचित प्रतिफल तथा उद्देश्य

(Lawful Consideration and Object)

प्रतिफल की परिभाषा – प्रतिफल वैध अनुबन्ध का एक महत्वपूर्ण रवम आवश्यक तत्व है | बिना प्रतिफल के समझौता एक वर्थ का वचन-मात्र अथवा ‘जुए’ एक समझौता होता है और किसी प्रकार का वैधानिक दायित्व उत्पन्न नहीं कर सकता |

सम्बन्धित के सम्बन्ध में मुख्य परिभाषाये निम्न प्रकार है –

सर फ्रेडरिक पोलाक के अनुसार, “प्रतिफल वह मूल्य है जिसके बदले दुसरे का वचन खरीदा जा सकता है और मूल्य के बदले दुसरे का वचन को प्रवर्तित कराया जा सकता है |”

ब्लेकस्टोन के अनुसार, “प्रतिफल अनुबंध करने वाले एक पक्षकार द्वारा दुसरे पक्षकार को दिया जाने वाला पारितोषिक है |” (Consideration is the recompense given by the one party contracting to the other)

भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धरा 2(d) के अनुसार, “जब वचनदाता की इच्छा पर वचनग्रहीता ने अथवा अन्य कसी व्यक्ति ने कोई कार्य किया हो या उसके करने से अलग रहा हो, कोई कार्य करता है या उसके करने से अलग रहतो हो अथवा करने या अलग रहने का वचन देता हो तो ऐसा कार्य करना, अलग रहन या वादा करना उस वचन का प्रतिफल कहलाता है |” इस परिभाषा के अनुसार प्रतिफल किसी कार्य को करना या करना हो सकता है |




उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण –

1, राजीव अपनी कार संजीव को 50,000 रूपये में बेचने का समझौता करता है | यहाँ राजीव के लिये 50,000 रूपये और संजीव के लिये कार प्रतिफल है | यह किसी कार्य करने का उदहारण है |

2, सुरेश, महेश के विरुध्द क़ानूनी कार्यवाही न करने का वचन देता है बशर्ते की महेश उसे 500 दे | यहाँ पर 500 रूपये क़ानूनी कार्यवाही न करने का वचन के प्रतिफल है | अत: यह किसी कार्य क न करने को उदाहरण है |

प्रतिफल के लक्षण, तत्व अथवा वैधानिक नियम

(Characteristics, Elements or Legal Rules as to Consideration)

1, प्रतिफल वचनदाता की इच्छा पर होना चाहिये (Consideration must be at the Deserve of the Promissory) – प्रतिफल सम्बन्धी कार्य वचनदाता की इच्छा पर या कहने पर ही किया जाना चाहिये | यदि कोई वचनदाता की इच्छा से अथवा अन्य किसी व्यक्ति की इच्छा से किया जाता है तो उसे प्रतिफल नही माना जायेगा | स्वेच्छा से किये गये कार्यो के लिये कोई भी व्यक्ति मुआवजे या पारिश्रमिक की माँग नही कर सकता | उदाहरणार्थ, राजीव की घडी खो जाती है और संजीव उसे ढूँढ लेता है | ऐसी स्थिति में संजीव ने घड़ी ढूँढने का कार्य स्वेच्छा से किया है राजीव के कहने पर या नही, अत: वह पारिश्रमिक या इनाम माँगने का अधिकारी नही होगा |

2, प्रतिफल वचनग्रहीता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जा सकता है (Consideration may be from the promise or any other Person) अंग्रेजी राजनियम के अनुसार प्रतिफल के लिये आवश्यक है की वह वचनग्रहीता द्वारा ही दिया जाये, परन्तु भारतीय अनुबन्ध अधिनियम के अनुसार प्रतिफल वचनग्रीता या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भी दिया जा सकता है | कहने का अभिप्राय यह है की जब किसी अनुबन्ध में प्रतिफल विधमान हो तो इस बात पर कोई ध्यान नहीं देते की वह प्रतिफल किसके द्वारा दिया गया है |

