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Basic Concepts of Income Tax Bcom Notes Hindi

Basic Concepts of Income Tax Bcom Notes Hindi

Basic Concepts of Income Tax Bcom Notes Hindi

 

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Basic Concepts of Income Tax Bcom Notes Hindi
Basic Concepts of Income Tax Bcom Notes Hindi

 

 

खण्ड (स): दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)

 

आय-कर की आधारभूत अवधारणा (Basic Concepts of Income Tax)

 

प्रश्न 1.  निम्नलिखित की आय-कर अधिनियम के सन्दर्भ में व्याख्या कीजिए (1) कर-निर्धारण वर्ष, (2) माना गया करदाता, (3) चूक में करदाता एवं (4) आकस्मिक आय।

 

उत्तर-(1) कर निर्धारण वर्ष (Assessment Year) आयकर अधिनियम की धारा 2 (9) के अनुसार कर-निर्धारण वर्ष का अभिप्राय 12 माह की उस अवधि से है जो कि 1 अप्रैल से प्रारम्भ होकर अगले वर्ष की 31 मार्च को समाप्त होती है। प्रत्येक करदाता को कर-निर्धारण वर्ष में अपनी गत वर्ष (Previous year) की कमाई हुई आय पर आय कर का भुगतान करना होता है। वर्तमान कर-निर्धारण वर्ष 2017-18 है जो 1 अप्रैल 2017 को प्रारम्भ है हुआ एवं 31 मार्च, 2018 को समाप्त होगा।

 

(2) माना गया करदाता (Deemed Assessee) यदि एक व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की आय के लिए करदाता माना जाए तो उसे ‘माना गया करदाता’ कहा जाता है। उदाहरण के लिए

 

(i) किसी करदाता की मृत्यु के पश्चात् उसके वैधानिक उत्तराधिकारी को मृतक करदाता की आय पर कर देने के लिए करदाता माना जाता है। (ii) अवयस्क, पागल तथा विदेशी व्यक्ति के प्रतिनिधियों को ऐसे व्यक्तियों की आय के सम्बन्ध में करदाता समझा जाता है।

 

(3) चूक करदाता (Assessee in Default)- जिन्हें किसी गलती या चूक के कारण करदाता माना जाता है, उन्हें दोषी करदाता’ या चूक के कारण करदाता’ कहते हैं।

 

उदाहरणार्थ- लाभांश, बीमा कमीशन, वेतन आदि का भुगतान करते समय भुगतान करने वाले व्यक्ति या संस्था का यह दायित्व है कि वह आय-कर की निर्धारित दर से कटौती करके शेष राशि का ही भुगतान करे, परन्तु यदि भुगतान करने वाला व्यक्ति या संस्था बिना कर की कटौती किये हुए भुगतान कर देती है तो ऐसी स्थिति में भुगतान करने वाले व्यक्ति या संस्था को ‘दोषी करदाता’ या ‘चूक के कारण करदाता’ माना जायेगा अर्थात् यह उसकी जिम्मेदारी बन गई कि इस प्रकार न काटी गई कर की रकम को स्वयं अपने पास से सरकारी, कोष में जमा कराये।

 

(4) आकस्मिक आय (Casual Income) – आकस्मिक आय से आशय ऐसी प्राप्तियों से है, जो संयोगवश एवं बिना आशा के प्राप्त हुई हों तथा बार-बार न मिलने वाली प्रकृति की हों। लॉटरी की जीत से आय, घडदौड से आय. वर्ग-पहेली. ताश के खेल, शर्त लगाने से आय, रास्ते में रुपया से भरा बैग या पर्स मिल जाना, टी० वी० गेम्स एवं प्रतियोगिताओं में जीती गई राशि आकस्मिक आय के प्रमुख उदाहरण हैं।

 

कर-निर्धारण वर्ष 2002-03 तक आकस्मिक आयें धारा 10(3) के अन्तर्गत एक निश्चित सीमा तक कर-मुक्त थीं, परन्तु कर-निर्धारण वर्ष 2003-04 से यह कर-मुक्ति समाप्त कर दी गई है। अब आकस्मिक आय पूर्णतः कर योग्य आय है।

 

