Free Consent of the Parties Bcom Business Law Notes

Free Consent of the Parties Bcom Business Law Notes 

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Free Consent of the Parties Bcom Business Law Notes

स्वतन्त्र सहमति (Free Consent)

वैध अनुबन्ध के निर्माण के लिये आवश्यक है की अनुबन्ध के पक्षकार एक ही बात पर एक ही भाव से सहमत हो तथा वे अपनी सहमति स्वतन्त्रतापूर्वक दे | सहमति स्वतन्त्र रुप से दी गई है या नहीं, यह जानने से पहले ‘सहमति’ शब्द का अर्थ स्पष्ट रूप से जन लें चाहिये |




सहमति का अर्थ एवं परिभाषा – भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 13 के अनुसार, “जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक ही बात पर एक ही अर्थ से सहमत हो उनके बीच सहमति हुई मानी जाती है |” (“Two or more persons are said to consent when they agree upon the same thing in the same sense,”) स्पष्ट है की दो या दो से अधिक पक्षों के बीच सहमति तभी मई जाती है जब वे अनुबन्ध की विषय-वस्तु (Subject-matter) के बारे में एकमत है तथा इनके विचारो में एकरूपता है | यदि अनुबन्ध करते समय पक्षकारो की भावना (मंशा) (Intention) अलग-अलग हिया व उनमे मतैक्य (Consensus-ad-idem) नही है तो उन्हें सहमत हुआ नही माना जायेगा | कानून की द्रष्टि ऐसे अनुबन्ध व्यर्थ माने जाते है | सहमती को निम्न विचारो की सहायता से भली प्रकार समझा जा सकता है –

(i) रैफिल्स बनाम विचिल-हौस के विवाद में एक पक्षकार ने 125 गाँठें रुई खरीदने का अनुबन्ध किया जिसे ‘पीयरलेस’ (Peerless) नामक जहाज पर बम्बई से आने वाले थे | एल पक्षकार का आशय उस जहाज से था जो अक्टूबर में आने वाला था तथा दुसरे पक्षकार का आशय सु जहाज से था जो की दिसम्बर में आने वाला था | न्यायालय न्र निर्णय दिया कि चूँकि दोनो पक्षकार एक ही बात पर के ही भाव से सहमत नही है, इसलिये अनमे कोई मान्य अनुबन्ध नही माना जायेगा |

(ii) शरतचन्द्र बनाम कनईलाल के विवाद में एक पक्षकार ने झूठ बोलकर एक प्रलेख पर हस्ताक्षर करवा लिये | दुसरे पक्षकार का आशय सिर्फ गवाह के रूप में हस्ताक्षर करना था जबकि पहले पक्षकार ने उससे प्रलेख के पक्षकार के रूप में हस्ताक्षर करवा लिया | न्यायालय ने निर्णय दिया की सहमति नहीं हुई, क्योकि दोनों पक्षकार एक ही बात पर भिन्न-भिन्न भाव से सहमत हुये थे |

स्वतन्त्र सहमति की परिभाषा (Definition of a free Consent) – एक वैध अनुब्न्ह्द के लिये केवल सहमति होना ही पर्याप्त नही है बल्कि यह भी जरुरी है की सहमति स्वतन्त्र रूप से प्रदान की गई हो |

भारतीय अनुबन्ध की धारा 14 के अनुसार, “सहमति तभी स्वतन्त्र मानी जाती है कि जबकि वह निम्नलिखित बातो से प्रभावित नही हुई हो –

(i) उत्पीड़न या बल-प्रयोग (Coercion)

(ii)अनुचित प्रभाव (Undue influence)

(iii)मिथ्या वर्णन अथवा असत्य कथन (Miscrepresentation)

(iv) कपट (Fraud)

(v) गलती (Mistake) |”

यदि कोई सहमति इनमे से किसी से भी प्रभावित है तो सहमति स्वतंत्र नहीं मानी जायेगी |



वैधनिकता पर प्रभाव (Effect on Validity) – ठहराव में सहमती न होने की दशा में वह व्यर्थ (Void) होता है, परन्तु यदि सहमति तो हो, ‘स्वतन्त्र सहमती’ न हो तो जिन पक्ष की सहमति स्वतन्त्र नही है, उसकी इच्छा पर ठहराव व्यर्थनीय (Voidable) होता है |

स्वतन्त्र सहमति से सम्बन्धित विभिन्न तत्वों की संक्षिप्त नहीं मानी जायेगी |

1, उत्पदीन या बल प्रयोग (Coercion) – जब कोई पक्ष किसी अनुबन्ध के लिये अपनी सहमति स्वेच्छा से नहीं बल्कि किसी डॉ या दबाव के कारण देता है तब सहमति बल-प्रयोग द्वारा प्राप्त की जाती है | धारा १५ के अनुसार, “किसी व्यक्ति को ठहराव के लिये बाध्य करने के उदेश्य से कोई ऐसा कार्य या करने की धमकी देना है जो भारतीय विधान द्वारा वर्जित है अथवा किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाना के लिये किसी सम्पति के अवैध रूप से रोक लेना अथवा रोकने की धमकी देना  है |” जहाँ उत्पीडन का प्रयोग किया गया है, वहाँ भारतीय दण्ड विधान का प्रचालित होना या न होना कोई महत्व नही रखता |