इस सम्बन्ध में चिनैय्या बनाम रमैया का केस उल्लेखनीय है | यह व्यक्ति ने अपनी साडी सम्पति अपनी पुत्री (रमैया) के नाम इस शर्त पर हस्तान्तरित कर दी कि पुत्री एक निश्चित राशि बार्षिक (Annuity) के रूप में अपने चाचा (चिनैय्या) को देती रहेगी | पुत्री ने अपने वचन का पालन करने से इस आधार पर मना कर दिया की चाचा की ओर से उसे कोई प्रतिफल प्राप्त नही हुआ | न्यायालय ने निर्णय दिया की यहाँ प्रतिफल अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त हुआ है | चाचा से सीधे नही बल्कि उसके भाई (पिता) से सम्पति के रूप में प्रतिफल मिला है, अत: वह वार्षिकी की राशि देने के लिये वाध्य है |

3, प्रतिफल कुछ कार्य करने या न करने (विरीत) का वचन हो सकता है – प्रतिफल किसी कार्य को करने अथवा न करने का वचन हो सकता है | इस प्रकार प्रतिफल ऋणात्मक (Negative) तथा धनात्मक (Positive) दोनों प्रकार का होता है | धनात्मक प्रतिफल में वचन की इच्छा पर किसी कार्य को करने से अलग रहता है या कार्य को स्थापित करता है “|

4, प्रतिफल भूतकालिक, वर्तमान या भावी हो सकता है (Consideration may be past, Present of Future) – भारतीय अनुबन्ध अधिनियम भुत, वर्तमान तथा भावी तीनो प्रकार के प्रतिफलो के मान्यता प्रदान नही गई है |

(i) भूतकालिक प्रतिफल – यदि कोई पक्षकार वचनदाता द्वारा दिये जाने पर पूर्व ही उसके वचन के बदले वैध प्रतिफल दे चुका है तो यह भूतकालिक प्रतिफल कहलायेगा | उदाहरणार्थ, राजीव की प्रार्थना पर सुमन उसके बच्चो की देखभाल करती है | एक वर्ष पश्चात् राजीव, सुमन की सेवाओ के लिये उसे 5,000 रूपये देने का वचन देता है | वचनडाटा राजीव के लिये सुमन द्वारा दिया गया प्रतिफल भूतकालिक प्रतिफल है |

(ii) वर्तमान प्रतिफल – जब प्रतिफल अनुबन्ध करते समय ही जाता है तो उसे वर्तमान प्रतिफल कहते है | उदाहरणार्थ, ‘अ’ अपनी कार ‘ब’ को 50,000 रूपये में बेचता है | अनुबन्ध के समय ही ‘अ’ ‘ब’ को कार दे देता है तथा ‘ब’ ‘अ’ को 50,000 रूपये चुका देता है | यह वर्तमान प्रतिफल कहा जायेगा |

(iii) भावी प्रतिफल – जब वचनदाता को अपने वर्तमान बचन के लिये प्रतिफल भविष्य में मिलाना हो तो ऐसे प्रतिफल को ‘भावी प्रतिफल’ कहते है | उदाहरणार्थ, राजीव संजीव को कुल माल बेचने का अनुबन्ध करता है | माल की सुपुर्दगी एवं मूल्य का भुगतान भविष्य में किया जाना है | यहाँ प्रत्येक पक्षकार का वचन दुसरे पक्षकार का भावी प्रतिफल है |

5, प्रतिफल अवैधानिक नही होना चहिये (Consideration must be not be Unlawful) प्रतिफल सदैव वैधानिक ही होना चाहिये क्योकि अवैधानिक प्रतिफल होने पर ठहराव व्यर्थ माना जाता है |




       धारा 23 अंतर्गत निम्नलिखित दशाओ में प्रतिफल एवं उदेश्य अवैध होता है

(i) यदि यह राजनियम द्वारा वर्जित हो – यदि किसी अनुबन्ध का वचन अथवा वचन का प्रतिफल अथवा उदेश्य कानून द्वारा वर्जित है तो वह अनुबन्ध अवैध होता है | उदाहरणार्थ, यदि कोई अनुबन्ध बिना लाइसेंस के शराब बेचने के लिये किया जाता है तो वह अनुबन्ध अवैध माना जायेगा क्योकि शराब का व्यवसाय राजनियम द्वारा वर्जित है |