आकस्मिक आयों पर 30% की विशिष्ट दर से कर लगता है तथा ऐसी आयों के सम्बन्ध में न तो कोई हानि समायोजित की जा सकती है एवं न ही आकस्मिक आय को प्राप्त करने के सम्बन्ध में किये गये किसी व्यय की कोई कटौती स्वीकृत होती है। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि निम्नलिखित आयों को आकस्मिक आय में शामिल नहीं किया जाता है

 

(i) (अ) कर-योग्य पूंजी लाभ, अथवा (ब) व्यापार अथवा पेशे से उदय हुई प्राप्तियां, अथवा (स) एक कर्मचारी के पारिश्रमिक में जुड़ने वाली अन्य प्राप्तियां; जैसे बोनस, ग्रेच्युटी, अनुलाभ, आदि।

 

(ii) उपहार आकस्मिक आय नहीं- पारिवारिक स्नेह एवं प्रेम के कारण प्राप्त हुई भेंट या उपहार को आकस्मिक आय नहीं माना जाता। किसी रिश्तेदार से व्यक्तिगत भेंट (जैसे, जन्म-दिवस या विवाह की वर्षगांठ पर प्राप्त भेंट) बार-बार (प्रति वर्ष) प्राप्त होने पर भी कर-योग्य नहीं होती है। यह भेंट पारिवारिक प्रेम के कारण दी जाती है। उदाहरणार्थ, एक पिता द्वारा पुत्र को, एक पति द्वारा पत्नी को तथा एक रिश्तेदार द्वारा दूसरे रिश्तेदार को प्रति वर्ष कोई राशि भेंट के रूप में दिया जाना केवल भेंट माना जाता है। इसे किसी भी रूप में आय नहीं कहा जा सकता।

 

(iii) सेवा के लिए प्राप्त उपहार- बख्शीस, टीप आदि आकस्मिक आयें नहीं मानी जाती हैं। बैरा, टैक्सी ड्राइवर आदि को प्राप्त बख्शीसें आकस्मिक आय नहीं मानी जाती हैं।

 

(iv) पेशे के उपहार- डॉक्टर को रोगी से उपहार या वकील को अपने मुवक्किल से प्राप्त उपहार भी आकस्मिक आय नहीं मानी जाती हैं, क कि ये प्राप्तियाँ पेशे के कारण प्राप्त हुई हैं।

 

(v) सट्टे के व्यापार से आय- सट्टे के व्यापार से आय आकस्मिक आय नहीं मानी जाती, लेकिन जुए से प्राप्त आय आकस्मिक आय की श्रेणी में आएगी।

 

उद्गम स्थान पर कर की कटौती- (i) यदि घुड़दौड़ से जीत की राशि 5,000 (1.7.2010 से प्रभावी)से अधिक है तो उद्गम स्थान पर निर्धारित दर से कर की कटौती करने के उपरान्त शेष राशि ही विजेता को भुगतान की जाएगी।

 

(ii) यदि लाटरी, वर्ग पहेली, ताश के खेल एवं अन्य खेलों में जीत अथवा जुए या शर्त (दांव) से जीत की राशि 10,000 (1.7.2010 से प्रभावी) से अधिक है तो उद्गम स्थान पर कर की कटौती करने के उपरान्त शेष राशि ही विजेता को भुगतान की जाएगी।

 

प्रश्न 2.  प्रत्येक करदाता एक व्यक्ति है, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति एक करदाता नहीं है। व्याख्या कीजिए।

 

अथवा

 

व्यक्ति (Person) एवं करदाता (Assessee) को समझाइये।

 

उत्तर- प्रश्न में प्रदत्त कथन की व्याख्या करने से पूर्व व्यक्ति एवं करदाता को समझना आवश्यक हैं।

 

(1) व्यक्ति (Person)- सामान्य भाषा में व्यक्ति से आशय मनुष्य से होता है, परन्तु आयकर अधिनियम की धारा 2 (31) के अनुसार व्यक्ति में निम्नांकित शामिल किये जाते है-) एक व्यक्ति (an individual ), (ii ) हिन्दू अविभाजित परिवार, (iii) कम्पनी या निगम, ) फर्म, (v) व्यक्तियों का समूह या समुदाय (AOP/BOI) (vi) स्थानीय सत्ता और (vii) प्रत्येक कृत्रिम व्यक्ति (Artificial Person) जो उपर्युक्त वर्गों में नहीं आता।

 