केस लाँ-अमिराजू बनाम सिशम्मा के विवाद में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी तथा बच्चे को आत्महत्या की धमकी देकर, उनकी सम्पति के सम्बन्ध में मुक्ति पत्र लिखवा लिया | न्यायालय ने इस मुक्ति-पत्र को बल-प्रयोग के कारण अस्वीकार का दिया क्योकि आत्महत्या भारतीय विधान के द्वारा वर्जित है |

2, अनुचित प्रभाव (Undue Influence) भारतीय अनुबन्ध की धारा 16(1) के अनुसार, “जब पक्षों के बीच इस प्रकार की सम्बन्ध ही की एक पक्ष दुसरे पक्ष की इच्छा-शक्ति को प्रभावित करने की स्थिति में तथा अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिये वह स्थिति का उपयोग करता है, तब अनुबन्ध अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिये वह इस स्थिति का उपयोग करता है, तब अनुबन्ध अनुचित प्रभाव से प्रेरित माना जाता है |” उदाहारण के लिये माता-पिता एवं उनके बच्च, सरंक्षक एवं सरंक्षित, ट्रस्टी एवं हिताधिकारी, डॉक्टर एवं मरीज, वकील एवं मुवविक्क्ल तथा गुरु एवं शिष्य कुछ ऐसे सम्बन्ध है जिनमे अनुचित प्रभाव विधमान मान किया जाता है |

केस लाँ-दिलाराम बनाम शारदा के विवाद में बीमारी और बुढ़ापे के कारन कमजोर पाने का अनुबन्ध किया | न्यायालय ने इस विवाद में अनुचित प्रभाव को आधार मानकर अनुबन्ध को रेड कर दिया |

3, मिथ्यावर्णन अथवा असत्य कथन (Miscepresentation) मिथ्यावर्णन से आशय अनजाने में किये गए ऐसे कथन से है जो सत्य नहीं है | दुसरे शब्दों में असावधानी पूर्वक कहा गया है विवरण बाद में असत्य सिध्द ओ जाये तो वह मिथ्यावर्णन कहलाता है | उदाहरणार्थ, यदि कोई बिमा करने वाला अपनी उम्र पूर्ण विश्वास के साथ 35 वर्ष बताता है जबकि वास्तव में उसकी आयु 37 वर्ष है जिसे वह स्वयं नहीं जनता था | ऐसी दश में यह कर्तव्य भंग द्वारा मिथ्या वर्णन है जो धोखा देने के उदेश्य से नहीं किया गया |

4, कपट (Fraud) भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा के अनुसार, “जब अनुबंध का एक पक्षकार अथवा परिनिधि दुसरे पक्षकार को अथवा उसके प्रतिनिधि को धोका देने के विचार से अथवा उसे अनुबन्ध के लिये प्रेरित करने के उदेश्य से निम्नलिखित में से कोई भी कार्य करता है तो सहमति कपट से प्रभावित मानी जाती है –

(i) उस व्यक्ति द्वारा ऐसी बात का सुझाव देना जो सत्य नहीं है और जिसका सत्यता में उसे स्वयं पर विश्वास नहीं है,

(ii) जब कोई पक्ष अनुबन्ध से सम्बन्धित किसी ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाता है जिसकी उसे पूरी जानकारी है तथा जिसे प्रकट करना उसका कर्तव्य है,

(iii) जब कोई पक्ष वचन का पालन न करने के इरादे से अनुबन्ध करता है,

(iv) कोई अन्य भी कार्य जिसका उदेश्य दुसरे पक्षकार को धोका देना एवं

(v) कोई भी ऐसा कार्य या भूल जिसे कानून ने विशेष रूप से कपटमय घोषित कर दिया हो |”

उदाहरणार्थ, राम एक जूता श्याम को बेचता है तथा कहता है कि वह जूता काफ लैदर का है, स्वयं जानता है कि जूता साधारण चमड़े का है की वह जूता राम द्वारा खी गई बात कपट मानी जायेगी |

5, गलती (Mistake) गलती से भ्रमात्मक विश्वास से है | जब किसी अनुबन्ध के दोनों पक्षकारो में किसी बात के सम्बन्ध में भ्रम होता है तो वह अनुबन्ध गलती से प्रभावित माना जाता है ग़लतियाँ दो प्रकार की होती है –

(i) तथ्य सम्बन्धी गलती (Mistake of fact), तथा (ii) कानून सम्बन्धी गलती (Mistake of law) | तथ्य सम्बन्धी गलती से अभिप्राय ऐसी गलती से है जो अनुबन्ध की विषय-वास्तु के सम्बन्ध में हो | इसके विपरीत आदि गलती किसी कानून के पालन करने से सम्बन्धित है तो उसे कानून सम्बन्धी गलती कहते है | उदाहरणार्थ – अमित ने सुमित से के घोडा खरीदने का स्म्झौता किया | बाद में पता चलता ली समझौता किया जाने पर के समय घोडा मर चुका था, परन्तु दोनों पक्षकार इस तथ्य से अनभिज्ञ थे | यहाँ पर यह दोनों पक्ष तथ्य सम्बन्धी गलती पर थे, अत: यह समझौता व्यर्थ माना जायेगा |