(ii) यदि वह राजनियम के प्रावधानों को निष्फल करता हो – यदि किसी अनुबन्ध का प्रतिफल अथवा उदेश्य ऐसा होता है की उनकी अनुमति दिये जाने पर वह किसी एनी राजनियम की व्यवस्थाओ को निष्फल कर देगा तो ऐसी दशा में अवैधानिक माने जायेंगे | उदाहरणार्थ, ‘अ’ को जमीन माल गुजरी (Land Revenue) न दिये जाने के कारण वैधानिक रूप से नीलम की जा रही है परन्तु वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, ‘अ’ इस जमीं को स्वयं नही खरीद सकता | परन्तु ‘अ’ ‘ब’ के साथ एक गुप्त ठहराव करके ‘ब’ को ठहराव करके ‘ब’ को खरीदार बना देता है ओर ‘ब’ यह वचन देता है की वह जितनी कीमत में उस जमीन को खरीदेगा, उसी में कीमत पर ‘अ’ को हस्तांतरित कर देगा | यह अवैध ठहराव माना जायेगा क्योकि इसको मान लेने से कानून का अवश्य ही वफल हो जायेगा |

(iii) यदि यह कपटमय हो यदि किसी ठहराव का उदेश्य किसी व्यक्ति को जानबूझकर धोखा देना है तो भी वह अवैध माना जायेगा | उदाहरणार्थ, राम किसी भूस्वामी का एजेण्ड है | वह अपने स्वामी को बताये बिना ‘ब’ को यह वचन देते हुये की वह उसके पक्ष में भूमि पट्टा कर देगा, ‘ब’ से कुछ रूपया ले लेता है | ‘अ’ और ‘ब’ के बीच हुआ यह यह ठहराव व्यर्थ होगा क्योकि इसमें ‘अ’ द्वारा तथ्य को छिपाकर अपने स्वामी के विरुध्द कपटपूर्ण व्यवहार करना निहित है |

(iv) यदि उनमे दुसरे व्यक्ति के शरीर अथवा सम्पति को क्षति होती हो – जब किसी ठहराव का प्रतिफल एवं उसके उदेश्य किसी व्यक्ति विशेष शरीर को अथवा उसकी सम्पति को नुकसान पहुँचाने का है तो ऐसा ठहराव भी व्यर्थ होगा क्योकि इकसे प्रतिफल एवं उदेश्य अवैधानिक है | उदाहरणार्थ, राकेश, अनूप को यह वचन देता है की यदि वह संजय की पिटाई कर देगा, तो वह (राकेश) उसे (अनूप) को 500 रूपये देगा | यह अवैध प्रतिफल है क्योकि इसका उदेश्य संजय के शरीर को क्षति पहुँचाना है |

(v) यदि न्यायालय उनको अनैतिक अथवा लोक-निति के विरुध्द समझता है – यदि ठहराव के उदेश्य एवं प्रतिफल को न्यायालय द्वारा अनैतिक अथवा लोकनीति के विरुध्द समझा जाये तो भी उदेश्य एवं प्रतिफल अवैध होगा | उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति जान-बुझकर अपना मकान वेश्यावृत्ति के लिये किराये पर देता है तो उसका किराया प्राप्त प्राप्त नही कर सकता क्योकि इस ठहराव का उदेश्य अनैतिक है |

6, प्रतिफल वास्तविक, निश्चित, स्पष्ट तथा नैतिक होना चाहिये (Consideration must be Real, Certain, Clear and Moral) – प्रतिफल भ्रमात्मक (illusory), असम्भव (Impossible), अनिश्चित (Uncertain), अस्पष्ट (Ambiguous), कपटपूर्ण (Fraudulent), अनैतिक (Immoral) अथवा लोकनीति के विपरीत नही होना चाहियें |