व्यक्ति (An Individual) से अभिप्राय एक प्राकृतिक व्यक्ति से है जो पुरुष, स्त्री, अवयस्क अथवा पागल व्यक्ति भी हो सकता है। हिन्दू अविभाजित परिवार (HUF) की परिभाषा आयकर अधिनियम में नहीं दी गई है। हिन्दू अविभाजित परिवार से अभिप्राय उन सभी व्यक्तियों से है जो एक ही परिवार के वंशज होते हैं।

 

कम्पनी से आशय कम्पनी अधिनियम द्वारा निर्मित एक ऐसी संस्था से है जिसकी एक अलग सार्वमुद्रा, अविच्छन्न उत्तराधिकारी और सीमित दायित्व होता है।

 

एक फर्म से आशय एक ऐसी साझेदारी फर्म से है जिसमें सभी साझेदार लाभ कमाने के उद्देश्य से गठित होते हैं। यह व्यवसाय उन सबके द्वारा या उनमें से किसी एक के द्वारा सभी के लिए चलाया जाता है।

 

व्यक्तियों के संघ (A.O.P) से अभिप्राय दो या दो से अधिक व्यक्तियों का एक ऐसा संघ है जिसमें व्यक्ति अपने सामान्य उद्देश्य पूरा करने के लिए शामिल होते हैं। स्थानीय सत्ता में नगरपालिका, नगर महापालिका एवं जिला परिषद आदि को शामिल किया जायेगा। 

 

कृत्रिम व्यक्ति में वैधानिक निगम, विश्वविद्यालय एवं भगवान देवता जैसे तिरूपति बाला जी आदि को शामिल किया जायेगा।

 

  1. करदाता (Assessee)– आयकर अधिनियम की धारा 2(7) के अनुसार, करदाता’ के अन्तर्गत निम्नांकित को सम्मिलित किया जाता है।

 

(1) वह व्यक्ति जो कर चुकाने के लिए उत्तरदायी है। (ii) वह व्यक्ति जो कर के अतिरिक्त अन्य राशि (अर्थदण्ड, ब्याज) देने के लिए उत्तरदायी है।

 

(iii) ऐसा व्यक्ति जिसकी आय पर आय-कर लगाने की कार्यवाही आरम्भ कर दी गई है।

 

(IV) माना हुआ करदाता’ (Deemed Assessee) भी करदाता की श्रेणी में शामिल किया जाता है।

 

(v) ऐसा व्यक्ति जिसे चूक में करदाता (Assessee in Default) मान लिया गया हो।

 

(vi) उस व्यक्ति द्वारा स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चुकाये गये कर की वापसी या हानि निर्धारण के लिए कार्यवाही आरम्भ कर दी गई हो।

 

संक्षेप में, करदाता में उन व्यक्तियों को शामिल किया जाता है जिनकी आय गतवर्ष में आयकर अधिनियम के अनुसार कर देने योग्य होती है।

 

निष्कर्ष : व्यक्ति एवं करदाता की उपर्युक्त वर्णित विवेचना से यह बात सिद्ध होती है कि प्रत्येक करदाता एक व्यक्ति है परन्तु एक व्यक्ति को करदाता होने के लिए उसकी गतवर्ष की आय आय-कर अधिनियम के अनुसार कर योग्य होनी चाहिए।

 

प्रश्न 3. गत वर्ष की व्याख्या कीजिए। गत वर्ष में हुई आय पर अगले कर-निर्धारण वर्ष में कर का निर्धारण किया जाता है। इस नियम की व्याख्या कीजिए तथा अपवादों पर प्रकाश डालिए। (मेरठ 2008 BP,2006)

 

उत्तर- गत वर्ष (Previous Year)–सरल शब्दों में, जिस वर्ष में आय कमाई या प्राप्त की जाती है उसे गत वर्ष कहते हैं। गत वर्ष को वित्तीय वर्ष (Financial Year) या लेखांकन या हिसाबी वर्ष (Accounting Year) के नाम से भी जाना जाता है।

 