अनुबन्ध में स्वतन्त्र सहमति का महत्व (Importance of free Constant in a Contract)

या

स्वतन्त्र सहमति न होने पर प्रभाव  (Consequences without Free Constant)

उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है की वैध अनुबन्ध के निर्माण में स्वतन्त्र सहमति का अपना विशेष महत्व है | भारतीय अनुबन्ध अधिनियम के अनुसार किसी के पक्षकारों की सहमति स्वतन्त्र न होने पर निम्नलिखित है –

1, अनुबन्ध का व्यर्थनीय होना – यदि किसी अनुबन्ध में उत्पीड़न, अनुचित प्रभाव, कपट या मिथ्या वर्णन द्वारा सहमति प्राप्त की गई है तो पीड़ित पक्षकार (जिसकी सम्पति इस प्रकार से ली हो) द्वारा अनुबन्ध को रद (समाप्त) किया जा सकता है | परन्तु यदि उसकी सहमति ऐसे कपट अथवा मिथ्या वर्णन के द्वारा ली गई है जिसका वह आसानी से पता चला सकता था तो अनुबन्ध व्यर्थनीय नहीं होगा |

2, अनुबन्ध की अभिपुष्टि – कपट अथवा मिथ्यावर्णन से पीड़ित पक्षकार दुसरे पक्ष को अनुबन्ध को पूरा करने के लिये बाध्य कर सकता है, यदि वह ऐसा करना अपने हित में समझता है |

3, क्षतिपूर्ति कराने का अधिकार – केवल कपट द्वारा दी गई सहमति की दशा में पीड़ित पक्षकार को क्षतिपूर्ति कराने का अधिकार प्राप्त होता है, अन्य किसी दशा में नहीं |

4, अनुबन्ध का रद (निरस्त) किया जाना – अनुचित प्रभाव से प्रभावित पक्षकार अनुबन्ध को समाप्त कर सकता है, परन्तु यदि वह अनुबन्ध के अंतर्गत के कुछ लाभ प्राप्त कर चुका है तो ऐसी दशा में अनुबन्ध उन शर्तो पर रेड किया जाट अहै जो न्यायालय की द्रष्टि में उचित हो |

5, अनुबन्ध का पूर्णतया व्यर्थ होना – अनुबन्ध के दोनों पक्षकारो द्वारा तथ्य सम्बन्धी गलती की दशा में अनुबन्ध पूर्णत: व्यर्थ तथा अपर्वतनीय होता है अर्थात् कोई भी पक्षकार ऐसे अनुबन्ध को लागु या पूरा नही करा सकता |

कपट और मिथ्यावर्णन में अन्तर

(Difference between Fraud and Misrepresentation)

 

अन्तर का आधारकपटमिथ्यावर्णन
1, प्रक्रति

 

कपट जान-बुझकर किया जाता है |

 

मिथ्यावर्णन अनजाने में होता है |

 

2, उदेश्यकपट धोखा देकर दुसरे पक्षकार को अनुबन्ध करने के लिये प्रेरित करने के उदेश्य से किया जाता है |इसमें धोखा देने का उद्देश्य नहीं होता बल्कि अनुबन्ध करने के लिये प्रेरित करने होता है |
3, अधिकार कपट का अनुबन्ध, पीड़ित पक्षकार किओ इच्छा पर व्यर्थनिय है | वह चाहें तो अनुबन्ध को निरस्त कर सकता है तथा क्षतिपूर्ति के लिये वाद प्रस्तुत कर सकता है |मिथ्यावर्णन की दशा में भी पीड़ित पक्षकार की अनुबन्ध रद करने का अधिकार प्राप्त है, परन्तु वह क्षतिपूर्ति के लिये वाद नही कर सकता |
4, वैधता कपट की दशा में पीड़ित पक्षकार द्वारा उचित अवधि के अंतर्गत अनुबन्ध के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही न करने पर भी अनुबंध वैध नहीं हो सकता |मिथ्यावर्णन की दशा में पीड़ित पक्षकार यदि उचित समय में अनुबन्ध के विरुध्द कोई कार्यवाही नहीं करता, तो अनुबन्ध वैध हो सकता है |
5, सत्य बात का पता लगाने का साधनकपट की दशा में वाद प्रस्तुत किये जाने पर कपट करने वाला व्यक्ति प्रतिवाद में यह तर्क नही दे सकता की दुसरे पक्षकार के पास सत्य को जानने के लिये साधन उपलब्ध थे |मिथ्यावर्णन की दशा में दोषी पक्षकार को सत्य बात का पता लगाने के साधन उपलब्द थे अथवा वह साधन उपलब्ध थे अथवा वह साधारण प्रयास से सत्य का पता लगा सकता था |





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