7, प्रतिफल की पर्याप्तता अनिवार्य नही है (The Adequacy of Consideration is not Essential) – अनुबन्ध की वैधता के लिये प्रतिफल अवश्य होना चाहिये एवं कानून की द्राष्टि से उसका कुछ मूल्य अवश्य होना चाहिये | परन्तु यह जरूरी नही है की जो कुछ दिया गया हैउसके बराबर ही प्रतिफल मिले अर्थात् प्रतिफल पर्याप्त या उचित ही हो | न्यायालय में अनुबन्ध को प्रवर्तनीय करने के लिये यह नही देखा जाता है की प्रतिफल पर्याप्त है या नही | पर्याप्त कितना हो? यह निर्णय करना सम्बन्धित पक्षों के कार्य है, न्यायलय इसमें हस्तक्षेप नही करता | अत: कोई अनुबन्ध जिनमे वचनदाता की सहमती स्वतन्त्र है, केवल प्रतिफल की अपर्याप्तता के कारण व्यर्थ नही हो जाता | हाँ, अगर वचनदाता स्वतन्त्र सहमति के अभाव के आधार पर अनुबन्ध रद कराना चाहता है तो यह निर्णय करने के लिये की सहमति स्वतन्त्र थी या नही, प्रतिफल की अपर्याप्तता को न्यायालय ध्यान में रखेगा | उदाहरणार्थ, राजीव अपने मकान जिसका मूल 50,000 रूपये है केवल 50,000 रूपये में संजीव को बेच देता है | ऐसी दशा में यघपि प्रतिफल कम है परन्तु फिर भी अनुबन्ध वैध माना जायेगा | इसी उदाहरण में यदि राजीव यह कहता कि माकन को 10,000 में बेचने की उसकी सहमति नही थी तो संजीव को यह सिद्ध करना होगा की सहमति स्वतन्त्र थी अन्यथा न्यायालय प्रतिफल की अपर्याप्तता को राजीव के आरोप में प्रमाण के रूप में मान सकता है |

प्रतिफल के बिना अनुबन्ध (ठहराव) व्यर्थ होता है-नियम के अपवाद

(A Contract without Consideration is Void-Exceptions)

सामान्यतया यह नियम है की प्रतिफल के बिना अनुबन्ध व्यर्थ होता है अर्थात् उसे न्यायालय द्वारा पूरा नही कराया जा सकता | परन्तु धारा 25 में इस नियम के कुछ अपवाद दिये गए जिनके अंतर्गत प्रतिफल के बिना भी अनुबन्ध वैध माने जाते है एवं उन्हें न्यायालय में प्रवर्तित कराया जा सकता है | यह अपवाद निम्नलिखित है –

1, स्वाभाविक प्रेम एवं स्नेह पराधारित ठहराव (Agreement Based on Natural Love and Affection) – यदि कोई अनुबन्ध अस्वभाविक (प्राक्रतिक), स्नेह एवं प्रेम के कारण निकट स्म्बन्धियो के बीच लिखित रूप में किया गया है और सम्बन्धित प्रचलित कानून के अनुसार रजिस्ट्री हो चुकी है तो ऐसी दशा में बिना प्रतिफल के किया गया ठहराव भी वैध अनुबन्ध माना जाता है |

उदाहारणार्थ, विजय स्वभाविक प्रेम एवं स्नेह के कारण अपना मकान अपने पुत्र आशीष को देने का वचन देता है तथा अपने इस वचन को लिखित रूप से प्रमाणित करके रजिस्टर्ड भी करा देता है | यह ठहराव बिना प्रतिफल के भी वैध अनुबन्ध होगा |

2, स्वेच्छा से किये गये कार्यो के लिये क्षतिपूर्ति का वचन (Promise to Compensate for Voluntary Services) धारा 25(2) के अनुसार यदि अनुबन्ध किसी ऐसे व्यक्ति को पूर्ण या आंशिक क्षतिपूर्ति का वचन है जिसने भूतकाल में स्वेच्छा से वचनदाता के लिये कोई ऐसा कार्य किया है जिसे करने के लिये वचनदाता क़ानूनी रूप से वाध्य था तो ऐसा अनुबन्ध वैध माना जाता है |

उदाहारणार्थ, सुमन स्वेच्छा से विजय के पुत्र का पालन-पोषण करती है | विजय, सुमन द्वारा पालन-पोषण में किये गये व्यर्थो को चुकाने का वचन देता है | यह अनुबन्ध वैध माना जायेगा क्योकि सुमन ने स्वेच्छा से ऐसा कार्य किया है जिसे करने के लिये विजय क़ानूनी रूप से वाध्य था |