आय-कर अधिनियम की धारा 3 के अनुसार कर-निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्व वाले वित्तीय वर्ष को गत वर्ष कहा जाता है। चूँकि कर-निर्धारण वर्ष प्रत्येक वर्ष 1 अप्रैल से प्रारम्भ होता है, अत: इसे ठीक पूर्व की तिथि अर्थात् 31 मार्च तक की 12 माह की अवधि को गत वर्ष कहते हैं। उदाहरणार्थ, कर-निर्धारण वर्ष 2017 18 से सम्बन्धित गत वर्ष का अभिप्राय । अप्रैल, 2016 से 31 मार्च, 2017 तक की 12 माह की अवधि से है। यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि आय के सभी स्रोतों के लिए एक ही गत वर्ष माना जाता है।

 

यद्यपि करदाता अपनी सुविधानुसार वित्तीय वर्ष, दीवाली वर्ष, दशहरा वर्ष, कैलेंडर वर्ष आदि के अनुसार अपना हिसाब-किताब रख सकते हैं, परन्तु सभी करदाताओं को आय-कर हेतु अपना हिसाब-किताब 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधि का ही तैयार करना पड़ेगा। नये व्यापार की स्थिति में, या आय का नया साधन अस्तित्व में आने की स्थिति में, जिस तिथि को नया व्यापार प्रारम्भ किया जाता है या जिस तिथि को आय का नया साधन अस्तिल्व में आता है, उस तिथि से वित्तीय वर्ष के समाप्त होने तक की तिथि की अवधि को ही गत वर्ष माना जायेगा। उदाहरणार्थ, करदाता अपना व्यवसाय 1 अक्टूबर, 2016 को प्रारम्भ करता है तो उसका गत वर्ष 1 अक्टूबर, 2016 से 31 मार्च, 2017 तक की अवधि ही होगी।

 

सामान्य नियम: “गत वर्ष की आय पर सम्बन्धित कर-निर्धारण वर्ष में ही कर लगता है।”

 

सामान्य नियम के अपवाद (Exceptions to General Rule)– सामान्यतः कर गत की आय पर कर-निर्धारण वर्ष में ही लगता है, परन्तु इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं । निम्नलिखित स्थितियों में करदाता पर आय कमाने वाले वर्ष में ही कर लग जाता है अर्थात् भारतवर्ष एवं कर-निर्धारण वर्ष एक ही होते हैं

 

  1. अनिवासियों की समुद्री जहाज द्वारा व्यापार से आय (धारा 172)- अनिवासी नेताओं को भारतीय बंदरगाह से सामान, पशु, डाक, यात्री आदि को ले जाने से ऐसे माल के लिए प्राप्त या प्राप्य राशि का 7.5% जहाज के मालिक की कर योग्य आय मानी जाती है, और उसी पर कर लगता है, जिस वर्ष वह उपार्जित की गई हो, बशर्ते कि जहाज मालिक का कोई एजेन्ट भारत में न हो। जहाज रवाना होने से पूर्व या जहाज का मालिक ऐसा प्रबन्ध करे जिससे कर का भुगतान एवं आय विवरणी 30 दिन के अन्दर-अन्दर सरकार को जमा हो जाए। वित्त अधिनियम, 2008 से ऐसी व्यवस्था की गयी है कि ऐसे व्यक्ति का कर निर्धारण गत वर्ष की समाप्ति के 9 माह के भीतर सम्पन्न हो जाना चाहिए।

 

2.भारत को छोड़कर जाने वाले व्यक्तियों की आय(धारा 174)- यदि कर निर्धारण अधिकारी को ऐसा प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति चालू कर निर्धारण वर्ष (जिसे गत वर्ष कहा जाता है) में या इसके समाप्त होने पर या उससे पहले भारत छोड़कर जा सकता है तथा उसका दोबारा भारत लौटने का इरादा नहीं है तो इस तरह के व्यक्ति की कुल आय पर उसी गत वर्ष में जब वह भारत छोड़कर जा रहा है, आय-कर वसूल कर लिया जाता है।

 

  1. किसी विशिष्ट उद्देश्य या घटना के लिए व्यक्तियों का संघ (A.O.P.) या व्यक्तियों का समूह (Body of Individual-B.O.I.) या कृत्रिम व्यक्ति का बनाया जाना (धारा 174 A)- यह नियम कर-निर्धारण वर्ष 2004-05 से लागू किया गया है। यदि कर-निर्धारण अधिकारी को ऐसा प्रतीत होता है कि कोई व्यक्तियों का संघ, व्यक्तियों का समूह अथवा कृत्रिम व्यक्ति किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनाया गया है एवं चालू गत वर्ष में ही उसको समाप्त कर दिया जायेगा तो कर निर्धारण अधिकारी विघटन की तिथि तक की कुल आय पर चालू गत वर्ष में ही कर निर्धारण कर देता है।