3, अवधि वर्जित (कालाजीत) ऋण के भुगतान का वचन (Promise to Pay a Time Barred-Debt) – जब कोई ऋणी या उसका अधिकृत अजेण्ड किसी अवधि वर्जित्त (Time Barred) ऋण के पूर्ण अथवा आंशिक भुगतान करने का लिखित हस्ताक्षरयुक्त वचन देता है तो इस प्रकार दिया गया वचन बिना प्रतिफल के भी वैध होता है | कालातीत ऋण के भुगतान का वाच स्पष्ट एवं निश्चित होना चाहिये | कालातीत ऋण से अभिप्राय ऋण से है जो लिमिटेशन अधिनियम के अनुसार वसूल न किया जा सकता हो अर्थात् उस ऋण की वसूली के लिये ऋणी के विरुध्द कोई क़ानूनी कार्यवाही नही की जा सकती हो | भारत में लिमिटेशन अधिनियम के अनुसार भुगतान देय होने की तिथि से तीन वर्ष व्यतीत होने पर ऋणी के विरुध्द कोई कार्यवाही नही की जा सकती |

उदाहारणार्थ, राजीवम संजीव को 1,000 रूपये हस्ताक्षर करके रजीव को 600 रूपये चुकाने का वचन देता है | इस वचन के लिये यघपि कोई प्रतिफल नही है फिर भी यह वैध अनुबन्ध माना जायेगा |

4, एजेन्सी का अनुबन्ध (Contracts of Agency) भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 185 के अनुसार, एजेन्सी की स्थापना के अनुबन्ध के लिये प्रतिफल का होना अनिवार्य नही है | बिना प्रतिफल के भी एजेन्सी की स्थापना का अनुबन्ध वैध होता है |

5, नि:शुल्क निक्षेप (Gratuitous Bailment) – नि:शुल्क निक्षेप की दशा में प्रतिफल का होना आवश्यक नही है | उदाहारणार्थ, राम अपने 5 लिहाफ श्याम को उसके यहाँ शादी पर प्रयोग के लिये 2 दिन हेतु नि:शुल्क देने को सहमत हो जाता है तो यह अनुबन्ध माना जायेगा |

6, दान तथा उपहार (Gift and Donation) – साधारणत: दान या उपहार देने के वचन वैधानिक दायित्व उत्पन्न नही करते | अत: दान या उपहार का वचन देने वाले वचनडाटा को दिये गये वचन को पूरा करने के लिये वाध्य नही किया जा सकता | कारण स्पष्ट ही है की वचनदाता को उसके वचन को कोई प्रतिफल प्राप्त नही हुआ है | परन्तु जब दान मिल जाने के विश्वास में दान या उपहार का वचनग्रीता कुछ व्यय कर देता है और वचनदाता दान या उपहार देने से बाद में इन्कार कर दे, तो वचनग्रीता (दान प्राप्त करने वाले) को जो हानि होगी, वचनग्रीता उतनी रकम का वाद प्रस्तुत करके वचनदाता से ऐसी हानि की क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी होता है | इसके विपरीत यदि यदि दान पर उपहार दिया जा चुका हो तो दानदाता यह कहकर की ‘प्रतिफल नही है’ दी गई सम्पत्ति को वापिस नही ले सकता |

उदाहारणार्थ – राजीव कॉलेज का प्रबन्धक है, कॉलेज को 5,000 रूपये दान देने का वचन देता है | यह समझौता राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय नही है |

उदाहारण – राजीव कॉलेज का प्रबन्धक है, कॉलेज लाइब्रेरी के लिये 50,000 रूपये का दान देने का वचन देता है | कॉलेज के प्रधानाचार्य दान प्राप्त होने के विश्वास में लाइब्रेरी का कार्य आरम्भ कर देते है | राजीव अपने वचन की पूर्ति के लिये बाध्य है |

उदाहारण – राजीव कॉलेज को 5,000 रूपये का दान देता है बाद में प्रतिकल के भाव की तर्क देकर रुपया वापस लेंने  का अधिकारी नही होगा |




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