 

  1. कर बचाने के उद्देश्य से सम्पत्ति का हस्तान्तरण (धारा 175)- यदि कोई व्यक्ति कर बचाने के उद्देश्य से अपनी सम्पत्ति का हस्तान्तरण किसी दूसरे व्यक्ति को करता है तो ऐसी स्थिति में चालू गत वर्ष में ही कर निर्धारण कर दिया जाता है।

 

  1. बन्द किये गये व्यापार की आय-धारा 176 के अनुसार, जब कोई व्यापार या पेशा किसी कर-निर्धारण वर्ष में बन्द कर दिया जाता है तो उसे बन्द करने वाले व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह 15 दिन के भीतर आय-कर अधिकारी को इस सम्बन्ध में सूचित कर दा आय-कर अधिकारी पिछले गतवर्ष से व्यापार बन्द किये जाने की तिथि तक के लाभ पर उसी कर-निर्धारण वर्ष में कर निर्धारित कर देता है।

 

प्रश्न 4-“आय-कर आय पर लगने वाला कर है, प्राप्तियों पर लगने वाला नहीं इस कथन की विवेचना कीजिए और ‘आय शब्द के मुख्य लक्षण बताइए। (मेरठ, 2009 BP)

 

अथवा

 

“आय-कर आय पर ही लगाया जाता है, परन्तु आय-कर अधिनियम में इसकी समुचित परिभाषा नहीं दी गई है। इस कथन की व्याख्या कीजिए और आयकर अधिनियम में प्रदत्त आय के प्रावधानों की विवेचना कीजिए। (आगरा, 2010)

 

उत्तर-“आय-कर आय पर लगने वाला कर है, प्राप्तियों पर लगने वाला नहीं। यह कथन बिल्कुल सत्य है। उदाहरणतः यदि एक पत्नी को अपने पति से कोई धनराशि घर-खर्च के लिए प्राप्त होती है तो यह पत्नी के हाथ में कर-योग्य नहीं है क्योंकि यह पत्नी की आय नहीं है। इस कथन की निम्न तरीके से भी व्याख्या की जा सकती है

 

(1) व्यवसाय से प्राप्तियां (Business Receipts)- आयकर अधिनियम के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि व्यवसाय की कुल बिक्री पर आय-कर नहीं लगेगा बल्कि इस बिक्री की राशि में से माल की लागत एवं अन्य अप्रत्यक्ष खर्चे घटाने के बाद अगर कोई राशि शेष बचती है, तो उस शेष राशि पर ही आय-कर लगाया जा सकता है। अगर लागत एवं खर्चे घटाने के बाद कोई भी राशि शेष नहीं बचती है, तो आय-कर देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उदाहरणतया, यदि एक व्यवसाय की बिक्री 3,00,000 है तथा माल की लागत एवं अप्रत्यक्ष खर्चे इत्यादि 80,000 है तो यहाँ 2,20,000 पर ही आय-कर लगाया जा सकता है न कि 3,00,000 पर।

 

इसी प्रकार पेशे से होने वाली प्राप्तियों में से भी सर्वप्रथम पेशे से सम्बन्धित खर्चों को घटाया जाएगा और तदुपरान्त यदि कोई राशि शेष बचेगी तो उस पर ही आय-कर लगेगा।

 

(2) पूंजी सम्पत्तियों की बिक्री (Sale of Capital Assets)- यदि गत वर्ष में कोई पूंजी सम्पत्ति बेची जाती है तो इससे प्राप्त होने वाले सम्पूर्ण प्रतिफल पर आय-कर नहीं लगेगा बल्कि इस प्रतिफल की राशि में पूंजी सम्पत्ति की प्राप्ति लागत एवं हस्तांतरण से सम्बन्धित ख) को घटाने के बाद अगर कोई राशि शेष बचती है तो इस प्रकार बची हुई शेष राशि पर ही आय-कर लगेगा। उदाहरणतया, एक भवन 4,00,000 में बेचा गया। इसकी प्राप्ति लागत 2,00,000 थी एवं मकान बेचने से सम्बन्धित दलाली पर 20,000 व्यय हुए हैं, तो यहां (4,00,000-2,20,000) 1,80,000 ही आय मानी जाएगी एवं आय-कर की गणना भी 1,80,000 पर ही की जाएगी न कि 4,00,000 पर।

 

(3) ब्याज की प्राप्ति (Receipts of Interest)- यदि करदाता को गत वर्ष में कुछ राशि ब्याज के रूप में प्राप्त हुई है तो इस राशि में से व्याज को संग्रह करने के खर्चे घटाए जाएंगे। यदि जिन प्रतिभूतियों पर ब्याज प्राप्त हुआ है उन्हें खरीदने के लिए ऋण लिया गया था एवं इस ऋण पर ब्याज का भुगतान किया जाता है, तो इस ब्याज की राशि को भी प्राप्त ब्याज की राशि में से घटाया जाएगा एवं इसके बाद अगर कोई राशि शेष बचती है तो शेष राशि पर – ही आय-कर की गणना की जाएगी।

 

संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि आय-कर प्राप्तियों पर लगने वाला कर नहीं बल्कि इसकी गणना आय के आधार पर की जाती है। आय-कर अधिनियम में एक करदाता की आय बात करने के लिए विभिन्न प्रावधान बनाए गए हैं। इन प्रावधानों का पालन करने पर ही कर-योग्य आय का निर्धारण संभव है।

 

आय के मुख्य लक्षण अथवा आयकर अधिनियम में प्रदत्त आय के प्रावधान (Main Features of the Income)

 

‘आय’ शब्द एक बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है, क्योंकि आय-कर आय पर ही लगता है। परन्तु आय-कर अधिनियम में इस शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। केवल धारा 2(24) में इतना ही बताया गया है कि आय में क्या-क्या शामिल किया जाता है। आय के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

 

(1) वैघ व अवैध दोनों आयों पर आय-कर लगाता है।

(2) यह आवश्यक नहीं कि आय मुद्रा के रूप में ही प्राप्त की गई हो। मुद्रा तुल्य वस्तु या सेवा के रूप में प्राप्ति भी आय मानी जाती है।

(3) आयकर कर योग्य होने के लिये आय के साधन का होना आवश्यक है।

(4) आय एक साथ या किस्तों (Instalment) में प्राप्त हो सकती है अर्थात् यह आवश्यक नहीं है कि आय नियमित रूप से ही प्राप्त हो।

(5) खर्चों की क्षतिपूर्ति आय नहीं मानी जाती उदाहरणार्थ-वास्तविक यात्रा व्यय की क्षतिपूर्ति आय नहीं मानी जायेगी।

(6) कोई प्राप्त धन आय है अथवा नहीं, इसका निश्चय प्राप्ति के समय से होता है। यदि प्रथम प्राप्ति के समय वह आय नहीं है परन्तु बाद में आय हुई है तो वह कर योग्य नहीं हो सकती।

(7) आय की प्राप्ति बाहरी साधन से होनी चाहिये। यदि किसी संघ को अपने सदस्यों से प्राप्त चन्दा उसके खर्च से अधिक है तो वह आधिक्य कर योग्य आय नहीं माना जायेगा।

(8) यदि किसी व्यक्ति की आय पर कानूनी रूप से किसी दायित्व का भार (Charge) लगा दिया जाये तो इतनी राशि उसकी आय नहीं मानी जायेगी।

(9) व्यक्तिगत उपहारों को आय नहीं माना जाता।

(10) कमायी गयी तथा प्राप्त की गयी दोनों ही आयें कर-योग्य होती हैं।

(11) धर्मादा, गऊशाला, आदि के सम्बन्ध में प्राप्तियां आय नहीं होती हैं।

(12) बचत आय नहीं होती है। पति द्वारा पत्नी को घर खर्च के लिए दी गयी धनराशि अथवा उसके निजी व्यय के लिए दी गई धनराशि में से यदि पत्नी कुछ बचत कर लेती है तो वह पत्नी की आय नहीं मानी जायेगी।

(13) यदि किसी आय के सम्बन्ध में यह विवादास्पद है कि यह आय किसकी है तो यह आय उस व्यक्ति की मानी जायेगी जिसने उसे प्राप्त किया है ।

(14) आय ऋणात्मक हो सकती है।


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One thought on “Basic Concepts of Income Tax Bcom Notes Hindi

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